07/03/2023
लिखूं या नहीं समझ में नही आ रहा। कभी जिम्मेदारियों का अहसास तो कभी पढ़े लिखे नही होने का मलाल। किसको जिम्मेदार ठहराऊं मां–बाप, स्कूल को या खुद को।
कभी कभी लगता है हम धरती पर क्यों हैं? किसके लिए हैं सवाल तो बहुत है जिसका जवाब शायद ही हो। 3 भाइयों में सबसे बड़ा मैं था शुरुआत के दिनों में स्कूल तो गया था लेकिन स्कूल के पढ़ाई की जगह पर काम करवाते थे मास्टर साहब। जो मुझे ठीक नही लगा और मैं स्कूल जाना कम कर दिया। फिर पिताजी बीमार रहने लगे तो घर का भार मेरे ऊपर आ गया। मैं एक रिश्तेदार के साथ कोलकाता जाकर रहने लगा कुछ दिन मैंने वहां काम किया लेकिन वेतन कम होने की वजह से घर चलाना बड़ा ही मुश्किल हो गया। मैं पंजाब जाकर एक फैक्ट्री में काम करने लगा। क्या होली,क्या दिवाली सारे पर्व को सिर्फ महसूस करता था। दस हजार की वेतन में दोनों भाई की पढ़ाई, पिताजी की दवाई, राशन का खर्चा बीबी की फरमाइश अलग उसमें अपने आप के लिए पैसा कहां बचा पता था।
समय बीतता गया पिताजी भी नहीं रहे, एक भाई का जॉब लग गया। दूसरा का ग्रेजुएशन कंप्लीट हो गया। दोनों भाइयों ने शादी कर ली मैंने भी जहां-तहां से पैसे उधार लेकर शादी में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि पत्नी मना करती रही लेकिन बड़ा भाई जो ठहरा फर्ज तो अदा करना ही था। मेरे एक दोस्त के कहने पर मैं साऊथ की तरफ चला गया ओवर टाईम मिला कर 18000 बन जाते थे। नई नवेली दुल्हन ने मां को रखने से साफ इन्कार कर दिया, घर में पत्नी के साथ क्लेश अलग से। बच्चे की पढ़ाई, मां की दवाई, मैं जहां रहता था वहां का खर्चा 18000 भी अब कम पड़ने लगा था। घर, आंगन का बटवारा हो गया था। तीनों की पत्नी का आपस में बोलचाल बंद ।छोटा भाई प्राइवेट जॉब करता था अच्छे पोजिशन पर अच्छा सैलरी उठाता था। दोनों भाई ने अपने अपने जमीन पर अच्छा सा मकान खड़ा कर लिया और मेरा वही खपरैल वाला मकान, प्राइवेट जॉब वाले के पास मोटरसाइकिल तो सरकारी वाले के पास कार। और मैं जब गांव जाता था तब वही पुराना एटलस का साइकिल लेकर घूमता रहता था। आर्थिक तंगी के कारण बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते थे वही दोनों भाइयों के बच्चे प्राइवेट स्कूल में, दोनों की पत्नी अपने बच्चे को मेरे बच्चों के साथ खेलने नहीं देती थी उसे लगता था कि मेरा बच्चा बिगड़ हो जाएगा।
मेरी पत्नी गांव में खेती करती थी। कभी-कभी या लगता था कि कि मैंने जो भाइयों के लिए किया हो सकता है उसकी पत्नी महसूस ना की हो लेकिन भाई को महसूस होता ही होगा। मैं अपने फैक्ट्री में डे के अलावा नाइट शिफ्ट भी करता था कभी-कभी सोते समय यह सोचता था कि काश इस रात का सुबह ना हो। किस हालत में मैं मजदूरी करता था वह मुझे ही पता था और उन तमाम लोगों को पता था जो दूसरे शहर में जाकर मजदूरी करते था। मैं अकेला थोड़ी था जो इस हालात से गुजर रहा था मेरे जैसे लाखों लोग इस चेन्नई शहर में दिन काट रहे थे। सुपरवाइजर से लेकर मैनेजर तक की गलियां सुनता रहा। यहां तक कि पहनावा देखकर रास्ते में भी लोग बिहारी कहते थे और साथ-साथ गाली भी दे जाते थे। आखिर कसूर क्या था मेरा... चलिए थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि बिहार में फैक्ट्री नहीं है बिहार में रोजगार के साधन नहीं है इसलिए बिहारी बाहर जाकर काम करते हैं। लेकिन कोई बंगाल का आदमी दिल्ली में, कोई दिल्ली का आदमी बेंगलुरु में, कोई हरियाणा का आदमी मुंबई में जाकर भी तो काम करता होगा। तो फिर हमारे साथ भेदभाव क्यों? जितना झेलता था चेन्नई में उतना वह क्यों नहीं झेलते थे जो हमारा हक हिस्सा मारकर बैठे थे।
मुझे आज भी याद है कि चुनाव में वोट देने के लिए कई बार तमिलनाडु से बिहार जनरल डिब्बा में जमीन पर सो कर गया था। क्यों किसके लिए? सत्ता आने के बाद तो लोग अपना पेट भरते हैं हम जैसे लोग बेहतर की आस लगाए रह जाते हैं। कल मेरे रिश्तेदार का फोन आया बोला तमिलनाडु में हिंदी बोलने पर मजदूर की हत्या हो गई है। मैं अंदर ही अंदर रो पड़ा गांव में ठेठ भाषा बोलने वाला बड़ी मुश्किल से हिंदी सीखा। बड़ी मुश्किल से मेहनत मजदूरी करके घर का भरण पोषण कर रहा था। नर्क समान जिंदगी जीने को मजबूर था, मुझे याद है कि पिछले डेढ़ साल से मैंने एक शर्ट तक नहीं खरीदा। इतनी मेहनत के बाद भी अपने ही देश में हिंदी बोलने पर मौत किसे पसंद??
एक पल को लगा कर आत्महत्या कर लें जिसको हम लोग पाल पोस कर बड़ा किया जब वह अपना नहीं हो सका, जिन को वोट देकर मैंने कुर्सी पर बैठाया वह अपना नहीं हो सका तो जिनके लिए मजदूरी कर रहा हूं जिनके कंपनी को बढ़ाने के पैसे के बदले लिए दिन रात मेहनत कर रहा हूं वो अपना क्या होगा?? फिर मेरा ध्यान अपने बीवी बच्चों पर गया तो जीने की आस दिखाई दी। अब मैं घर जा रहा हूं वहां शायद खेती बारी ही करूं। ट्रेन किस जनरल बोगी में मेरे जैसे हजारों लोग जो उदास तो जरूर हैं लेकिन इस जिल्लत भरी जिंदगी से हमेशा के लिए दूर हो जाना चाहते हैं।
✍️ अज्ञात