21/11/2025
"अहंकार नहीं, संस्कार मेरी पहचान है."
फर्क इतना-सा होता है अहंकार और संस्कार में,
एक दिल तोड़ देता है, दूसरा दिल जोड़ देता है संसार में।
अहंकार कहता है—“झुको मेरे आगे, तभी मैं महान हूँ,”
संस्कार मुस्कुरा कर बोलता है—“मैं झुक जाऊँ, बस तू प्रसन्न रहे, यही मेरी शान हूँ।”
अहंकार ऊँचा दिखने की चाह में खुद को ही छोटा कर देता है,
संस्कार अपनी विनम्रता से हर किसी को बड़ा कर देता है।
अहंकार की आवाज़ तेज़ होती है—चुभती है हर कान में,
संस्कार की बोली धीमी होती है—उतर जाती है सीधे इंसान में।
अहंकार छाया की तरह है—सूरज निकले तो बढ़ जाता है,
संस्कार दीपक की ज्योति है—अंधेरा कितना भी हो, रास्ता दिखा जाता है।
जो झुककर भी जीत जाए, वही असली विजेता कहलाता है,
क्योंकि अहंकार तख्त चाहता है,
और संस्कार—दिलों का राज्य बसाता है।
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