Amit kumar

Amit kumar Bhart mata ki jy

आदि शंकराचार्य और भगवती आद्याशक्ति (माँ काली) के बीच का यह प्रसंग अद्वैत दर्शन और शक्ति-तत्व के मिलन की सबसे प्रमाणिक और...
16/08/2026

आदि शंकराचार्य और भगवती आद्याशक्ति (माँ काली) के बीच का यह प्रसंग अद्वैत दर्शन और शक्ति-तत्व के मिलन की सबसे प्रमाणिक और अलौकिक गाथा है। यह कथा काशी (वाराणसी) की पवित्र भूमि पर घटी थी।

आदि शंकराचार्य ने भारतवर्ष में 'अद्वैत वेदांत' की स्थापना की थी। उनका स्पष्ट मत था—"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर"(केवल निराकार ब्रह्म ही सत्य है, यह दृश्य जगत मिथ्या है और जीव ब्रह्म से अलग नहीं है)। शंकराचार्य ज्ञानमार्ग के सर्वोच्च शिखर पर थे। वे मानते थे कि संसार का समस्त रूप, आकार, और लीलाएँ केवल माया का खेल हैं।
हालाँकि वे निर्गुण-निराकार ब्रह्म की साधना में इतने लीन थे कि वे साकार रूप, रूप-रंग और शक्ति (दुर्गाकाली) की महत्ता को ब्रह्म की तुलना में गौण या केवल माया का प्रभाव मानते थे। उन्हें लगता था कि केवल ज्ञान ही पूर्ण है और भक्ति या शक्ति का आश्रय केवल शुरुआती साधकों के लिए है।

एक बार शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ काशी पहुँचे। वहाँ वे अद्वैत सिद्धांत का प्रचार कर रहे थे। एक दिन वे अत्यधिक बीमार पड़ गए (कुछ ग्रंथों के अनुसार उन्हें भीषण ज्वर हुआ था, तो कुछ के अनुसार वे निरंतर कठिन साधना और यात्रा के कारण अत्यधिक अशक्त हो गए थे)।
उनका शरीर इतना दुर्बल हो गया था कि वे गंगा तट की सीढ़ियों पर बैठ गए और उनसे एक कदम भी चला नहीं जा रहा था। उनके शिष्य उस समय उनसे कुछ दूरी पर जल और औषधि लेने गए हुए थे।
तभी वहाँ से एक वृद्ध महिला गुजरी। उनके हाथ में जल का पात्र था। शंकराचार्य ने अत्यंत क्षीण स्वर में उनसे कहा, "हे माते! क्या आप मुझे थोड़ा जल दे सकती हैं?मुझसे उठकर जल के पास जाने की सामर्थ्य नहीं है।"
वृद्ध महिला वहीं रुक गईं और मुस्कुराते हुए बोलीं, "हे संन्यासी! तुम तो स्वयं महान ज्ञानी हो। यदि तुम्हें जल चाहिए, तो स्वयं उठकर ले लो।"
शंकराचार्य ने कातर भाव से कहा, "माता, आप देख रही हैं कि मुझमें उठने की 'शक्ति' नहीं है। बिना शक्ति के मैं हिल भी नहीं सकता।"

