22/02/2026
रिश्ते स्वर्ग से बनते हैं। उन्हें टूटने मत दीजिए,
बल्कि उन्हें निभाना सीखिए -
राष्ट्रसंत ललित प्रभ म.सा
विद्या निकेतन स्कूल सेक्टर 4 में राष्ट्रसंतों को सुनकर श्रद्धालुओं की आंखें हुई नम
VHN News @ Udaipur
उदयपुर, 22 फरवरी। राष्ट्रसंत महोपाध्याय ललित प्रभ म.सा ने कहा कि जहां हम आधा-एक घंटा जाते हैं, उसे तो मंदिर मानते हैं, पर जहाँ 23 घंटे रहते हैं उस घर को मंदिर क्यों नहीं बनाते हैं। उन्होंने कहा कि घर का वातावरण ठीक नहीं होगा तो मंदिर में भी मन में शांति नहीं रहेगी पर हमने घर का वातावरण अच्छा बना लिया तो हमारा घर-परिवार ही मंदिर-तीर्थ बन जाएगा।
संतश्री ने कहा कि घर का हर सदस्य संकल्प ले कि वह कभी किसी का दिल नहीं दुखाएगा। हम किसी के आँसू पौंछ सकते हैं तो अच्छी बात है, पर हमारी वजह से किसी की आँखों में आँसू नहीं आने चाहिए। अगर हमारे कारण माता-पिता की आँखों में आँसू आ जाए तो हमारा जन्म लेना ही बेकार हो गया। उन्होंने कहा कि हमसे धर्म-कर्म हो तो अच्छी बात है, पर ऐसा कोई काम न करें कि जिससे घर नरक बन जाए।
उन्होंने कहा कि परिवार को अंग्रेजी में कहते हैं फैमिली का मतलब है फादर एण्ड मदर आई लव यू। जिस घर में माता-पिता से प्रेम और उनका सम्मान होता है, उसी का नाम परिवार है। उन्होंने कहा कि सप्ताह में सात वार होते हैं, पर दुनिया में एक आठवाँ वार और होता है, जिसका नाम है परिवार। यदि यह आठवाँ वार ठीक है तो सातों वार सुखदायी है। परिवार का गणित हमें समझाता है कि 5, 6, 7, 8, 9 भले ही कितने भी बड़े क्यों न हों, पर यदि वे आपस में झगड़ते रहेंगे तो उनकी कीमत कम ही होनी है और यदि मेल-जोल बनाकर रखेंगे तो 1 और 0 कम औकात के होने के बावजूद अपनी 10 गुना कीमत बना लेंगे।
राष्ट्रसंत रविवार को लोक कल्याणकारी प्रवचन समिति और श्री वासुपूज्य स्वामी मंदिर ट्रस्ट दादावाड़ी द्वारा विद्या निकेतन स्कूल सेक्टर 4 में आयोजित तीन दिवसीय विराट प्रवचन माला के तीसरे दिन हजारों श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जो अपने घर-परिवार में प्रेम नहीं घोल पाया वह भला समाज में क्या प्रेम रस घोल पाएगा? जो अपने सगे भाई को सहारा बनकर ऊपर उठा न पाया, वह समाज को क्या ऊपर उठा पाएगा? मकान, घर और परिवार की नई व्याख्या देते हुए संतश्री ने कहा कि ईंट, चूने, पत्थर से मकान का निर्माण होता है, घर का नहीं। जहाँ केवल बीबी-बच्चे रहते हैं वह मकान घर है, पर जहाँ माता-पिता और भाई-बहिन भी प्रेम और आदरभाव के साथ रहते हैं वही घर परिवार कहलाता है। चुटकी लेते हुए संतश्री ने कहा कि लोग सातों वारों को धन्य करने के लिए व्रत करते हैं, अच्छा होगा वे आठवां वार परिवार को धन्य करे, सातों वार अपने आप सार्थक हो जाएंगे।
उन्होंने कहा कि किसी क्लब के सदस्य बनकर इंसानियत की सेवा न कर पाओ तो दिक्कत नहीं, पहले घरवालों की सेवा करना शुरू करो, कमजोर भाई के काम आओ, इससे बढ़कर इंसानियत की कोई सेवा नहीं हो सकती। जो बाहर जाकर तो सेवा करता है, पर घरवालों को दुत्कारता है ऐसे लोगों को भगवान कभी माफ नहीं करता।
संतप्रवर ने कहा कि जिस घर में सुबह उठकर भाई-भाई आपस में गले मिलते हैं और माता-पिता के पाँव छूते हैं वह हर सुबह आखातीज का पर्व बन जाती है, जहाँ दोपहर में देराणी-जेठाणी मिलकर खाना बनाते हैं और सास-बहू साथ-साथ खाना खाते हैं उनकी दोपहर होली का पर्व बन जाती है और जो बेटे-बहू सोने से पहले बड़े-बुजुर्गों के पाँव दबाने का सुकुन पाते हैं उनकी रातें भी दुआओं की दीपावली बन जाती है।
