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20/09/2026

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न चादर बड़ी कीजिये न ख्वाहिशें दफन कीजियेचार दिन की ज़िन्दगी है बस चैन से बसर कीजिये
20/09/2026

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इस महिला ने कान्हा की मूर्ति से शादी कर ली! लेकिन सवाल सिर्फ इस शादी का नहीं है…कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति की परंपरा ...
12/09/2026

इस महिला ने कान्हा की मूर्ति से शादी कर ली! लेकिन सवाल सिर्फ इस शादी का नहीं है…
कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति की परंपरा भारत में सदियों पुरानी है। मीरा ने भी कृष्ण को अपना सर्वस्व माना था। इसलिए किसी व्यक्ति की निजी आस्था या भक्ति को सीधे पाखंड कहना उचित नहीं होगा।
लेकिन आज सवाल भक्ति से ज्यादा उसके बदलते स्वरूप और उसके बाजारीकरण का है।
पिछले कुछ वर्षों में घरों में बाल स्वरूप कान्हा की मूर्ति रखने का चलन काफी बढ़ा है। उन्हें बच्चे की तरह सजाना, कपड़े पहनाना, भोग लगाना, बिस्तर तैयार करना और उनकी देखभाल करना—कई भक्त इसे अपनी श्रद्धा का हिस्सा मानते हैं।
आस्था अपनी जगह बिल्कुल सम्मान योग्य है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी भक्ति भी अब एक ट्रेंड और मार्केटिंग सिस्टम का हिस्सा बनती जा रही है?
आज बाजार में कान्हा के लिए अलग-अलग आकार के कपड़े, बिस्तर, सजावटी सामान और तमाम दूसरी चीजें उपलब्ध हैं। यानी श्रद्धा के साथ एक पूरा बाजार भी खड़ा हो चुका है।
समस्या सामान खरीदने में नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब भक्ति का मूल्य हमारी आर्थिक क्षमता से तय होने लगे।
जिस परिवार के पास सीमित संसाधन हैं, उसके लिए भी अगर यह भावना पैदा होने लगे कि बिना विशेष सामान, विशेष पूजा या विशेष व्यवस्था के उसकी भक्ति अधूरी है, तो यह सोचने का विषय है।
और यही सवाल मंदिरों तक भी पहुंचता है।
कई बड़े धार्मिक स्थलों पर VIP दर्शन और विशेष सुविधाओं की व्यवस्था ने यह बहस खड़ी की है कि क्या भगवान के दरबार में भी पैसा और हैसियत हमारे अनुभव को बदलने लगी है?
अगर कोई व्यक्ति अधिक पैसा देकर जल्दी दर्शन कर लेता है और दूसरा व्यक्ति घंटों लाइन में खड़ा रहता है, तो सवाल मंदिर से ज्यादा हमारी धार्मिक व्यवस्था और सामाजिक सोच से है।
भक्ति का अर्थ तो शायद यही होना चाहिए कि अमीर हो या गरीब, हर व्यक्ति को भगवान के सामने समान महसूस हो।
इसलिए सवाल कान्हा को घर में रखने का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या हमने अपनी आस्था को इतना दिखावे और बाजार से जोड़ दिया है कि साधारण भक्ति भी हमें अधूरी लगने लगी है?
और उस महिला की कान्हा की मूर्ति से शादी की बात भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। यह उसकी निजी आस्था हो सकती है, लेकिन इसे देखकर हमें किसी की श्रद्धा का मजाक उड़ाने के बजाय यह जरूर सोचना चाहिए कि हमारी धार्मिक भावनाएँ व्यक्तिगत विश्वास हैं या धीरे-धीरे सामाजिक ट्रेंड और बाजार का हिस्सा बनती जा रही हैं?
भक्ति अगर मन में है, तो उसके लिए दिखावा जरूरी नहीं होना चाहिए।
भगवान तक पहुंचने का रास्ता शायद महंगे सामान, VIP व्यवस्था या सामाजिक प्रदर्शन से नहीं, बल्कि विश्वास, प्रेम और समानता से होकर जाता है।
✍️ Rahul Attri

News Link - https://m.up.punjabkesari.in/uttar-pradesh/news/auraiya-s-girl-became-meera-in-krishna-s-love-1785888

