16/03/2026
"जा भाई... अगले जन्म में इसी माँ के आँचल में आना"
आज बहन ने भाई को वो विदाई दी, जो किसी राखी के त्योहार में नसीब नहीं होती। उसने अपने हाथों से भाई के माथे पर सिंदूर लगाया था, आज उसी माथे को सहलाते हुए सिसकियाँ लीं।
उसकी आँखें कह रही थीं—"तेरी कलाई पर राखी तो नहीं बाँध पाई आज, पर दिल से बाँधी है दुआएँ। जा भाई, अगले जन्म में इसी माँ का बेटा बनकर आना। इस बार ज़रा देर तक जीना, इस बार सच में इंजीनियर बनना, इस बार माँ के सपने पूरे करके दिखाना।"
माँ दीवार से लगी खड़ी थी। उसकी आँखों से आँसू नहीं गिर रहे थे, बस रुके हुए थे—जैसे 13 साल से रुके थे। उसने सोचा था कि एक दिन हरीश उठेगा, उसे चाय पीने को बोलेगा, उसकी बनाई रोटी खाएगा। आज वो सपना उसकी आँखों के सामने एम्स की एंबुलेंस में जा रहा था। वो बस इतना बुदबुदाई—"बेटा, अगले जन्म में भी मेरे ही पेट से आना। इस बार तुझे कभी दर्द नहीं होने दूँगी।"
पिता अशोक राणा दरवाजे की चौखट से लगे थे। जिन हाथों ने 13 साल दिल्ली का घर बेचा, सड़कों पर बर्गर बेचे, आज वही हाथ बेटे की नलियाँ हटते देख रहे थे। उनकी आँखों ने ठान ली थी—"जब तक बेटा ज़िंदा है, बाप नहीं रोएगा।" पर अंदर ही अंदर वो टूट रहे थे। उनके सपने थे—बेटा बड़ा होगा, बहू आएगी, पोते खेलेंगे। आज वो सब ख्वाब इस एंबुलेंस के पीछे दौड़ रहे थे।
बहन ने आखिरी बार भाई के माथे को चूमा। उसके होंठ काँप रहे थे, पर दिल की आवाज़ साफ थी—"जा भाई, जा। अगले जन्म में भी मेरा भाई बनकर आना। इसी माँ का बेटा बनकर आना। और इस बार... इस बार राखी के दिन मेरा हाथ खाली मत छोड़ना।"
एंबुलेंस चल पड़ी। पीछे रह गया 13 साल का दर्द, रह गए अधूरे सपने, रह गई एक माँ जिसकी गोद हमेशा के लिए खाली हो गई, रह गया एक बाप जिसने अपने हाथों से अपने बेटे को विदा किया, और रह गई एक बहन जिसने कहा—"जा भाई, अगले जन्म में फिर मिलेंगे।"