वृद्ध स्त्री के चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान आई। वे बोलीं, "हे ज्ञानी संन्यासी! जरा विचार करो तुम कहते हो कि ब्रह्म ही सब कुछ है और माया या शक्ति कुछ नहीं। तो फिर आज तुम बिना 'शक्ति' के एक अंगुली भी क्यों नहीं हिला पा रहे हो? यदि ब्रह्म ही सर्वस्व है, तो बिना शक्ति के तुम्हारा ज्ञान और तुम्हारा शरीर निष्प्राण क्यों पड़ा है?"
स्त्री के इन शब्दों में साधारण बोली नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय सत्य की गूंज थी। शंकराचार्य की आँखें खुल गईं। वे समझ गए कि यह कोई साधारण स्त्री नहीं हैं।
उसी क्षण वह वृद्धा अपने वास्तविक अलौकिक रूप में प्रकट हुईं। उनके एक हाथ में खप्पर, दूसरे में वरमुद्रा और चेहरे पर असीम करुणा थी वे साक्षात महाकाली थीं।
माँ काली ने शंकराचार्य को ज्ञान दिया
शिव और शक्ति एक ही हैं जिस प्रकार अग्नि से उसकी उष्णता (गर्मी) को अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार निर्गुण ब्रह्म (शिव) से उसकी अभिव्यक्ति यानी क्रियात्मक ऊर्जा (शक्ति/काली) को अलग नहीं किया जा सकता।

चेतना जब तक शांत है, वह शिव है। जब वह चेतना गतिमान होती है और संसार की रचना, पालन व संहार करती है, तो वही 'शक्ति' कहलाती है। बिना शक्ति के शिव भी 'शव' (निश्चेष्ट) के समान हैं।
सौंदर्य लहरी और शक्ति की स्वीकृति
माँ काली के इस साक्षात्कार ने शंकराचार्य का बचा-कुचा बौद्धिक अहंकार और यह भ्रम समाप्त कर दिया कि शक्ति केवल एक मिथ्या माया है।
उन्होंने माँ काली के चरणों में शीश नवाया और उनसे क्षमा मांगी। माँ के स्पर्श मात्र से उनका शरीर पुनः ऊर्जावान हो गया।
इस दिव्य घटना के बाद ही आदि शंकराचार्य ने केवल ज्ञानमार्ग ही नहीं, बल्कि भक्ति और शक्ति-साधना को भी अद्वैत का ही अंग माना। उन्होंने प्रसिद्ध 'सौंदर्य लहरी' और 'कनकधारा स्तोत्र' जैसे महान शक्ति-ग्रंथों की रचना की।
सौंदर्य लहरी का पहला ही श्लोक इस घटना का प्रमाण देता है:

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं।
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि॥
अर्थ: परमशिव केवल तब ही ब्रह्मांड की सृष्टि या कोई क्रिया करने में समर्थ होते हैं, जब वे शक्ति (माँ काली/पार्वती) से युक्त होते हैं। यदि वे शक्ति से रहित हों, तो वे एक स्पंदन (हिलना-डुलना) भी नहीं कर सकते।

💫 "तेरा काल कहीं और जन्म ले चुका है!" - जब कंस के दरबार में गिरा काकासुर... ⚡कंस इस बात से भयानक डरा हुआ था कि उसके 'काल...
15/08/2026

