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पिताजी के वो  डायलॉग्स... जो बचपन में सिर्फ "शब्द" लगे थे, पर आज "सबक" बन गए हैं! 1. "पढ़ाई पर ध्यान दो, बाकी सब बाद में...
13/06/2025

पिताजी के वो डायलॉग्स...
जो बचपन में सिर्फ "शब्द" लगे थे,
पर आज "सबक" बन गए हैं!

1. "पढ़ाई पर ध्यान दो, बाकी सब बाद में!"

2. "मैं जो कर रहा हूं, सब तुम्हारे लिए कर रहा हूं।"

3. "खुद के पैरों पर खड़ा होना सीख।"

4. "मेरे जैसे मत बन, मुझसे अच्छा बन।"

5. "बड़ा आदमी बन, लेकिन अच्छा इंसान पहले बन।"

6. "नाम रोशन करना, बस यही सपना है मेरा।"

7. "तेरी उम्र में मैं जिम्मेदारियां उठाता था।"

8. "खर्च सोच-समझकर करना, पैसे पेड़ पर नहीं उगते।"

9. "मां को कभी दुख मत देना, नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"

10. "बचपन जल्दी निकल जाएगा, सम्हल जा।"

11. "कमाना आसान है, इज्जत कमाना मुश्किल।"

12. "अपने फैसले खुद ले, लेकिन सोच समझकर।"

13. "दोस्ती सोच समझकर करना, सब तेरे जैसे नहीं होते।"

14. "हर वक्त तेरे पीछे नहीं रहूंगा, खुद लड़ना सीख।"

15. "जो भी कर, मेरा सिर ऊँचा होना चाहिए!"

16. "मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा, तू खुश रहे बस।"

17. "जो सीख रहा है, ज़िंदगी में काम आएगा।"

18. "ज़िंदगी में गिरा भी तो उठना सीख।"

19. "तेरे लिए ही तो सब कुछ कर रहा हूं बेटा।"

20. "जिस दिन खुद के लिए खड़ा होगा, उसी दिन मेरा सपना पूरा होगा।"

21. "तू बस मेहनत कर, किस्मत मैं संभाल लूंगा।"

22. "कभी भी झूठ मत बोलना, चाहे हालात कैसे भी हों।"

23. "तू मेरा बेटा है, खुद पर भरोसा रख।"

24. "बेटा कितना भी बड़ा हो जाए, बाप हमेशा बाप ही रहेगा।"

25. "जब मैं नहीं रहूंगा, तब समझेगा कि मैं क्या था।"

🥹 आज जब ये शब्द याद आते हैं, तो लगता है…
तब समझ नहीं आता था, पर आज ये हर वाक्य ज़िंदगी की नींव जैसा लगता है।
अगर आपके पिताजी ने भी कभी इनमें से कुछ कहा हो…
तो दिल से एक ❤️ ज़रूर भेजना...

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29/08/2022

ऑनलाइन टीचिंग का पूरा सिस्टम वॉलीवुड की तरह काम करता है जो फिल्मे हिट कराने के लिए कई प्रकार के स्ट्रेटेजी अपनाते हैं।
जैसे यदि फ़िल्म की कहानी अच्छी नहीं है तो उसमें बोल्ड सीन और आइटम सॉन्ग घुसेड़ दो फ़िल्म लाइम लाइट में आ जायेगी और ठीक ठाक कमाई कर लेगी।
ठीक यही स्ट्रेटेजी ऑनलाइन टीचिंग में भी प्रयोग किया जा रहा है मतलब टीचिंग में दम नहीं है तो क्लास के बीच मे बलगर बाते घुसेड़ दो बच्चे खिंचे हुए आ जाएंगे।
उदाहण प्रिया मैंम (काल्पनिक नाम) लाइव क्लास ले रही है और 2 मिनट बाद ही कमेंट पढ़ना शुरू करती है ,कमेंट क्या पढ़ रही है ,(मैम क्या आपका कोई bf है) ,यहां पे प्रिया मैंम ठहरती है और हल्की सी मन्द मुस्कान छोड़ते हुए बोलती है नहीं अभी तक नहीं है ,( मतलब बच्चे के लिए चांस है)।
दूसरा कमेंट उनकी फिटनेस को लेकर है ,ऑनलाइन क्लास में कमर के ऊपर का हिस्सा ही दिखता है पूरा बॉडी तो दिखता नहीं ,मैंम भी समझ रही है कि किस फिटनेस की बात कर रहा है ,इसपर भी मुस्कुरा कर अपने फिटनेस की राज शेयर करती है।
तीसरा कमेंट उनकी शादी को लेकर होता है ।
मतलब बच्चे पढ़ने आये हैं या शादी के लिए लड़की देखने।
एक्चुअल में ये कमेंट आया ही नहीं था मैंम ने तो सिर्फ फॉलोवर के लिए ये कॉमेंट क्रिएट कर दिया ,यदि ऐसे कमेंट आ भी रहे तो इसपे ध्यान क्यों देना।

