15/08/2020
देख के तिरंगा।
देख के तिरंगा,
मैंने खो दिया अपना संघर्ष।
नीले आसमान में
हर दिशा में झूम रहा है भारतवर्ष।
पतंग के डोर से
आज पेंच पे पेंच लड़ाएंगे।
दुश्मन के हर चाल को देख के
उसकी धज्जियां उड़ाएंगे।
कभी डाल डाल
तो कभी पात पात ,
कभी इस छत पे
तो कभी उस छत पे,
कभी लूट खसोट के
तो कभी घने कोहरे बादलों के बीच
अपनी कल्पना के सागर में
हमवतन होने का वादा निभाएंगे।
जीत की खुशी हो
या हारने(कटने) का गम,
हर डोर के मांझे के रगड़ से
अपने आप को बनाएंगे।
देश को बनाएंगे ।
जय हिन्द
संजीव