💫 "तेरा काल कहीं और जन्म ले चुका है!" - जब कंस के दरबार में गिरा काकासुर... ⚡
कंस इस बात से भयानक डरा हुआ था कि उसके 'काल' ने जन्म ले लिया है। बंदीगृह में पहुँचकर उसने क्रोध में देवकी से उस नवजात शिशु को छीन लिया। माँ देवकी ने हाथ जोड़कर बहुत विनती की, "भैया! यह तो एक छोटी सी कन्या है, यह तुम्हारा क्या बिगाड़ेगी? मैंने अपने छह पुत्र खो दिए, मुझ पर दया करो!" 🥺
लेकिन क्रूर कंस पर इस करुणा का कोई असर नहीं हुआ। जैसे ही उसने उस कन्या को चट्टान पर पटकना चाहा, वह उसके हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गई! 💫
वह कोई साधारण कन्या नहीं, बल्कि साक्षात श्रीकृष्ण की योगमाया थीं। अष्टभुजी देवी के रूप में प्रकट होकर उन्होंने कंस को चेतावनी दी:
"रे मूर्ख! मुझे मारने से तुझे क्या मिलेगा? तेरा वध करने वाला शत्रु कहीं और जन्म ले चुका है!"
(यही देवी बाद में विंध्याचल में माता विंध्येश्वरी के नाम से प्रसिद्ध हुईं)। 🌺
🌪️ कंस का खौफ और राक्षसों का अंत
योगमाया की भविष्यवाणी से घबराकर कंस ने अपने दुष्ट मंत्रियों के साथ मिलकर एक खौफनाक योजना बनाई—दस दिन के भीतर जन्मे सभी बालकों की हत्या! इसके बाद गोकुल में राक्षसों का उत्पात शुरू हो गया:
पूतना का उद्धार: सुंदर गोपी का रूप धरकर आई राक्षसी पूतना ने जब नन्हे कान्हा को अपना विषैला दूध पिलाने की कोशिश की, तो प्रभु ने दूध के साथ उसके प्राण भी खींच लिए और उसे यमलोक भेज दिया! ⚡
काकासुर की दुर्गति: एक दिन नन्हे कान्हा पालने में अपनी मस्ती में खेल रहे थे, तभी भयंकर कौवे का रूप धारण कर 'काकासुर' वहाँ आ धमका। उसने डराने के बाद प्रभु पर झपट्टा मारा। लेकिन बालरूप भगवान ने अपने नन्हे हाथों से उसकी गर्दन पकड़ी और उसे इतनी जोर से घुमाकर फेंका कि वह सीधे मथुरा में कंस के दरबार में जा गिरा! 🦅💥
होश में आने पर काकासुर ने कांपते हुए कंस से कहा- "राजन! जिसने मेरी यह दुर्दशा की है, वह कोई साधारण बालक नहीं, निश्चित ही साक्षात भगवान श्रीहरि ने अवतार ले लिया है!" 🪷
✨ इस कथा से हमें क्या सीख मिलती है?
अहंकार और क्रूरता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है।
ईश्वर की इच्छा और उनकी लीलाओं के आगे बड़े-बड़े असुर भी बेबस हो जाते हैं।
जय श्री कृष्ण! 🙏 प्रेम से बोलिए राधे-राधे! ❤️

जब न समय था, न आकाश, न पृथ्वी, न प्रकाश और न ही अंधकार, तब संपूर्ण अस्तित्व एक ऐसी रहस्यमय निस्तब्धता में स्थित था जिसकी...
15/08/2026

जब न समय था, न आकाश, न पृथ्वी, न प्रकाश और न ही अंधकार, तब संपूर्ण अस्तित्व एक ऐसी रहस्यमय निस्तब्धता में स्थित था जिसकी कल्पना करना भी मनुष्य के लिए कठिन है। न कोई ग्रह था, न कोई तारा, न कोई लोक और न ही जीवन का कोई चिन्ह। उस अनंत मौन के बीच केवल एक दिव्य चेतना विद्यमान थी, जिसे सनातन परंपरा में आदि शक्ति के रूप में स्मरण किया जाता है। वही आदि शक्ति अनंत ऊर्जा का स्वरूप थीं, वही सृष्टि की मूल शक्ति थीं और वही वह परम चेतना थीं जिसमें सृष्टि के प्रकट होने से पहले भी सब कुछ संभावित रूप में विद्यमान था। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से उस अनंत शून्य को देखा और उनके भीतर एक संकल्प उत्पन्न हुआ—अब सृष्टि का प्रथम अध्याय आरंभ होगा, अब मौन में गति आएगी, अब अनंत चेतना से अनगिनत लोकों और जीवन का विस्तार होगा।

