05/06/2026
बाड़मेर की तपती रेत पर जब तापमान 50 डिग्री के करीब पहुंच जाता है, तब पानी सिर्फ एक सुविधा नहीं बल्कि जिंदगी और मौत के बीच का फर्क बन जाता है। लेकिन शिव विधानसभा के गांव सुकालिया/बिजराड़ के हालात देखकर ऐसा लगता है जैसे यहां रहने वाले लोगों की प्यास और परेशानी किसी की प्राथमिकता ही नहीं है।
गांव का बोर लंबे समय से खराब पड़ा है। नतीजा यह है कि महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चे और बेजुबान पशु पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जिन टंकियों में कभी पानी भरा रहता था, वहां आज सन्नाटा और सूखा पसरा हुआ है। पशु प्यासे हैं, लोग परेशान हैं और जिम्मेदार विभाग खामोश हैं।
दूसरी तरफ स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। गांव का कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाए तो उसे इलाज के लिए दूर बिजराड़ या अन्य स्थानों पर जाना पड़ता है। एक गरीब मजदूर परिवार के लिए केवल आने-जाने में ₹800 तक खर्च होना किसी बड़ी मुसीबत से कम नहीं। कई परिवार ऐसे हैं जो आर्थिक तंगी के कारण समय पर इलाज तक नहीं करवा पाते।
सवाल यह है कि आखिर सरहदी गांवों के लोगों का कसूर क्या है? क्या उन्हें स्वच्छ पेयजल और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिलना उनका अधिकार नहीं है? क्या विकास केवल शहरों और बड़े कस्बों तक सीमित रहेगा? जब चुनाव आते हैं तो गांवों की याद आती है, लेकिन जब मूलभूत सुविधाओं की बात होती है तो वही गांव उपेक्षा का शिकार क्यों बन जाते हैं?
आज सुकालिया की पीड़ा सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम ग्रामीण इलाकों की हकीकत है जहां लोग अभी भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यदि 50 डिग्री की भीषण गर्मी में इंसान और बेजुबान पशु पानी के लिए भटक रहे हों, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संवेदनहीनता का भी उदाहरण है।
प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों को अब तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए। खराब पड़े बोर की मरम्मत, पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता है।
सुकालिया के लोग दया नहीं, अपना अधिकार मांग रहे हैं। उन्हें भाषण नहीं, पानी चाहिए। उन्हें वादे नहीं, इलाज चाहिए। और सबसे बढ़कर उन्हें यह भरोसा चाहिए कि इस देश के विकास में उनका हिस्सा भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी शहर में रहने वाले नागरिक का।
इरफान खान
सोशल मीडिया प्रभारी बाड़मेर जिला Aimim
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