It’s Pooja Ranwa

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अहमदाबाद की रहने वाली हर्षिदा शेट्टी...! शादी हुई घरवालों की इच्छा से... लेकिन इन्हें ये शादी रास नहीं आई.. क्योंकि अपनी...
05/06/2026

अहमदाबाद की रहने वाली हर्षिदा शेट्टी...!
शादी हुई घरवालों की इच्छा से... लेकिन इन्हें ये शादी रास नहीं आई.. क्योंकि अपनी पसंद का लड़का नहीं मिला था.. ये अपने को बस पिता जी की सामाजिक पगड़ी के आगे समर्पित कर दी थी। इसलिए शादी ज्यादा दिन टिकी नहीं और यथासंभव अलिमोनी लेकर तलाक ले ली।
अब हर्षिदा आज़ाद थी स्वछंद थी.. उन्मुक्त गगन की आज़ाद पंछी थी। पढ़ी-लिखी थी, बिना मर्द के सहारे भी जीवन काट सके ऐसा व्यक्तित्व और हुनर तो विकसित कर ली थी हर्षिदा।
तलाकशुदा लड़की किसी के ऊपर बोझ न बने इसके लिए वह अपने पैरों पे खड़ी होने का सोची। जॉब ढूंढ़ना आरम्भ की। अहमदाबाद के एक ज्वेलरी शॉप में इनको सेल्सगर्ल की जॉब लगी। इस ज्वेलरी शॉप के मालिक थे दर्शन भाई।

11 महीने पहले जॉब स्टार्ट की यहाँ। चूंकि हर्षिदा को ये जॉब केवल अपने भरण-पोषण या सर्वाइवल के लिए नहीं करना था बल्कि समाज को भी मुँहतोड़ जवाब देना था जो सोचते है कि तलाक शुदा लड़की किसी के ऊपर बोझ बन के रहती है। इसलिए ये पूरी मेहनत और निष्ठा से अपने जॉब में लग गई। जॉब के लिए पूरी तरह समर्पित.. एकदम पंक्च्यूल.. ईमानदार.. ग्राहकों के साथ बहुत ही अच्छा कम्युनिकेशन और रिलेशनशिप।
इनके इस समर्पण भाव को देख कर दर्शन भाई बहुत प्रभावित हुए.. इनका काम का तरीका देख कर वह अन्य लड़कियों और कर्मचारियों को उदाहरण देते थे कि देखो और कुछ सीखो हर्षिदा से। सेठ दर्शन भाई का विश्वास दिनों-दिन हर्षिदा के ऊपर बढ़ता गया। काफी भरोसेमंद कर्मचारी बन चुकी थी हर्षिदा जॉब के कुछ ही महीनों में। सेठ को इतना भरोसा कि व्यापार के लिए बाहर किसी को भेजना होता तो वो हर्षिदा को भेजने लगे। मतलब अब अंदर और बाहर दोनों जगह हर्षिदा एक समर्पित और भरोसेमंद इम्प्लॉई बन चुकी थी।

