22/10/2026
यहाँ नवरात्रि व्रत कथा की वह पूरी पौराणिक कहानी दी गई है जो चैत्र और शारदीय नवरात्रि के समय सुनी जाती है। यह कहानी सुमति नाम की एक धार्मिक कन्या की है, जिसने मां दुर्गा के व्रत के प्रभाव से अपने सारे कष्ट दूर कर लिए।
पीठ ब्राह्मण और सुमति की कहानी
प्राचीन काल में मनोहर नगर में पीठ नाम का एक अनाथ ब्राह्मण रहता था। वह मां भगवती दुर्गा का परम भक्त था। उसकी एक अत्यंत सुंदर और गुणवान कन्या थी, जिसका नाम सुमति था।
सुमति बचपन से ही बहुत धार्मिक स्वभाव की थी। वह रोज़ सुबह उठकर अपने पिता के साथ मां दुर्गा की पूजा-अर्चना और सेवा किया करती थी।
सुमति की भूल और पिता का क्रोध
एक दिन सुमति खेल-कूद में इतनी व्यस्त हो गई कि वह सुबह की पूजा में शामिल नहीं हो पाई। जब उसके पिता पीठ ने देखा कि सुमति पूजा में नहीं आई, तो उन्हें बहुत क्रोध आया।
क्रोध में आकर पिता ने सुमति से कहा, "तुमने आज भगवती की पूजा नहीं की। मैं तुम्हारा विवाह किसी ऐसे दरिद्र और कुष्ठ रोगी से करूँगा, जो तुम्हें दो वक्त का भोजन भी न दे सके।"
पिता की यह बात सुनकर सुमति ने बहुत ही शांत और विनम्र भाव से उत्तर दिया, "हे पिता! आप मेरे पूज्य हैं, इसलिए आप जैसा चाहें वैसा कर सकते हैं। लेकिन मनुष्य को वही मिलता है जो उसके भाग्य में लिखा होता है। राजा हो या रंक, सब अपने कर्मों का फल भोगते हैं।"
कुष्ठ रोगी से विवाह
बेटी की यह स्पष्ट और निर्भीक बात सुनकर ब्राह्मण पीठ का क्रोध और बढ़ गया। उन्होंने अपनी बात सच साबित करने के लिए सुमति का विवाह अत्यंत दरिद्र और भयंकर कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्ति के साथ कर दिया।
विवाह के बाद सुमति अपने पति को लेकर एक घने जंगल में चली गई। वहां रहने के लिए न तो कोई घर था और न ही खाने के लिए भोजन। सुमति का पति लाचार था, इसलिए सुमति खुद जंगल से कंद-मूल चुनकर लाती और अपने पति की सेवा करती। उनका जीवन अत्यंत कष्टमय बीत रहा था।
माँ दुर्गा का प्रकट होना
सुमति के इस पतिव्रता धर्म और धीरज को देखकर आदि शक्ति मां दुर्गा अत्यंत प्रसन्न हुईं। एक दिन मां दुर्गा सुमति के सामने साक्षात प्रकट हो गईं और बोलीं, "हे सुमति! मैं तुम्हारे पातिव्रत्य और भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। मांगो, तुम्हें क्या वरदान चाहिए?"
अचानक मां भगवती को सामने देखकर सुमति की आंखों में आंसू आ गए। उसने हाथ जोड़कर कहा, "हे जगतजननी! मैं एक अज्ञानी कन्या हूँ, मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ? कृपा कर मुझे यह बताएं कि आपने मुझ पर यह कृपा किस पुण्य के कारण की है?"
पूर्व जन्म का पुण्य और नवरात्रि व्रत
तब मां दुर्गा ने सुमति को उसके पूर्व जन्म की बात याद दिलाते हुए कहा:
• "तुम पूर्व जन्म में एक भील की पत्नी थीं और तुम्हारा नाम 'जयंती' था।
• एक बार तुम्हारे पति ने चोरी की, जिसके कारण तुम दोनों को बंदीगृह (जेल) में डाल दिया गया।
• वहां तुम दोनों को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक नौ दिनों तक भूखा-प्यासा रहना पड़ा।
• अनजाने में ही सही, लेकिन तुमने नवरात्रि का नौ दिनों का निराहार व्रत पूरा कर लिया। उसी व्रत के पुण्य प्रताप से आज मैं तुम्हारे सामने प्रकट हुई हूँ।"
यह सुनकर सुमति ने मां दुर्गा से प्रार्थना की, "हे माता! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो कृपा करके मेरे पति का यह भयानक कुष्ठ रोग दूर कर दीजिए और उन्हें एक सुंदर काया प्रदान कीजिए।"
कथा का सुखद अंत
मां दुर्गा ने मुस्कुराते हुए कहा, "तथास्तु! तुम्हारे पूर्व जन्म के व्रत के पुण्य का कुछ भाग मैं तुम्हारे पति को देती हूँ।"
मां दुर्गा के इतना कहते ही सुमति के पति का कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक हो गया। उसका शरीर सोने की तरह चमकने लगा और वह एक अत्यंत सुंदर और बलवान युवक बन गया। माता की कृपा से उन्हें धन, ऐश्वर्य और महल जैसी सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त हो गईं। अंत में वे दोनों देवी लोक को सिधारे।
कथा का महत्व: जो भी व्यक्ति नवरात्रि के नौ दिनों में पूरी श्रद्धा के साथ मां दुर्गा के स्वरूपों की पूजा करता है और इस व्रत कथा को सुनता है, उसके जीवन के सभी संकट, रोग और दरिद्रता दूर हो जाते हैं।