उन्होंने कहा कि मंच पर खड़े होकर भाषण और प्रवचन देना सरल है, पर घर में प्रेम से रहना मुश्किल है। व्यक्ति 84 लाख जीवयोनियों से क्षमा बाद में मांगे, पहले घरवालों से क्षमा मांगने का बड़प्पन दिखाए। केवल उम्र से व्यक्ति बड़ा नहीं होता, जो वक्त आने पर झुक जाता है, पर परिवार को कभी टूटने नहीं देता वही घर में सबसे बड़ा कहलाता है। उन्होंने कहा कि अगर आप घर में आपस में नहीं बोलते हैं तो मंदिर के दर्शन, संतों की सेवा और सामायिक का धर्म करने से पहले टूटे रिश्तों को सांधें और गले मिलें अन्यथा सारा धर्म-कर्म निष्फल्ल हो जाएगा।
संतश्री ने कहा कि अपने घर को सजाना सीखिए। कोई रूठ जाए तो उसे मनाना सीखिए। रिश्ते स्वर्ग से बनते हैं। उन्हें टूटने मत दीजिए, बल्कि उन्हें निभाना सीखिए। रिश्ते शीशे की तरह नाजुक होते हैं, एक झटका लगा कि टूटकर बिखर गए। फर्क केवल इतना है कि शीशा गलती से टूटता है और रिश्ता गलतफहमी से। अगर कोई रिश्ता आपको पसंद न भी हो, तब भी उसे तोडने की बेवकूफी मत कीजिए। गंदा पानी पीने के काम न आ पाए तो क्या हुआ, कम-से-कम आग बुझाने का काम तो उससे ले ही सकते हैं। परिवार में किसी से दुश्मनी मोल मत लीजिए। जन्मकुंडली में शनि, दिमाग में मनी और परिवार में दुश्मनी, तीनों ही कष्टदायी होते हैं।
इससे पूर्व डॉ मुनि श्री शांति प्रिय सागर जी महाराज ने कहा कि दुनिया में स्वस्थ होकर आना हमारी प्रकृति है, बीमार होना हमारी विकृति है, पर खुद को सदा स्वस्थ रखना यही हमारी भारतीय संस्कृति है। अगर हम सदा स्वस्थ जीवन जीना चाहते हैं तो हमें ध्यान और योग का नियमित अभ्यास करना चाहिए। ध्यान और योग से शरीर स्वस्थ रहता है, मन शांत रहता है, जीवन ऊर्जावान होता है और भीतर की संभावनाएं जागृत होती है।
उन्होंने कहा कि संबोधि योग जीवन को सुंदर बनाने के लिए है। संबोधि योग के तीन रत्न हैं - 1. आसन, 2. प्राणायाम और 3. ध्यान। आसन आरोग्य के लिए है, प्राणायाम से प्राण-शक्ति का विकास होता है और संबोधि ध्यान से आत्म-प्रकाश के मालिक बनते हैं, भीतर का अंधकार दूर होता है। उन्होंने कहा कि संबोधि ध्यान का लक्ष्य है - चंचल और उग्र मन को शांत और प्रसन्नतापूर्ण बनाना, आत्म-चेतना की ओर केन्द्रित होना। आत्मा में प्रेम, प्रसन्नता, आनंद, उत्साह, करुणा और सौंदर्य को सजीव करना सबसे सुंदर संबोधि साधना है। उन्होंने कहा कि मैं आत्मा हूँ इस सत्य का अनुभव करना ही आत्म-ज्ञान है। आत्मा के अंतरतम में परमात्मा की निर्मल अनुभूति परम आत्म-ज्ञान है। उन्होंने कहा कि मोक्ष है - शाश्वत शांति, परिपूर्ण आनंद। जैसे बच्चे परीक्षा खत्म होते ही किताबों को भूलकर अपनी सहज मस्ती में आ जाते हैं, ऐसे ही खुद को चाह और चिंता के बोझ से मुक्त करके अपनी सहज आनंदमयी स्थिति को जीना मोक्ष है।
उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को योग क्रिया
और मंत्र मेडिटेशन का अभ्यास कराया।
कार्यक्रम का शुभारंभ विधायक ताराचंद जैन, बी एल दलाल, अध्यक्ष राज लोढ़ा, वीरेंद्र सिरोया, कालू लाल जैन, हस्तीमल लोढ़ा, प्रकाश चित्तौड़ा, गोपाल जैन, अशोक गुप्ता पंजाब, प्रकाश दफ्तरी जयपुर, रवि टॉक, मनोहर लाल बाफना द्वारा दीप प्रज्वलन कर किया गया। इस दौरान सभी श्रद्धालुओं को प्रकाश कोठारी परिवार द्वारा साहित्य की प्रभावना दी गई। इस अवसर पर वर्षितप तपस्या करने वाले श्रीमती शिल्पा हस्तीमल लोढ़ा परिवार का श्री संघ द्वारा अभिनंदन एवं मंच संचालन हंसराज चौधरी
ने किया।
कार्यक्रम संयोजक प्रकाश कोठारी ने बताया कि राष्ट्रसंत के सोमवार को चित्रकूट नगर के रसिकलाल धारीवाल स्कूल में कैसे लाएं जीवन में शिक्षा और संस्कार पर विशेष प्रवचन आयोजित होंगे।