आदि शक्ति ने कहा, “मैं ही आदि हूं, मैं ही अनंत हूं। मुझसे ही सृष्टि जन्म लेती है और प्रलय के बाद सब कुछ फिर मुझमें ही विलीन हो जाता है। अब समय आ गया है कि इस अनंत चेतना से सृष्टि की प्रथम लीला आरंभ हो।” उनके संकल्प के साथ ही उस निस्तब्धता में एक दिव्य कंपन उत्पन्न हुआ। वह कंपन धीरे-धीरे प्रकाश में बदलने लगा और उस प्रकाश से एक अद्भुत दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ। आदि शक्ति ने कहा, “हे दिव्य चेतना, जो आने वाले अनंत लोकों का पालन करेगी, प्रकट हो।” उसी क्षण भगवान नारायण का दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ। उनके चारों ओर अलौकिक प्रकाश था और उनकी उपस्थिति से जैसे अनंत शांति का अनुभव होने लगा। नारायण ने आदि शक्ति के सामने नतमस्तक होकर कहा, “मातेश्वरी, आपके संकल्प से ही मेरा अस्तित्व है। मैं प्रण लेता हूं कि जब तक सृष्टि में एक भी जीव धर्म और सत्य का आश्रय चाहता रहेगा, तब तक मैं उसके संरक्षण के लिए उपस्थित रहूंगा।”

आदि शक्ति ने नारायण की ओर देखकर कहा, “तुम सृष्टि के पालन का भार संभालोगे। जब धर्म कमजोर होगा, जब अधर्म बढ़ेगा और जब जीव अपनी मर्यादा भूलेंगे, तब तुम विभिन्न रूपों में प्रकट होकर संतुलन स्थापित करोगे। तुम्हारा कार्य केवल जीवन को बनाए रखना नहीं होगा, बल्कि धर्म की रक्षा करना भी होगा।” नारायण ने हाथ जोड़कर कहा, “माते, जब तक सृष्टि में धर्म की एक किरण भी जीवित रहेगी, मैं उसकी रक्षा के लिए अपना कर्तव्य निभाऊंगा।”

इसके बाद आदि शक्ति ने कहा, “अब सृष्टि को एक रचयिता की आवश्यकता है। ऐसा स्वरूप चाहिए जो मेरे संकल्प को आकार दे और अनंत लोकों की रचना करे। प्रकट हो ब्रह्मदेव।” उनके संकल्प से एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और उसी प्रकाश से भगवान ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ। ब्रह्मदेव ने आदि शक्ति को प्रणाम किया। आदि शक्ति ने कहा, “हे ब्रह्मदेव, ज्ञान तुम्हारा स्वरूप होगा और सृष्टि तुम्हारे संकल्प से आकार लेगी। तुम्हारे भीतर वेदों का ज्ञान प्रवाहित होगा। तुम्हें अनंत लोकों, जीवों और सृष्टि की व्यवस्था का निर्माण करना होगा।” ब्रह्मदेव ने विनम्र होकर कहा, “मातेश्वरी, आपके आशीर्वाद के बिना मैं एक भी रचना नहीं कर सकता। आपके ज्ञान और शक्ति के आधार पर ही सृष्टि का विस्तार करूंगा।”

लेकिन आदि शक्ति जानती थीं कि केवल सृजन और पालन से सृष्टि का संतुलन पूर्ण नहीं होगा। जो जन्म लेता है, उसमें परिवर्तन भी आवश्यक है। जो व्यवस्था बनती है, उसमें कभी-कभी पुरानी संरचनाओं का अंत करके नए जीवन के लिए स्थान बनाना पड़ता है। इसलिए उन्होंने कहा, “सृष्टि का संतुलन तभी संभव है जब परिवर्तन का नियम भी स्थापित हो। प्रकट हो महादेव।” उनके शब्दों के साथ ही अनंत आकाश में दिव्य तेज एकत्र होने लगा। वह तेज इतना प्रचंड था कि जैसे अनगिनत सूर्य एक साथ प्रकाशित हो गए हों। उसी दिव्य प्रकाश से भगवान महादेव का स्वरूप प्रकट हुआ। जटाओं में गंगा, मस्तक पर अर्धचंद्र, कंठ में वासुकी और हाथ में त्रिशूल धारण किए महादेव शांत भाव से खड़े थे। उनके भीतर वैराग्य भी था और अपार शक्ति भी। महादेव ने आदि शक्ति को प्रणाम किया और कहा, “मातेश्वरी, जब भी सृष्टि का संतुलन बिगड़ेगा और परिवर्तन आवश्यक होगा, मैं अपना कर्तव्य निभाऊंगा।”

