09/04/2025
"ममता समता प्रेम का, मानक माँ की गोद।
चन्द्रप्रभा शीतल सुभग, माँ आँचल मन मोद।।"
चैत्र महीने के पवित्र दिनोमें एक शतायु बुजुर्ग परमात्मा में विलीन हुए। वासा गांव के सबसे बुजुर्ग महिला पंकु देवीजी का पूर्ण आयु करीबन 104वें वर्षमें दिव्यलोक गमन हुआ।
आज के इस भाग दौड़ के जमाने में जिधर इंसान 60-70 साल की आयु में ही गंभीर बीमारियों से घिर जाता हैं और जीने की तमन्ना छोड़ देता हैं, वहां पंकुबाई का 100 साल जीना अपने आप में एक उपलब्धि हैं। क्या अंतर हैं हम में और हमारे बुजुर्गों में की हम में ज्यादा जीने की तमन्ना ही मरती जा रही हैं?! हमारे वेदकालीन लोगों ने ऐलान किया कि, "जीवेम शरद: शतम ।।" अर्थात् 100 शरद ऋतु देखो, 100 साल जियो। इस वेदकालीन सूक्ति पे हमारे बुजुर्ग खरे उतर के गए। उनमें गजब की जीजिविषा थी। गजब के मेहनती थे वे। छोटी मोटी आफतों में वे कभी घबराते नहीं थे, दुबक के बैठ नहीं जाते थे। किसी स्वजन के चले जाने पर भी वे कभी उनके खालीपन में हंमेशा डूबे नहीं रहते थे अपितु अपने जीवन कार्य में अड़े रहते थे। मेहनत ही उनकी पूंजी थी। 100 साल कोई व्यक्ति ऐसे ही नहीं जी सकता। मजबूत धैर्य और मानसिक बल के बिना ये असंभव हैं। आज की पीढ़ी को देखे तो छोटी छोटी बातों में निरुत्साह हो जाती हैं, हताश-निराश हो जाती हैं। जीने के वजूद को खो बैठती हैं। आज की पीढ़ी अगर केवल घर के बुजुर्गों ने कैसे जीवन अपना बिताया और कैसे अपने जीवन के मुश्किल दौर में खुद को संभाला और आगे बढ़ के उस परिस्थितियों से उभरकर आये ये उनके पास बैठ के जाने तो भी जग तारे। लेकिन, आज की पीढ़ी को घर के बुजुर्गों के पास बैठने का वक्त कहां? वे तो अपने मोबाइल की एक आभासी दुनिया में ऐसे सुख ढूंढने में व्यस्त हैं जो उन्हें वहां कभी मिलने ही नहीं वाला हैं।
मैने पंकुदेवीजी के पुत्र/पौत्रों को और बहुओं को उनकी सेवा करते देखा हैं। जब भी उनके वहां जाता और घर के लोगों को उनकी सेवा-सुश्रुषा करते देखता तो उसमें श्रवण भक्ति की ही झलक मिलती। खूब निर्मल और खरे मन से उन सभीने पंकुबाईकी प्रेम से सेवा की। कोई बुजुर्ग व्यक्ति 80 या 90 साल की आयु शायद अपने स्वास्थ्य के दम पर जी ले लेकिन 100 वर्ष तक की आयु के पिछले दस बीस साल वह तभी ही जी सकता हैं जब वह घर के लोगों का प्रेम, सेवा और सुश्रुषा पाए। यह "सेवा, सुश्रुषा" शब्द लिखना और कहना सरल हैं लेकिन जिन्होंने की हैं उन्हें ही मालूम हैं कि यह एक जिम्मेदारी भरा कार्य हैं। एक आयु के बाद बुजुर्ग व्यक्ति को छोटे बच्चे की तरह संभालना पड़ता हैं, उनकी हर दैनिक गतिविधियों में घर के लोगों को एकरूप और समरस होना पड़ता हैं। सेवा बोझ नहीं हैं, यह पुण्यमार्ग हैं।
"जीवन की सच्चाई हैं, बात नहीं ये आम,
माँ-बाप की सेवा करी, तो हो गए चारों धाम।"
जिनके घरों में शतायु बुजुर्ग हैं, जरूर मानो की वे परिवारों ने असामान्य परिस्थितियों को मात दी हैं। ये बुजुर्ग ही तो घर की आधारशिला हैं। उनकी आंखों में इतिहास की चमक हैं, पारिवारिकता की दमक हैं, संस्कारिता की झलक हैं और अनुभव की खनक हैं।
धन्य हैं ऐसे संतान और ऐसे परिवार जिन्होंने उनके बुजुर्गों की पूर्ण मन से सेवा सुश्रुषा की और बुजुर्गों के अनुभव रूपी धरोहर और आदर्शों को खुद में और आने वाली पीढ़ियों में समाहित एवं संस्कारित किया।
शतायु पंकुबाई को ईश्वर उनके पदकमलों में स्थान दे ऐसी ईश्वरको अंतरमनसे प्रार्थना..
"सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी॥
तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा॥॥
भावार्थ:
हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माता के वचनों को पालन करने वाला हैं। माता-पिता को सेवा और आज्ञपालन से संतुष्ट करने वाला पुत्र, हे जननी! सारे संसार में दुर्लभ है॥
🙏🏻🙏🏻🙏🏻