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मेरे अकाउंट पर 100 फ़ॉलोअर हो गए हैं! अपना सपोर्ट देने के लिए आपका धन्यवाद. आप सभी के सपोर्ट के बिना मेरे लिए यह कर पाना...
02/05/2024

मेरे अकाउंट पर 100 फ़ॉलोअर हो गए हैं! अपना सपोर्ट देने के लिए आपका धन्यवाद. आप सभी के सपोर्ट के बिना मेरे लिए यह कर पाना संभव नहीं था. 🙏🤗🎉

26/02/2024

द्वारिका के “द्वार”
तक वही पहुँचते हैं, जिनके हृदय में “द्वारिकाधीष”
होते हैं।

जन आक्रोस रथ का भारतीय जनता  युवा मोर्चा जिला मंत्री स्वरूप सिंह व मंडल महामंत्री जेठमाल सिंह भाटी   के नेतृत्व में मोढ़ा...
05/12/2022

जन आक्रोस रथ का भारतीय जनता युवा मोर्चा जिला मंत्री स्वरूप सिंह व मंडल महामंत्री जेठमाल सिंह भाटी के नेतृत्व में मोढ़ा में ढ़ोल नागारो के साथ युवाओं ने स्वागत किया थान सिंह संवालसिंह कँवराज सिंह जगमालसिंह नारायण सिंह तथा युवाओ ने स्वागत किया

जन जन की हे एक ही पुकार,कांग्रेस को चढा़दो जान लेवा बुखार,*जन आक्रोश यात्रा* में सब करो धमाल,कांग्रेस में हो जाए बडा़ बव...
05/12/2022

जन जन की हे एक ही पुकार,
कांग्रेस को चढा़दो जान लेवा बुखार,
*जन आक्रोश यात्रा* में सब करो धमाल,
कांग्रेस में हो जाए बडा़ बवाल।

गहलोत थारा राज ने घणोई धिक्कार,
थारा सारा मंत्री, निकळ्या सब मक्कार,
अब नी बणेला कोई थारो मददगार,
2023 में आ जासी देखे, भाजपा री पूर्ण बहुमत री सरकार!

गहलोत थारा राज मे तूं,
आम जन सूं, खूब कियो खोटो व्यवहार,
2023 में गिर जासी थारी, ओ खोटी सरकार!

सुख, समृद्ध और खुशहाल हो अपना राजस्थान,
इस मरुधरा में कांग्रेस को नां मिले कोई स्थान,
2023 में कांग्रेस को करादो अब पूरा ही प्रस्थान!

जय भाजपा - तय भाजपा - विजय भाजपा 🚩

प्राय: ऐसा कहा जाता है कि कि संघ एक विकासशील संगठन है। केवल शाखा या विविध कार्य ही नहीं, तो अनेक परम्पराएं भी स्वयं विकस...
11/11/2022

प्राय: ऐसा कहा जाता है कि कि संघ एक विकासशील संगठन है। केवल शाखा या विविध कार्य ही नहीं, तो अनेक परम्पराएं भी स्वयं विकसित होती चलती हैं। पारिवारिक संगठन होने के कारण यहां हर काम के लिए संविधान नहीं देखना पड़ता। बाहर से देखने वाले को शायद यह अजीब लगता हो; पर जो लोग संघ और उसकी कार्यप्रणाली को लम्बे समय से देख रहे हैं, वे इसकी वास्तविकता से परिचित हैं। उनके लिए यह सामान्य बात है।
यदि हम सरसंघचालक परम्परा को देखें, तो परम पूजनीय डाक्टर हेडगेवार को उनके सहयोगियों ने बिना उनकी जानकारी के सरसंघचालक बनाया। डॉ॰ जी ने इस अवसर पर कहा कि आपके आदेश का पालन करते हुए मैं यह जिम्मेदारी ले रहा हूं; पर जैसे ही मुझसे योग्य कोई व्यक्ति आपको मिले, आप उसे यह दायित्व दे देना। मैं एक सामान्य स्वयंसेवक की तरह उनके साथ काम करूंगा। जब डाक्टर जी का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया, तो उन्होंने अपने सहयोगियों से परामर्श कर अपने लंबर-पंचर ऑपरेशन से पूर्व सबके सामने ही श्री गुरुजी को बता दिया कि मेरे बाद आपको संघ का काम संभालना है। इस प्रकार संघ को द्वितीय सरसंघचालक की प्राप्ति हुई।
जब श्री गुरुजी को लगा कि अब यह शरीर लम्बे समय तक साथ नहीं दे पाएगा, तो उन्होंने भी अपने सहयोगी कार्यकर्ताओं से परामर्श किया और एक पत्र द्वारा श्री बालासाहब देवरस को नवीन सरसंघचालक घोषित किया। वह पत्र उनके देहांत के बाद खोला गया था। बालासाहब ने श्री गुरुजी के देहांत के बाद यह जिम्मेदारी संभाली, इससे लोगों के मन में यह धारणा बनी कि यह जिम्मेदारी आजीवन होती है तथा पूर्व सरसंघचालक अपनी इच्छानुसार किसी को भी यह दायित्व दे सकते हैं। संघ विरोधी इसे एक गुप्त संगठन तो कहते ही थे; पर अब उन्होंने इसे अलोकतांत्रिक भी मान लिया।

