31/05/2026
हनुमान बेनीवाल की सुरक्षा हटाने का फैसला केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार और राजनीतिक प्रतिशोध की मानसिकता का प्रतीक दिखाई देता है। जब कोई नेता लगातार जनता के मुद्दों को सड़क से लेकर संसद तक उठाता है, किसानों, युवाओं और आम लोगों की आवाज बनकर सरकार से सवाल पूछता है, तब उसका जवाब लोकतंत्र में तर्क और जवाबदेही से दिया जाना चाहिए, न कि दबाव और प्रताड़ना के संकेतों से।
जिस व्यक्ति ने वर्षों से सत्ता के गलत फैसलों को खुलकर चुनौती दी हो, जिसकी आवाज को लाखों लोग सुनते हों, उसकी सुरक्षा को राजनीति का हथियार बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ माना जाएगा। अगर सरकार को लगता है कि विरोध की आवाज सुरक्षा हटाने से कमजोर हो जाएगी, तो यह उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल है। इतिहास गवाह है कि जनसमर्थन से खड़े हुए नेताओं को सरकारी सुविधाओं ने नहीं, बल्कि जनता के विश्वास ने मजबूत बनाया है।
आज सवाल केवल हनुमान बेनीवाल की सुरक्षा का नहीं है, सवाल यह है कि क्या सरकार आलोचना और विरोध की आवाज को सम्मान देना चाहती है या उसे दबाने का संदेश देना चाहती है। लोकतंत्र में सत्ता की ताकत विरोधियों को कमजोर करने से नहीं, बल्कि आलोचना सुनने की क्षमता से मापी जाती है। यदि किसी नेता की आवाज से पूरी सरकार असहज हो जाती है, तो यह उस नेता की नहीं बल्कि सत्ता की बेचैनी का प्रमाण है। जनता सब देख रही है और समय आने पर हर फैसले का राजनीतिक हिसाब भी जरूर करेगी।
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