जब हर्षिदा बिजनेस के सिलसिले में बाहर जाने लगी तो तकरीबन छः महीने पहले इनकी मुलाकात एक युवक से होती है। अपार्ट फ्रॉम बिजनेस इनकी आपस में भी काफी जमने लगती है। युवक शादी-शुदा था इसके बावजूद भी हर्षिदा उसको बहुत लाइक करती थी। युवक भी हर्षिदा की सुंदरता के ऊपर मोहित था लेकिन शादी के बंधन से बंधा हुआ इंसान था। लेकिन जब प्रेम का भाव उमड़ता है तो भला कौन सा बंधन सामने आता है ?? ये बंधन कमजोर पड़ने लगा.. हर्षिदा के प्रति इनका प्रेम परवान चढ़ने लगा.. हर्षिदा तो थी पहले से ही मोहित,और जब सामने वाले से सिग्नल मिलने लगा तो इनके अंदर बर्षों से सूखे पड़े रेगिस्तान में जैसे रिमझिम बारिश बौछार होने लगी। जब रिमझिम बारिश के हल्के छुअन से सौंधी-सौंधी खुशबू आने लगी तो हर्षिदा का मन अब इसमें सराबोर हो के कादो कर के बहियार धान के बीज बुनने का मन करने लगा। और ये तमन्ना पूरी हुई भी। अनुभवी युवक ने घनघोर बारिश करते हुए हर्षिदा के हर्ष को अर्श से फर्श पे पटक के हरगड्डा में गाड़ दिया।
अब इसके बाद किसी भी दिन बेमौसम बारिश होने लगी और हल भी जोताने लगा। हर्षिदा हर जुताई के बाद नई फसल के कामना में लग जाती।
एक दिन युवक ने कहा कि अब हमको ऐसे छुप-छुप के मिलना अच्छा नहीं लगता.. मैं अपनी वाली को तलाक देता हूँ और तुमसे शादी करता हूँ। लेकिन शादी के बाद भी हम ऐसे दर-दर को नहीं भटकेंगे.. ऐसा रोज-रोज कुछ पैसों के लिए अपने चप्पल नहीं घिसेंगे..! पहले हम ऐसा कार्य करते है कि हमारे पास खूब पैसे हो और उसके बाद हम पूरी दुनिया घूमे और शादी करें तब भी हमारे पैसे कम न हो।
हर्षिदा बोली कि इतने पैसे कैसे और कहां से आएंगे ?? हमलोग तो बस काम चलाऊँ सैलरीड इम्प्लॉई है तो इत्ते पैसे की कल्पना भी कैसे कर सकते है हम ?? नहीं, हम जैसे हैं वैसे ही ठीक.. बस हम और तुम.. हमारा प्यार और कुछ हजार की सैलरी.. बस इत्ता काफी है हमारे लिए।
युवक ने समझाया, "बेबी! ये पुराने फिल्मों जैसे डायलॉग मत मारो.. ये बस बोलने और सुनने में अच्छे लगते है.. फिलॉसफी में ही ये अच्छे लगते हैं, इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है.. आज गर कुछ दिमागी खर्च और डेयरिंग से करोड़ों कमा सकते है तो क्यों न उसपे ध्यान दिया जाय ?? पास में पैसे रहेंगे न बाबू तो दुनिया मुट्ठी में रहेगी.. नहीं तो ऐसे कोई पूछने वाला नहीं.. जब तक जवानी है सेल्सगर्ल की नौकरी कर लोगी.. ये ढलान होते ही कहाँ जाओगी सो पता नहीं... कुछ सोची हो इसके बारे में ??!"
हर्षिदा बोली, "हम क्या कर सकते है वो बताओ..?"
युवक, "अरे खजाने के ढेर पे तुम बैठी हो और मुझे पूछ रही हो क्या करना है ???"
हर्षिदा, "मतलब..?"
युवक, "मतलब ये कि तुम्हारे ऊपर तुम्हारा सेठ बहुत भरोसा करता है.. बस एक दिन मौका देखो और सबसे महंगे वाले ज्वेलरी सब उठाओ और चलते बनो.. बाहर भागेंगे.. अंडरग्राउंड रहेंगे.. और कुछ दिनों में फॉरेन सेटल्ड हो जाएंगे.. सेठ इधर अपना ज्वेलरी ढूंढ़ते रहेगा!"
हर्षिदा तो पहले बहुत ना-नुकुर की लेकिन बाद में मान गई...!
एक दिन जब सेठ दर्शन भाई दो पहर का भोजन करने घर को गया तो इधर इस दौरान हर्षिदा महंगे वाले गहने एक-एक करके अपने यूनिफॉर्म के अंदर डालते गई। चोरी के बाद हर्षिदा बाकी कर्मचारियों से बोली कि मैं बाहर कुछ जरूरी काम से जा रही हूं और वह वहां से निकल भागी।
सेठ जब वापिस आया तो गहने गायब देखा.. पूछताछ हुई और सीसीटीवी फुटेज चेक किया गया तो पाया गया कि गहने हर्षिदा अपने साथ लेकर फरार हो गई है।

चुराए गए गहनों की कीमत 1.66 करोड़ रुपए थे।
इन गहनों में से कुछ गहनों का इनकैशमेंट कराके हर्षिदा अपने शादी-शुदा प्रेमी के साथ देश भ्रमण में निकल गई.. उत्तर भारत के कई राज्यों में घूमते रही.. अलग-अलग लग्ज़री होटल्स में रुकती और मस्त लाइफ का आनंद उठाती।
एक सुबह जब हर्षिदा नहा के बाहर कमरे पे आई तो अपने जानू को नहीं पाई.. आवाज़ लगाई तो कोई जवाब न आया.. फोन लगाई तो फोन स्विच ऑफ आया.. इन्हें कुछ अच्छा नहीं लगा.. ये अपना बैग चेक करने को गई जिसमें ये चुराए गहने ले कर घूम रहे थे... जब बैग देखी तो इनकी आँखें फटी की फटी रह गई.. सारे गहने गायब थे.. कुछ भी शेष नहीं था.. सारे पैसे भी गायब थे।
जानू से संपर्क का कोई साधन भी नहीं था।
इनका अपना एक पर्सनल पर्स था उसको चेक की तो उसमें जो कुछ गहने रखी थी वो बचा हुआ था... लेकिन इन गहनों की कीमत मात्र 18 लाख रुपये ही थे.. कहाँ ये 1.66 करोड़ रुपये अपने डेयरिंग पे लाई थी उसमें से मात्र 18 लाख रुपये के ही गहने बचे हुए थे। इसके अलावे इनके पास कुछ भी पैसे नहीं थे।
अब प्रेमी जानू बाबू जो भी था वो, वो तो गया, कहीं कुछ अता पता नहीं.. लेकिन इसको तो पैसे चाहिए थे.. तो ये बाकी बचे गहने बेचने के लिए माणेकचौक आई.. तो इसकी सूचना अहमदाबाद क्राइम ब्रांच को मिल गई। सूचना के मुताबिक टीम वहां पहुंची और हर्षिदा को हिरासत में ले ली।
अभी हर्षिदा जेल में बंद है।

