05/04/2016
गंगा जो तुम बहती हो
बहते बहते कुछ कहती हो
की तुम क्यों वहीँ ठहरे हो
ताकते रहते हर पहरे को
समय तो बीतता जायेगा
तुम्हारा वो दिन कब आएगा
जब तुम भी चलोगे, तुम भी बहोगे
क्योंकि ठहरता नहीं है हमारा जीवन
बस उड़ता रहता है हवाओं की तरह
तो क्यों नहीं तुम रफ़्तार की नाव में चढ़ते
तुम क्यों नहीं उस ठहरे समय से आगे बढ़ते
जब मेरी लहरे देंगी तुम्हे प्रोत्साहन
तब चल देना जहाँ हो तुम्हारा मन
कभी तो पहुंचोगे अपनी मंजिल तक
जैसे मेरी है उस साहिल तक
बस चलते रहना, बस बहते रहना I