ये रामपाल की किताब "जीने की राह" में पेज नंबर 37 पर लिखा हुआ है।और ये सोच 100% गलत, घटिया और समाज को पीछे ले जाने वाली ह...
12/09/2026

ये रामपाल की किताब "जीने की राह" में पेज नंबर 37 पर लिखा हुआ है।और ये सोच 100% गलत, घटिया और समाज को पीछे ले जाने वाली है।

1. ये वेद विरुद्ध बात है

रामपाल कहता हैं वेदों की बात करता हूँ, पर वेद तो इसके उलटा कहता है।

वेदों में स्त्री के श्रृंगार को अपशगुन नहीं, शुभ माना है।
ऋग्वेद कहता है - स्त्री ही घर की शोभा है। अथर्ववेद में नववधू के सोलह श्रृंगार को समृद्धि और लक्ष्मी का प्रतीक कहा है।

अगर सजना पाप होता तो माता सीता, माता राधा श्रृंगार क्यों करतीं?
शास्त्रों में कहा है - "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" - जहाँ नारी का सम्मान होता है वहीं देवता बसते हैं। जहाँ नारी के कपड़ों से उसकी नियत तय हो, वहाँ देवता तो क्या, इंसानियत भी नहीं बसती।

2. ये मानसिकता आदर्श नहीं, बीमार मानसिकता है

लिखा है - "उनका उद्देश्य स्पष्ट है कि अपने पति के अतिरिक्त अन्य पुरुषों को आकर्षित करना।"

मतलब लेखक खुद ही हर औरत के मन की बात जान गया? ये कौन सा दिव्य ज्ञान है?

ये वही गंदी सोच है जो कहती है कि अगर लड़की के साथ कुछ गलत हुआ तो उसके कपड़ों की वजह से हुआ।

एक पुरुष अगर अच्छा दिखने के लिए जिम जाता है, बढ़िया शर्ट पहनता है, परफ्यूम लगाता है, तो क्या वो भी सारी औरतों को आकर्षित करने के लिए करता है? नहीं। उसे अच्छा लगता है इसलिए करता है। वही अधिकार औरत को क्यों नहीं?

श्रृंगार का मतलब आत्मविश्वास है, चरित्रहीनता नहीं।

3. ये बहू-बेटी वाली परिभाषा ही गुलाम बनाने वाली है

"अच्छी बहू-बेटी के लक्षण नहीं हैं" - अच्छी बहू-बेटी की परिभाषा कौन तय करेगा? जो घर में कैद रहे, सजना बंद कर दे, गली में निकलना बंद कर दे वही अच्छी?

एक अच्छी बहू-बेटी वो है जो पढ़ती-लिखती है, कमाती है, घर संभालती है, सच बोलती है।
उसके कपड़ों से उसके संस्कार नहीं, लिखने वाले के संस्कार पता चलते हैं।

4. इस किताब में ऐसी ही और भी बातें हैं

जीने की राह में यही नहीं, ऐसी बहुत सी बातें लिखी हैं जो आज के कानून और संविधान के खिलाफ हैं। जो किताब औरत को ये सिखाए कि तू सजेगी तो तेरा मन दोषी है, वो जीने की राह नहीं, जीने पर रोक है।

धर्म वो है जो आपको स्वतंत्र बनाए, डराए नहीं। जो ग्रंथ आपको ये सिखाए कि आधी आबादी पर शक करो, वो धर्म ग्रंथ नहीं हो सकता, वो बस एक आदमी की अपनी कुंठा है जो किताब बनकर बिक रही है।

इसलिए इस पन्ने को फाड़ कर फेंक दो, ये ज्ञान नहीं, अज्ञान है। सभ्य समाज में ये किताब जीने की राह नहीं बल्कि मरने की राह हैं।
रामपाल अव्वल दर्जे का कुंठित व्यक्ति है जिसके स्त्री समाज के प्रति बहुत ही निकृष्ट सोच है।
#अज्ञानी_रामपाल #ॐ
Mahent Shukrai Nath Yogi कर्म से ब्राह्मण अमन Mamta Saran

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09/09/2026

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08/09/2026

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जय श्री श्याम खाटू नरेश 🕉️🙏🏻🙋🏻
02/09/2026

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02/09/2026

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01/09/2026

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