अतः बड़े बुजुर्ग सही फरमा गए है कि, "हुशियार के गुह तीन ठीन" ....
सिसकतीकरण की इन वीरांगनाओं को हमारा नमन रहेगा.. प्रणाम रहेगा।

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04/06/2026

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बेटे की चाह में छह बेटियांरमेश और कमला की शादी को दो साल हुए थे। दोनों का छोटा-सा परिवार था। रमेश गांव में खेती करता था ...
04/06/2026

बेटे की चाह में छह बेटियां
रमेश और कमला की शादी को दो साल हुए थे। दोनों का छोटा-सा परिवार था। रमेश गांव में खेती करता था और कमला घर संभालती थी। शादी के कुछ समय बाद घर में पहली संतान आई। पूरे परिवार को बेटे की उम्मीद थी, लेकिन बेटी हुई।
कमला ने बेटी को गोद में लिया तो आंखों में चमक थी। मगर रमेश के चेहरे पर मुस्कान अधूरी थी। उसने खुद को समझाया, “कोई बात नहीं, पहली बार है… आगे बेटा हो जाएगा।”
बेटी का नाम रखा गया गुड़िया।
दो साल बाद फिर कमला मां बनी। इस बार रमेश मंदिर गया, मन्नत मांगी, लेकिन फिर बेटी हुई। रमेश ने बाहर खड़े लोगों के सामने हंसने की कोशिश की, मगर अंदर कहीं निराशा घर कर गई।
तीसरी बार भी बेटी हुई। फिर चौथी… फिर पांचवीं।
अब घर में पांच नन्हीं बेटियां थीं—गुड़िया, पायल, रानी, मुस्कान और छवि।
घर बेटियों की हंसी से गूंजता रहता था। पांचों बहनें रमेश को देखते ही दौड़कर उससे लिपट जातीं। मगर रमेश का मन अक्सर एक ही सवाल में अटका रहता—“मेरा बेटा कब होगा?”
गांव वाले ताने मारते—
“रमेश, तेरे घर तो लक्ष्मी ही लक्ष्मी हैं।”
कोई हंसकर कहता—
“एक वारिस भी होना चाहिए।”
रमेश ऊपर से मुस्कुरा देता, लेकिन अंदर टूट जाता।
कुछ साल बाद कमला फिर गर्भवती हुई। इस बार रमेश ने हर मंदिर में माथा टेका। व्रत रखे। मनौती मांगी।
और आखिर वो दिन आ गया।
कमला ने बेटे को जन्म दिया।
रमेश खुशी से पागल हो गया। पूरे गांव में मिठाई बांटी। ढोल बजवाया। बेटे का नाम रखा आरव।
घर में जैसे त्योहार उतर आया था।
पांचों बहनें अपने छोटे भाई को गोद में लेने के लिए आपस में झगड़ती थीं। कोई उसे खिलाती, कोई झुलाती, कोई उसके कपड़े बदलती।
रमेश भी अब ज्यादातर समय बेटे के साथ बिताने लगा। बेटियों के लिए पहले जो कपड़े साल में एक बार आते थे, अब बेटे के लिए हर मेले से कुछ नया आता।
कमला कई बार कहती—
“बेटियां भी तुम्हारी ही हैं रमेश।”
रमेश जवाब देता—
“हां हैं… लेकिन बेटा तो बुढ़ापे का सहारा होता है।”
समय गुजरता गया।
बेटियां बड़ी होने लगीं। किसी ने पढ़ाई में नाम कमाया, किसी ने सिलाई सीखी, कोई मां के काम में हाथ बंटाती।
लेकिन रमेश का ध्यान सबसे ज्यादा आरव पर रहता। गांव के सबसे अच्छे स्कूल में दाखिला कराया। नई साइकिल दिलाई। फिर बारहवीं पास करते ही शहर के कॉलेज भेज दिया।
पांचों बहनें भाई पर जान छिड़कती थीं।
गुड़िया कहती—
“पापा, हमारा भाई बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”
रमेश गर्व से मुस्कुरा देता।
एक दिन आरव छुट्टियों में घर आया। दोस्तों के साथ शहर घूमने की जिद करने लगा।
कमला बोली—
“मत जा बेटा, शाम होने वाली है।”
