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युग परिवर्तन : युग बदले, देवता बदले, पर कहानियां अमर रहीं | 🔱✨ग्रीक, नॉर्स, मिस्री, भारतीय और दुनिया की पौराणिक कथाओं का संग्रह। देवताओं के युद्ध, राक्षसों के रहस्य, और सभ्यताओं की अमर गाथाएं - सरल हिंदी में। युग बदले, कहानियां बाकी हैं । Follow करें 🔱✨

18/09/2026

6. देवव्रत की भीष्म प्रतिज्ञा | राज्य छोड़ने के बाद उन्होंने वह भी त्याग दिया, जो भविष्य के उत्तराधिकारी का अधिकार बन सकता था | अध्याय: 100 | yugparivartan,

18/09/2026

5. देवव्रत द्वारा पिता के दुःख का कारण जानना और राज्याधिकार की प्रतिज्ञा | पिता की मौन चिंता के पीछे छिपी इच्छा तक पुत्र स्वयं पहुँच गया | अध्याय: 100 | yugparivartan,

Story 6अध्याय: 100देवव्रत की भीष्म प्रतिज्ञाराज्य छोड़ने के बाद उन्होंने वह भी त्याग दिया, जो भविष्य के उत्तराधिकारी का ...
18/09/2026

Story 6
अध्याय: 100
देवव्रत की भीष्म प्रतिज्ञा
राज्य छोड़ने के बाद उन्होंने वह भी त्याग दिया, जो भविष्य के उत्तराधिकारी का अधिकार बन सकता था ।
निषादराज ने देवव्रत की प्रतिज्ञा स्वीकार करते हुए भी कहा कि उनके होने वाले पुत्र के विषय में संशय है । यह सुनकर पिता के हित के लिए देवव्रत ने कठोर प्रतिज्ञा की । उन्होंने कहा कि राज्य तो वे पहले ही छोड़ चुके हैं, अब संतान के लिए भी अटल निश्चय है । आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर उन्होंने संतान उत्पन्न न करने का व्रत लिया । वे राज्य और मैथुन का परित्याग करके ऊर्ध्वरेता रहने का वचन देते हैं । देवव्रत का वचन सुनकर निषादराज ने सत्यवती को उनके पिता के लिए देने की स्वीकृति दी । अंतरिक्ष में अप्सराएँ, देवता और ऋषिगण पुष्पवर्षा करने लगे और बोले कि यह भयंकर प्रतिज्ञा करने वाला राजकुमार भीष्म है । तब भीष्म ने सत्यवती को रथ पर बैठाया और हस्तिनापुर ले जाकर शान्तनु को समर्पित कर दिया । सब राजाओं ने उनके दुष्कर कर्म की प्रशंसा की । यह सुनकर शान्तनु संतुष्ट होकर भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान दिया ।

Story 5अध्याय: 100देवव्रत द्वारा पिता के दुःख का कारण जानना और राज्याधिकार की प्रतिज्ञापिता की मौन चिंता के पीछे छिपी इच...
18/09/2026

Story 5
अध्याय: 100
देवव्रत द्वारा पिता के दुःख का कारण जानना और राज्याधिकार की प्रतिज्ञा
पिता की मौन चिंता के पीछे छिपी इच्छा तक पुत्र स्वयं पहुँच गया ।
देवव्रत ने पिता को दुखी देखकर उनसे कारण पूछा । शान्तनु ने कहा कि वे चिंता में हैं क्योंकि देवव्रत उनके एकमात्र पुत्र हैं और अस्त्र-शस्त्र के अभ्यास में लगे रहते हैं । यदि उन पर कोई विपत्ति आ गयी, तो वंश समाप्त हो जाएगा । उन्होंने कहा कि वे व्यर्थ विवाह नहीं करना चाहते, किंतु वंशपरंपरा के लिए उन्हें पुनः पत्नी की कामना हुई है । यह सुनकर देवव्रत ने विचार किया और पिता के हितैषी वृद्ध मंत्री के पास गये । मंत्री ने बताया कि राजा एक कन्या से विवाह चाहते हैं । फिर देवव्रत ने पिता के सारथि को बुलाया । सारथि ने निषादकन्या और उसके पिता की शर्त का वृत्तांत बताया । तब देवव्रत मंत्रियों के साथ निषादराज के पास पिता के लिए कन्या माँगने गये । निषादराज ने उनका सत्कार किया और वही शर्त सामने रखी कि उस कन्या का पुत्र राजा बने । देवव्रत ने सब राजाओं के सामने यह प्रतिज्ञा स्वीकार कर ली ।

18/09/2026

4. निषादराज की शर्त और शान्तनु का लौटना | राजा के सामने इच्छा थी, पर उसके साथ एक ऐसी शर्त थी जिसे वे स्वीकार न कर सके | अध्याय: 100 | yugparivartan,

Story 4अध्याय: 100निषादराज की शर्त और शान्तनु का लौटनाराजा के सामने इच्छा थी, पर उसके साथ एक ऐसी शर्त थी जिसे वे स्वीकार...
18/09/2026

