23/12/2022
मैंने शायद पहली मर्तबा नूर जहाँ को फ़िल्म 'ख़ानदान' में देखा था। उस ज़माने में वो बेबी थी। हालाँकि पर्दे पर वो हर्गिज़ हर्गिज़ इस क़िस्म की चीज़ मालूम नहीं होती थी। उसके जिस्म में वो तमाम ख़ुतूत, वो तमाम क़ौसें मौजूद थीं जो एक जवान लड़की के जिस्म में हो सकती हैं और जिनकी वो ब वक़्त-ए-ज़रूरत नुमाइश कर सकती है।
नूर जहाँ उन दिनों फ़िल्मबीन लोगों के लिए एक फ़ित्ना थी, क़यामत थी। लेकिन मुझे उसकी शक्ल-ओ-सूरत में ऐसी कोई चीज़ नज़र न आई। एक फ़क़त उसकी आवाज़ क़यामतख़ेज़ थी। सहगल के बाद, मैं नूर जहाँ के गले से मुतास्सिर हुआ। इतनी साफ़-ओ-शफ़्फ़ाफ़ आवाज़, मुर्कियां इतनी वाज़िह, खरज इतना हमवार, पंचम इतना नोकीला! मैंने सोचा, अगर ये लड़की चाहे तो घंटों एक सुर पर खड़ी रह सकती है, उसी तरह, जिस तरह बाज़ीगर तने हुए रस्से पर बग़ैर किसी लग़्ज़िश के खड़े रहते हैं।
नूर जहाँ की आवाज़ में अब वो लोच, वो रस, वो बचपना और वो मासूमियत नहीं रही जो कि उसके गले की इम्तियाज़ी ख़ुसूसियत थी। लेकिन फिर भी नूर जहाँ, नूर जहाँ है। गो लता मंगेशकर की आवाज़ का जादू आज कल हर जगह चल रहा है। अगर कभी नूर जहाँ की आवाज़ फ़िज़ा में बुलंद हो तो कान उस से बे-एतिनाई नहीं बरत सकते।
नूर जहाँ के मुताल्लिक़ बहुत कम आदमी जानते हैं कि वो राग विद्या उतना ही जानती है जितना कि कोई उस्ताद। वो ठुमरी गाती है, ख़याल गाती है। ध्रुपद गाती है और ऐसा गाती है कि गाने का हक़ अदा करती है।
मौसीक़ी की तालीम तो उसने यक़ीनन हासिल की थी कि वो ऐसे घराने में पैदा हुई, जहाँ का माहौल ही ऐसा था। लेकिन एक चीज़ ख़ुदादाद भी होती है। मौसीक़ी के इल्म से किसी का सीना मामूर हो, मगर गले में रस न हो तो आप समझ सकते हैं कि ख़ाली खोली इल्म सुनने वालों पर क्या असर कर सकेगा।
नूर जहाँ के पास इल्म भी था और वो खुदा दाद चीज़ भी कि जिसे गला कहते हैं। ये दोनों चीज़ें मिल जाएं तो क़ियामत का बरपा होना लाज़िमी है।