मगर आरव नहीं माना।
रमेश ने खुद बाइक की चाबी उसके हाथ में रख दी—
“जाओ बेटा, संभलकर जाना।”
आरव हंसते हुए निकल गया।
शाम ढल गई।
फिर रात हो गई।
कमला बार-बार दरवाजे की तरफ देखती रही।
तभी गांव का एक लड़का हांफता हुआ आया—
“चाचा… आरव की बाइक का एक्सीडेंट हो गया…”
रमेश के पैरों तले जमीन खिसक गई।
अस्पताल पहुंचे।
आरव स्ट्रेचर पर शांत पड़ा था।
डॉक्टर ने धीरे से कहा—
“हमें अफसोस है…”
बस इतना सुनना था कि कमला चीख मारकर वहीं गिर पड़ी।
रमेश पत्थर बन गया।
जिस बेटे के लिए उसने बरसों इंतजार किया था… जिसके लिए सपने सजाए थे… वो एक पल में उससे दूर चला गया।
घर लौटकर पहली बार उसे सब कुछ सूना लगा।
आरव का कमरा… उसकी किताबें… बाइक की चाबी…
सब कुछ आंखों में चुभ रहा था।
रात को रमेश आंगन में बैठा रो रहा था।
तभी पांचों बेटियां उसके पास आकर बैठ गईं।
गुड़िया ने उसके कांपते हाथ पकड़ लिए।
पायल उसके कंधे से लग गई।
रानी ने सिर सहलाया।
मुस्कान और छवि मां को संभाल रही थीं।
उस पल रमेश के अंदर कुछ टूटकर बिखर गया।
उसे याद आने लगा…
जब गुड़िया पहली बार स्कूल में अव्वल आई थी, उसने बस सिर हिलाया था।
जब पायल को बुखार में रातभर नींद नहीं आई थी, मां अकेली जागी थी।
जब रानी ने नई किताब मांगी थी, उसने कहा था “अभी जरूरत नहीं।”
जब मुस्कान ने कहा था “पापा, मेरे स्कूल भी आ जाओ”… वो नहीं गया।
जब छवि गिरकर रोई थी, उसने बेटे को गोद में उठा लिया था।
आज वही पांच बेटियां उसके आंसू पोंछ रही थीं।
रमेश फूट पड़ा।
“मुझे माफ कर दो बेटियों… मैं समझ ही नहीं पाया कि मेरा असली सहारा कौन है…”
पांचों बेटियां भी रोने लगीं।
गुड़िया बोली—
“पापा, हम हमेशा आपके साथ हैं।”
उस दिन के बाद रमेश बदल गया।
अब वो बेटियों को बोझ नहीं, अपना गर्व समझने लगा।
गुड़िया को आगे पढ़ाया। वो टीचर बनी।
पायल ने नर्सिंग की और अस्पताल में नौकरी लग गई।
रानी ने अपना सिलाई सेंटर खोल लिया।
मुस्कान बैंक में नौकरी करने लगी।
छवि सबसे छोटी थी, वो पढ़ाई में बहुत तेज थी।
धीरे-धीरे घर फिर से मुस्कुराने लगा।
एक शाम रमेश बरामदे में बैठा था।
पांचों बेटियां उसके आसपास थीं।
कोई चाय बना रही थी, कोई दवाई दे रही थी, कोई खेत का हिसाब देख रही थी।
रमेश की आंखें भर आईं।
कमला ने पूछा—
“क्या हुआ?”
रमेश मुस्कुराया और बोला—
“मैं कितना अंधा था कमला… मैं बेटे को सहारा समझता रहा… लेकिन भगवान ने तो पहले ही मेरे घर पांच मजबूत सहारे भेज दिए थे।”
कमला की आंखों से भी आंसू निकल आए।
रमेश ने आसमान की तरफ देखा।
मन ही मन बोला—
“बेटा तो किस्मत से मिला था… लेकिन बेटियां भगवान का आशीर्वाद थीं… जिन्हें मैं पहचान नहीं पाया।”
उस दिन से गांव में जब भी कोई बेटी होने पर दुख जताता, रमेश सिर्फ एक बात कहता—
“बेटियां घर की रौनक ही नहीं, मां-बाप की सबसे बड़ी ताकत होती हैं। बेटा किस्मत से मिलता है… मगर बेटियां भगवान भरोसा करके देता है।”

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01/01/2026

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30/12/2025

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