11/03/2021
महाशिवरात्रि पर्व से हमें बचपन से ही बेहद लगाव रहा है. इसके पीछे कोई ख़ास तर्क होने की बजाय मुख्य कारण यह रहा है कि इस त्यौहार पर हमें अपनी नानी के यहाँ जाने का अवसर मिलता था. नानी के यहाँ जाने का अरमान भला किसका नहीं होता है और 90 के दशक में तो यह और भी ज्यादा रोमांचक था, क्योंकि उस समय मौज-मस्ती, घूमने-फिरने और मेला देखने का पर्याप्त समय भी था. कहते हैं कि यूपी के बलिया जिले में स्थित इस 'जिगिरसर' गाँव में भगवान शिव स्वतः ही प्रकट हुए थे, जिन्होंने गाँव की कई संकटों के समय रक्षा की थी. खैर हमें क्या, हमें तो मेला देखना, गुब्बारे लेना और वह छोटी बन्दूक से गुब्बारे फोड़ने का आनंद लेना रहता था और जलेबियाँ तो कई-कई राउंड चलती थीं, घर आकर बेशक पैंट ख़राब हो जाए. इसी बहाने नानी के घर कुछ दिन रूकने को भी मिल जाता था, साथ ही साथ वहां के अपने दोस्तों से मिलने का आनंद ही कुछ और होता था. समय के साथ, बहुत कुछ बदला है, किन्तु सही ढंग से देखा जाय तो हमारे भारतीय त्यौहार लोक संस्कृति विकसित करने का अवसर ही तो रहे हैं! महाशिवरात्रि-पर्व भी इनमें से एक है, जब भगवान शंकर की पूजा करने के साथ-साथ विभिन्न स्थानों पर आज भी मेला लगता है तो गाँव के सांस्कृतिक विकास और समरसता में यह सहायक भी सिद्ध होता है. फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है. माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था. प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं, इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि भी कहा गया है. कई स्थानों पर यह भी माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह हुआ था.