पुरानी नींव, नया निर्माणसंपादित करें

श्री बालासाहब देवरस ने अपने पूर्व के दोनों सरसंघचालकों द्वारा अपनायी गयी विधि से हटकर नये सरसंघचालक की नियुक्ति की। उन्होंने स्वास्थ्य बहुत खराब होने पर अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में सब प्रतिनिधियों के सम्मुख श्री रज्जू भैया को नया सरसंघचालक घोषित किया। मा० रज्जू भैया और फिर श्री सुदर्शन जी ने भी इसी विधि का पालन किया। इस प्रकार संघ में एक नयी परम्परा विकसित हुई।
इस घटनाक्रम को एक और दृष्टिकोण से देखें। जब बालासाहब ने दायित्व से मुक्ति ली, तब उनका स्वास्थ्य बहुत खराब था। वे पहिया कुर्सी पर ही चल पाते थे। मुंह में बार-बार थूक भर जाता था, अत: बोलने में भी उनको बहुत कठिनाई होती थी। उनके लिखित संदेश ही सब कार्यक्रमों में सुनाए जाते थे। अपनी दैनिक क्रियाएं भी वे किसी के सहयोग से ही कर पाते थे। इस कारण उनकी दायित्व मुक्ति को सबने सहजता से लिया।
दूसरी ओर रज्जू भैया ने जब कार्यभार छोड़ा, तो वे पूर्ण स्वस्थ तो नहीं; पर प्रवास करने योग्य थे। सार्वजनिक रूप से मंच पर बोलने में उन्हें भी कठिनाई होती थी; पर व्यक्तिगत वार्ता वे सहजता से करते थे। दायित्व से मुक्त होकर भी उन्होंने अनेक प्रान्तों का प्रवास किया। अर्थात यदि वे चाहते, तो दो-तीन वर्ष और इस जिम्मेदारी को निभा सकते थे; पर उन्होंने उपयुक्त व्यक्ति पाकर यह कार्यभार छोड़ दिया।
जहां तक पांचवे सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी की बात है, दायित्व मुक्ति तक वे काफी स्वस्थ थे। प्रवास के साथ-साथ सार्वजनिक रूप से बोलने में उन्हें कुछ कठिनाई नहीं थी। फिर भी जब उन्हें लगा कि श्री मोहन भागवत के रूप में एक सुयोग्य एवं ऊर्जावान कार्यकर्ता सामने है, तो उन्होंने भी जिम्मेदारी छोड़ दी। स्पष्ट है कि उन्होंने वही किया, जो आद्य सरसंघचालक डॉ॰ हेडगेवार ने पदभार स्वीकार करते समय कहा था कि जब भी मुझसे अधिक योग्य कार्यकर्ता आपको मिले, आप उसे सरसंघचालक बना दें। मैं उनके निर्देश के अनुसार काम करूंगा। यह है एक परम्परा में विश्वास और दूसरी परम्परा का विकास। पुरानी नींव पर नये निर्माण का इससे अधिक सुंदर उदाहरण और क्या होगा ?

मार्च 2024 तक देशभर में सभी मंडलों में होगा संघ शाखाओं का विस्तार, पिछले एक वर्ष में लगभग 6663 संघ शाखाएँ बढ़ीं
21/10/2022

मार्च 2024 तक देशभर में सभी मंडलों में होगा संघ शाखाओं का विस्तार, पिछले एक वर्ष में लगभग 6663 संघ शाखाएँ बढ़ीं

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