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22/07/2026
15/07/2026

यह डिप्टी SS से पहले से अपराधी प्रवृत्ति का है हो सकता RPF वालों के साथी बदतमीजी की हो

15/07/2026

आगरा मामले में आप यह बताईये RPF ठीक है या एक डिप्टी एसएस ऐसे लोगों का आम कर्मचारियों के साथ या आम आदमी के साथ ऐसा व्यवहार कर सकते तो rpf के साथ में बदतमीजी कर सकता है इसलिए तो इसकी और कुटाई होनी चाहिए थी

आगरा कैंट रेलवे स्टेशन पर आरपीएफ (RPF) जवानों और डिप्टी स्टेशन मास्टर के बीच हुआ विवाद आज हर तरफ चर्चा का विषय बना हुआ ह...
14/07/2026

आगरा कैंट रेलवे स्टेशन पर आरपीएफ (RPF) जवानों और डिप्टी स्टेशन मास्टर के बीच हुआ विवाद आज हर तरफ चर्चा का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के एक हिस्से को देखकर आरपीएफ जवानों को कटघरे में खड़ा करना बेहद आसान है, लेकिन क्या हमने कभी सिक्के के दूसरे पहलू को देखने की कोशिश की? "ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती।" किसी भी विवाद की एक पृष्ठभूमि होती है, और इस घटना में भी सुरक्षा बलों का एक ऐसा पक्ष है जिसे रेलवे की मजबूत यूनियनों के शोर में दबा दिया गया है।
1. ऑन-ड्यूटी जवानों की मुस्तैदी या गुनाह?
भारतीय रेलवे में बिना किसी ठोस आपातकालीन कारण के ट्रेन को रोकना या वैक्यूम करना एक गंभीर कानूनी अपराध है। जब हीराकुंड एक्सप्रेस बिना किसी तय शेड्यूल के अचानक प्लेटफॉर्म पर रुक गई, तो वहां तैनात आरपीएफ जवानों का पहला कर्तव्य सुरक्षा सुनिश्चित करना और कारण का पता लगाना था। कल को अगर इसी तरह ट्रेन रुकने से कोई बड़ी आपराधिक घटना या दुर्घटना हो जाती, तो सबसे पहले गाज इन्हीं सुरक्षाकर्मियों पर गिरती। जवान केवल नियमों के तहत अपनी ड्यूटी कर रहे थे, जिसे 'अवैध वसूली' का नाम दे दिया गया।
2. क्या "घसीटना" केवल जवानों की सनक थी?
वायरल वीडियो में स्टेशन मास्टर को ले जाते हुए दिखाया गया है, लेकिन इसके पीछे की व्यावहारिक सच्चाई को समझना जरूरी है। जब कोई व्यक्ति—चाहे वह आम नागरिक हो या कोई बड़ा अधिकारी—सुरक्षा बलों के साथ तीखी बहस करता है, कानून व्यवस्था को चुनौती देता है और स्वेच्छा से थाने जाने से इनकार कर देता है, तो सुरक्षाकर्मियों के पास कानूनन 'न्यूनतम बल' (Minimum Force) का प्रयोग करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यदि स्टेशन मास्टर नियमों का सम्मान करते हुए खुद चलकर थाने चले जाते, तो प्लेटफॉर्म पर ऐसी अप्रिय स्थिति कभी पैदा ही नहीं होती। असहयोग और विरोध के कारण ही जवानों को यह कदम उठाना पड़ा।
3. रेलवे यूनियनों का दबाव और आरपीएफ की लाचारी
इस पूरे मामले में सबसे कड़वा सच रेलवे का आंतरिक ढांचा है। स्टेशन मास्टर, टीटीई और गार्ड जैसे ऑपरेटिंग स्टाफ के पास बेहद शक्तिशाली और संगठित ट्रेड यूनियनें (जैसे NRMU, AISMA) होती हैं। ये यूनियनें किसी भी विवाद को तुरंत 'प्रतिष्ठा की लड़ाई' बना देती हैं और प्रशासन पर दबाव बनाकर एकतरफा कार्रवाई करवाने की ताकत रखती हैं।
इसके विपरीत, आरपीएफ (RPF) एक अनुशासित सशस्त्र बल है। सेना और पुलिस की तरह इन्हें कोई भी ट्रेड यूनियन बनाने या हड़ताल करने का अधिकार नहीं होता। नतीजा यह होता है कि जब भी किसी अन्य रेल कर्मचारी से विवाद होता है, तो पूरा रेलवे स्टाफ एकजुट हो जाता है और आरपीएफ का जवान प्रशासनिक राजनीति में अकेला और लाचार पड़ जाता है।
4. समाज का नजरिया: हमेशा पुलिस ही गलत क्यों?
आज हमारे समाज में एक स्थापित पूर्वाग्रह (Prejudice) बन चुका है कि किसी भी झड़प में हमेशा खाकी वर्दी वाला ही कसूरवार होगा। लोग जवानों की 24-घंटे की तनावपूर्ण ड्यूटी, त्योहारों पर भी परिवार से दूर रहकर यात्रियों की सुरक्षा करना और विपरीत परिस्थितियों में काम करने के जज्बे को भूल जाते हैं। जब वे नियमों का कड़ाई से पालन करवाते हैं, तो उन्हें 'विलेन' बना दिया जाता है।

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