आदि शक्ति ने तीनों दिव्य शक्तियों की ओर देखा और कहा, “हे ब्रह्मा, हे नारायण, हे महादेव, तुम तीन अलग-अलग नहीं हो। तुम मेरे एक ही संकल्प के तीन महान स्वरूप हो। ब्रह्मा सृजन की शक्ति हैं, नारायण पालन की शक्ति हैं और महादेव परिवर्तन तथा संहार की शक्ति हैं। सृष्टि का चक्र तभी चलता रहेगा जब इन तीनों के बीच संतुलन बना रहेगा।” महादेव ने कहा, “मातेश्वरी, संहार का अर्थ केवल अंत नहीं है। जहां पुराना समाप्त होता है, वहीं नए सृजन का द्वार खुलता है। मेरा तांडव विनाश का प्रतीक नहीं, बल्कि परिवर्तन और पुनर्संतुलन का भी प्रतीक होगा।”

अब सृष्टि के प्रथम आधार की आवश्यकता थी। आदि शक्ति ने अपने संकल्प से पांच महान तत्वों को प्रकट किया। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। उन्होंने कहा, “हे पंचमहाभूतों, तुम मिलकर अनंत सृष्टि का आधार बनो। पृथ्वी जीवन को धारण करेगी, जल जीवन को पोषण देगा, अग्नि ऊर्जा और परिवर्तन का आधार बनेगी, वायु गति और प्राण का माध्यम होगी और आकाश सबको स्थान प्रदान करेगा।” पंचमहाभूतों के प्रकट होते ही सृष्टि ने पहली बार एक निश्चित स्वरूप लेना शुरू किया।

लेकिन अब भी एक प्रश्न था। यदि सब कुछ अस्तित्व में आ गया, तो यह सब चलेगा कैसे? आदि शक्ति ने कहा, “व्यवस्था का आधार है काल। अब समय का जन्म होगा।” उसी क्षण काल की शक्ति प्रकट हुई। आदि शक्ति ने कहा, “हे काल, तुम गति हो, परिवर्तन हो और सृष्टि के प्रत्येक क्षण के साक्षी हो। तुम्हारे बिना सृष्टि स्थिर चित्र बनकर रह जाएगी।” काल ने प्रणाम करते हुए कहा, “मातेश्वरी, आपकी आज्ञा से अब परिवर्तन का प्रवाह आरंभ होगा।” और उसी क्षण क्षण, पल, दिन, रात, ऋतु और युगों की अवधारणा का विस्तार होने लगा।

समय के प्रवाह के साथ ग्रह, नक्षत्र और अनगिनत लोक अपने-अपने मार्ग पर स्थापित होने लगे। आकाश में प्रकाश के स्रोत प्रकट हुए और ब्रह्मांड का विस्तार होने लगा। ब्रह्मदेव ने आदि शक्ति से कहा, “मातेश्वरी, अब सृष्टि को विस्तृत करने का समय आ गया है।” आदि शक्ति ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा, “तुम्हें सृजन की दिव्य शक्ति प्रदान करती हूं। अपनी बुद्धि, तप और वेदज्ञान से अनंत लोकों का निर्माण करो। प्रत्येक लोक का अपना धर्म, अपना उद्देश्य और अपना नियम होगा।”

