28/08/2022
ABOUT: महाकालेश्वर पत्थर घाट ॥
नदियों के किनारे जन्म लेने वाली सभ्यताओं ने कालांतर में जरूरतों के मुताबिक सुदूर बसना शुरू कर दिया, लेकिन नदियों से उनका नाता हमेशा अटूट रहा है। जल की जरूरत, परिवहन और संस्कारों का असीम प्रवाह नदियों की धारा के साथ जुड़ा रहा और इसी के चलते घाटों का निर्माण हुआ। रानी लक्ष्मीबाई के ननिहाल बिठूर में विभिन्न राजाओं ने अपने जरूरतों के हिसाब से 52 घाटों का निर्माण कराया था। ये घाट आज भी अपने ऐतिहासिक वैभव से बिठूर को गौरवान्वित कर रहे है | इन्हीं में से एक है 'पत्थर घाट'।
पत्थर घाट पर लगाए गए पत्थरों का रंग लाल है। घाट का इतिहास भी बेहद अनूठा और दिलचस्प है। साल 1814 में लखनऊ के नवाब गजीउद्दीन हैदर के अवध क्षेत्र के मंत्री टिकैत राय ने उन्हें हाथी खरीदने की सलाह दी। नवाब ने राजा टिकैत राय को इसके लिए खजाने से मुद्राएं दिलाईं। इन्ही मुद्राओं से राजा टिकैत राय ने बिठूर में यह घाट बनवाया। घाट बन जाने पर लखनऊ जाकर नवाब से कहा कि हुजूर हाथी तो खरीद लिया परन्तु गंगा उस पार है। उन्होंने इसी बहाने से नवाब को हाथी पर बिठाकर गंगा के उस पार से इस अद्वितीय घाट को दिखाया और कहा वो देखिए हाथी खड़ा है। नवाब उनकी चतुरता और घाट के सौंदर्य को देखकर बहुत खुश हुए। नवाब ने ऐसा ही एक घाट बनारस में बनवाने को कहा लेकिन वह घाट यहां की तुलना में काफी छोटा है।
महाकालेश्वर का मंदिर
इस घाट के ऊपर महादेव का एक भव्य मंदिर है। इसे टिकैत शिव मंदिर और महाकालेश्वर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए दूर-दूर से लोग आते हैैं। मंदिर में एक खास तरीके के पत्थर 'कसौटी' से निर्मित शिवलिंग स्थापित है।