Story 4
अध्याय: 100
निषादराज की शर्त और शान्तनु का लौटना
राजा के सामने इच्छा थी, पर उसके साथ एक ऐसी शर्त थी जिसे वे स्वीकार न कर सके ।
रूप, माधुर्य और सुगंध से युक्त उस निषादकन्या को देखकर राजा शान्तनु ने उसे प्राप्त करने की इच्छा की । वे उसके पिता दाशराज के पास गये और कन्या का वरण करने की बात कही । दाशराज ने कहा कि कन्या के जन्म से ही उनके मन में उसके लिए श्रेष्ठ वर खोजने की चिंता थी, पर एक अभिलाषा भी थी । यदि शान्तनु उसे धर्मपत्नी बनाना चाहते हैं, तो सत्य के सामने उनकी इच्छा पूरी करने की प्रतिज्ञा करें । उन्होंने शर्त रखी कि कन्या के गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न हो, वही शान्तनु के बाद राजा बने, किसी अन्य राजकुमार का अभिषेक न हो । राजा उस समय कामाग्नि से संतप्त थे, फिर भी यह वर देने की इच्छा उनके मन में नहीं हुई । वे निषादकन्या का चिंतन करते हुए हस्तिनापुर लौट आये । कुछ समय बाद वे चिंता में डूबे रहने लगे और उनकी कांति मलिन होने लगी ।

18/09/2026

3. निषादकन्या का दर्शन और उसके वरण की इच्छा | एक सुगंध ने राजा को उस कन्या तक पहुँचा दिया, जिसके लिए एक कठिन शर्त प्रतीक्षा कर रही थी | अध्याय: 100 | yugparivartan,

Story 3अध्याय: 100निषादकन्या का दर्शन और उसके वरण की इच्छाएक सुगंध ने राजा को उस कन्या तक पहुँचा दिया, जिसके लिए एक कठिन...
18/09/2026

Story 3
अध्याय: 100
निषादकन्या का दर्शन और उसके वरण की इच्छा
एक सुगंध ने राजा को उस कन्या तक पहुँचा दिया, जिसके लिए एक कठिन शर्त प्रतीक्षा कर रही थी ।
गंगाजी के अंतर्धान होने के बाद महाराज शान्तनु अपने पुत्र देवव्रत को लेकर हस्तिनापुर लौटे । राजधानी इन्द्रपुरी अमरावती के समान सुंदर थी । राजा ने अपने गुणवान पुत्र को पौरवों के बीच युवराज पद पर अभिषिक्त कर दिया । देवव्रत ने अपने आचार और व्यवहार से पिता, पौरव समाज तथा समूचे राष्ट्र को संतुष्ट कर लिया । शान्तनु उसके साथ आनंदपूर्वक रहने लगे । चार वर्ष बीत गये । एक दिन राजा यमुना नदी के निकटवर्ती वन में गये । वहाँ उन्हें एक अवर्णनीय और परम उत्तम सुगंध का अनुभव हुआ । वे उसके उद्गम का पता लगाते हुए चारों ओर घूमने लगे । तभी उन्होंने मल्लाहों की एक कन्या को देखा । वह देवांगना के समान रूपवती और श्याम नेत्रों वाली थी । शान्तनु ने उससे पूछा कि वह कौन है, किसकी पुत्री है और क्या करना चाहती है । कन्या ने उत्तर दिया कि वह निषादकन्या है और अपने पिता की आज्ञा से धर्मार्थ नाव चलाती है ।

17/09/2026

2. गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति | एक धारा को रोकने वाला बालक, अपने ही पिता की पहचान से दूर था | अध्याय: 100 | yugparivartan,

Story 2अध्याय: 100गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्तिएक धारा को रोकने वाला बालक, अपने ही पिता की पहचान से दूर थ...
17/09/2026

Story 2
अध्याय: 100
गंगाजी के द्वारा सुशिक्षित पुत्र की प्राप्ति
एक धारा को रोकने वाला बालक, अपने ही पिता की पहचान से दूर था ।
एक समय किसी हिंसक पशु को बाण से बींधकर राजा शान्तनु उसका पीछा करते हुए भागीरथी गंगा के तट पर पहुँचे । उन्होंने देखा कि गंगा में बहुत थोड़ा जल रह गया है । आगे बढ़े तो एक विशालकाय कुमार दिखाई दिया, जो देवराज इन्द्र के समान धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था और अपने तीखे बाणों से पूरी गंगा की धारा रोककर खड़ा था । उसके अलौकिक कर्म से राजा को आश्चर्य हुआ । वह उनका अपना पुत्र था, पर शान्तनु उसे पहचान न सके । बालक ने पिता को देखकर उन्हें माया से मोहित किया और शीघ्र ही अंतर्धान हो गया । राजा को संदेह हुआ और उन्होंने गंगा से पुत्र को दिखाने को कहा । गंगा सुंदर रूप में देवव्रत को साथ लेकर आयीं और बताया कि यह वही आठवाँ पुत्र है । उन्होंने उसके वेद, अस्त्रविद्या, नीति, शास्त्र, राजधर्म और अर्थशास्त्र में पारंगत होने का वर्णन किया और पुत्र को पिता को सौंप दिया ।

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