ब्रह्मदेव ने सबसे पहले लोकों की व्यवस्था आरंभ की। अलग-अलग लोकों का निर्माण हुआ और प्रत्येक लोक को उसकी प्रकृति तथा कर्म के अनुसार व्यवस्था प्रदान की गई। ब्रह्मदेव ने कहा, “सृष्टि तभी स्थिर रह सकती है जब प्रत्येक लोक अपने धर्म का पालन करे।” आदि शक्ति ने कहा, “स्मरण रखना, धर्म केवल किसी एक लोक की व्यवस्था नहीं है। धर्म वह शक्ति है जो समस्त सृष्टि को संतुलित रखती है।”

तभी नारायण ने प्रश्न किया, “मातेश्वरी, यदि कभी धर्म कमजोर हो गया तो क्या होगा?” आदि शक्ति ने कहा, “जब-जब धर्म डगमगाएगा, तब तुम्हारा कार्य आरंभ होगा। तुम समय-समय पर विभिन्न रूपों में प्रकट होकर धर्म की पुनर्स्थापना करोगे।” नारायण ने प्रणाम करते हुए कहा, “माते, जब तक एक भी प्राणी धर्म का आश्रय चाहता रहेगा, मैं उसकी रक्षा के लिए उपस्थित रहूंगा।”

अब सृष्टि को ज्ञान, समृद्धि और अधर्म के विनाश की शक्तियों की आवश्यकता थी। आदि शक्ति ने कहा, “सृष्टि केवल पदार्थ से पूर्ण नहीं होगी। उसे ज्ञान चाहिए, उसे समृद्धि चाहिए और उसे अधर्म के विरुद्ध शक्ति भी चाहिए।” उन्होंने सबसे पहले महासरस्वती को प्रकट किया। उनके हाथों में वीणा थी और उनके चारों ओर ज्ञान का दिव्य प्रकाश फैल रहा था। आदि शक्ति ने कहा, “हे महासरस्वती, तुम ज्ञान और विवेक का प्रकाश बनो। जहां अज्ञान का अंधकार होगा, वहां तुम्हारा ज्ञान सत्य का दीप जलाएगा।” महासरस्वती ने कहा, “माते, जहां ज्ञान होगा, वहां मनुष्य सत्य और विवेक के मार्ग को पहचान सकेगा।”

इसके बाद आदि शक्ति ने महालक्ष्मी को प्रकट किया। उनके प्रकट होते ही चारों ओर सौभाग्य, समृद्धि और मंगल की ऊर्जा फैल गई। आदि शक्ति ने कहा, “हे महालक्ष्मी, तुम समृद्धि, सौभाग्य और मंगल की शक्ति बनो। जहां धर्म और सदाचार होगा, वहां तुम्हारी कृपा बनी रहेगी।” महालक्ष्मी ने कहा, “माते, मैं वहां निवास करूंगी जहां परिश्रम, धर्म, सत्य और करुणा का सम्मान होगा।”

फिर आदि शक्ति ने अपनी तीसरी महान शक्ति का आह्वान किया। उनके भीतर से महाकाली की दिव्य शक्ति प्रकट हुई। उनका स्वरूप प्रचंड था, लेकिन उनकी दृष्टि धर्मात्माओं के लिए करुणा से भरी हुई थी। आदि शक्ति ने कहा, “हे महाकाली, जब अधर्म अपनी सीमा पार कर जाए, जब निर्दोषों पर अत्याचार हो और जब सत्य को दबाने का प्रयास किया जाए, तब तुम मेरी अजेय शक्ति बनकर प्रकट होना।” महाकाली ने कहा, “माते, मेरा क्रोध केवल अधर्म के लिए होगा। धर्मात्माओं के लिए मैं सदैव करुणामयी माता रहूंगी।”

आदि शक्ति ने कहा, “महासरस्वती ज्ञान का प्रकाश हैं, महालक्ष्मी समृद्धि का आधार हैं और महाकाली धर्म की रक्षा करने वाली शक्ति हैं। तुम तीनों मिलकर सृष्टि में संतुलन बनाए रखोगी।” इस प्रकार सृष्टि में ज्ञान, समृद्धि और शक्ति का संतुलन स्थापित हुआ।

अब ब्रह्मदेव को जीवन की रचना का कार्य सौंपा गया। उन्होंने कहा, “मातेश्वरी, मैं ऐसी संतानों की रचना करूंगा जो धर्म, तप, सत्य और मर्यादा का मार्ग आगे बढ़ाएं।” उनकी रचना से विभिन्न दिव्य प्रजापति और जीवों की उत्पत्ति का क्रम आरंभ हुआ। सृष्टि में जीवन के अनेक रूप दिखाई देने लगे। प्रत्येक जीव के भीतर चेतना की एक दिव्य ज्योति विद्यमान थी। आदि शक्ति ने कहा, “स्मरण रखना, प्रत्येक जीव में वही दिव्य चेतना है जो संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। इसलिए किसी जीव को केवल उसके रूप या आकार से छोटा मत समझना।”

समय आगे बढ़ा और आदि शक्ति ने मानव जीवन के प्रथम अध्याय की तैयारी की। उन्होंने कहा, “अब ऐसी आत्माएं प्रकट होंगी जिन्हें कर्म, धर्म और स्वतंत्र इच्छा का मार्ग चुनने का अवसर मिलेगा। यही मानव जीवन को विशेष बनाएगा।” उनके संकल्प से मनु और शतरूपा का प्राकट्य हुआ। दोनों ने आदि शक्ति को प्रणाम किया। आदि शक्ति ने कहा, “हे मनु, हे शतरूपा, आज से मानव जाति के भविष्य की आधारशिला तुम्हारे कर्मों से रखी जाएगी। तुम्हें स्वतंत्र इच्छा का वरदान देती हूं, लेकिन उसके साथ धर्म का दायित्व भी देती हूं।”

मनु ने कहा, “मातेश्वरी, हम सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प करते हैं।” शतरूपा ने कहा, “हम प्रकृति, प्रजा और जीवन का सम्मान करेंगे।” आदि शक्ति ने कहा, “स्मरण रखना, धर्म केवल पूजा में नहीं बल्कि प्रत्येक कर्म की पवित्रता में बसता है। प्रजा की रक्षा, सत्य का पालन, करुणा और प्रकृति का सम्मान ही मानव जीवन की वास्तविक परीक्षा होगी।”

मनु और शतरूपा पृथ्वी की ओर बढ़े। आदि शक्ति ने पृथ्वी से कहा, “हे पृथ्वी, अब जीवन को अपनी गोद में स्थान दो। तुम्हारी धरा पर धर्म, प्रेम और करुणा के बीज अंकुरित होंगे।” पृथ्वी ने कहा, “माते, मैं सभी प्राणियों को धारण करूंगी और आपकी व्यवस्था का पालन करूंगी।” देखते ही देखते पृथ्वी पर जीवन के अनगिनत रूप फैलने लगे। वन, पर्वत, नदियां और जीव-जगत सृष्टि के इस महान चक्र का हिस्सा बनने लगे।

मनु और शतरूपा ने पृथ्वी पर उतरकर मानव जीवन का नया अध्याय आरंभ किया। उन्होंने अपनी संतानों को सिखाया कि पृथ्वी केवल रहने का स्थान नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है। उन्होंने कहा, “जहां धर्म रहेगा वहां समृद्धि रहेगी, जहां सत्य रहेगा वहां शांति रहेगी और जहां करुणा रहेगी वहां स्वयं ईश्वर का वास होगा। प्रकृति की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है क्योंकि प्रकृति स्वयं आदि शक्ति का स्वरूप है।”

लेकिन आदि शक्ति जानती थीं कि स्वतंत्र इच्छा के साथ परीक्षा भी आएगी। उन्होंने मानव से कहा, “हे मानव, मैंने तुम्हें बुद्धि दी, करुणा दी और स्वतंत्र इच्छा का वरदान दिया है। अब यह तुम्हारा निर्णय होगा कि तुम धर्म का मार्ग चुनते हो या अधर्म का। तुम्हारे कर्म ही तुम्हारे भविष्य का निर्माण करेंगे। अहंकार पतन का पहला कदम है और विनम्रता सच्चे ज्ञान का द्वार।”

ब्रह्मदेव ने कहा, “ज्ञान, धर्म और करुणा मानवता की सबसे बड़ी शक्तियां होंगी।” नारायण ने कहा, “जब भी अधर्म बढ़ेगा, मैं धर्म की रक्षा के लिए उपस्थित रहूंगा।” महादेव ने शांत स्वर में कहा, “और जब परिवर्तन आवश्यक होगा, तब मेरा तांडव सृष्टि के संतुलन को पुनः स्थापित करेगा।” आदि शक्ति ने तीनों की ओर देखकर कहा, “यही सनातन नियम है—सृजन, पालन और परिवर्तन। यही सृष्टि का चक्र है।”

समय आगे बढ़ता रहा। युग आए और चले गए। जीवन जन्म लेता रहा, कर्म करता रहा और फिर परिवर्तन के नियम में प्रवेश करता रहा। लेकिन सृष्टि का मूल नियम कभी नहीं बदला। जो उत्पन्न हुआ वह बदलेगा, जो बदला वह किसी नए सृजन का कारण बनेगा और जो सृजित हुआ वह एक दिन फिर उसी अनंत चेतना में विलीन होगा जिससे यह महान लीला आरंभ हुई थी।

यही आदि शक्ति की सबसे बड़ी लीला है। सृष्टि कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाला एक दिव्य चक्र है। ब्रह्मा सृजन की शक्ति का प्रतीक हैं, विष्णु पालन और संतुलन के, महादेव परिवर्तन और संहार के, सरस्वती ज्ञान की, लक्ष्मी समृद्धि की और महाकाली धर्म की रक्षा करने वाली शक्ति की। इन सभी शक्तियों के पीछे वही परम चेतना है जिसे सनातन परंपरा आदि शक्ति के नाम से स्मरण करती है।

और जब कभी संसार में अधर्म बढ़ता है, जब सत्य कमजोर पड़ता है और जब मानव अपने वास्तविक कर्तव्य को भूल जाता है, तब वही सनातन शक्ति किसी न किसी रूप में धर्म का स्मरण कराती है। क्योंकि सृष्टि का नियम केवल जन्म और मृत्यु नहीं है। यह कर्म, धर्म, परिवर्तन और पुनः सृजन का अनंत चक्र है। मनुष्य के पास स्वतंत्र इच्छा है, लेकिन उसके कर्मों का परिणाम भी उसी सनातन नियम का हिस्सा है।

इसलिए आदि शक्ति का संदेश केवल प्राचीन काल की कथा नहीं, बल्कि आज के जीवन के लिए भी एक गहरा संदेश है—ज्ञान का सम्मान करो, प्रकृति की रक्षा करो, सत्य का साथ दो, अहंकार से दूर रहो, कमजोर के प्रति करुणा रखो और अपने कर्मों को धर्म के अनुसार करने का प्रयास करो। क्योंकि जहां ज्ञान होगा वहां अज्ञान का अंधकार नहीं टिकेगा, जहां सत्य होगा वहां भय कम होगा, जहां करुणा होगी वहां मानवता जीवित रहेगी और जहां धर्म होगा वहां सृष्टि का संतुलन बना रहेगा। यही वह दिव्य संकल्प था जिससे सृष्टि की पहली श्वास चली और यही वह सनातन चक्र है जो अनंत काल तक चलता रहेगा। जय आदि शक्ति। जय ब्रह्मदेव। जय श्री हरि विष्णु। हर हर महादेव।

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