फिल्मो को हिट कराने का दूसरा फार्मूला है देश भक्तिकी कहानी पे काम हो यदि फ़िल्म में दुश्मन मुल्क पाकिस्तान हो तो सफलता के चांस दो गुना हो जाते हैं ।
ऑनलाइन टीचिंग की दूसरी स्ट्रेटेजी है हर लेक्चर और हर सब्जेक्ट में पाकिस्तान को घुसेड़ कर उसको गरियाना जैसे यदि साइंस के लेक्चर में न्यूटन के थ्योरी की बात हो तो उसमें भी पाकिस्तान घुसेड़ दो ,इकॉनमी में LPG मॉडल की क्लास हो तो उसमें भी पाकिस्तान घुसा दो ,एनवायरमेंट की क्लास हो तो उसमें पाकिस्तान घुसेड़ दो और भारत मे प्रदूषण का जिम्मेदार उसी को ठहरा दो |एक टीचर तो पाकिस्तान और मुसलमान को गरियाकर कई मिलियन सब्सक्राइबर बना लिया है।

कहने का मतलब है कि अब टीचिंग भी बाजारवाद के नंगापन में शामिल हो गया है जहां अंग प्रदर्शन से लेकर भद्दी गालिया और झूठ सब जायज हो गया है ऐसे में एक सवाल है जो टीचर बाजारवाद के इस नंगापन में शामिल हुए बिना सभ्य तरीके से शिक्षक मानकों के अनुसार टीचिंग कर रहे हैं क्या उन्हें बाजार में जगह मिल पाएगी और ऐसी स्थिति में क्या वे लंबे समय तक खुद को बनाये रख पाएंगे।

~Copied

11/08/2022

*👂 कान की आत्मकथा👂*

*एक बार आवश्य पढ़े... मन में गुदगुदी होने लगेगी...😊*

*मैं कान हूँ........👂*
*हम दो हैं...*👂👂
*दोनों जुड़वां भाई...*

लेकिन...........
हमारी किस्मत ही ऐसी है....

*कि आज तक हमने एक दूसरे को देखा तक नहीं 😪*

पता नहीं..
*कौन से श्राप के कारण हमें विपरित दिशा में चिपका कर भेजा गया है 😠...*

दु:ख सिर्फ इतना ही नहीं है...

*हमें जिम्मेदारी सिर्फ सुनने की मिली है......*

*गालियाँ हों या तालियाँ..,*
*अच्छा हो या बुरा..*,
सब
*हम ही सुनते हैं...*

*धीरे धीरे हमें खूंटी समझा जाने लगा...*

*चश्मे का बोझ डाला गया,*

फ्रेम की डण्डी को हम पर फँसाया गया...

ये दर्द सहा हमने...

क्यों भाई..???

*चश्मे का मामला आंखो का है*
*तो हमें बीच में घसीटने का*
*मतलब क्या है...???*

हम बोलते नहीं

तो क्या हुआ,

सुनते तो हैं ना...

*हर जगह बोलने वाले ही क्यों आगे रहते है....???*

बचपन में पढ़ाई में
किसी का दिमाग
काम न करे तो
*मास्टर जी हमें ही मरोड़ते हैं 😡...*

जवान हुए तो
*आदमी,औरतें सबने सुन्दर सुन्दर लौंग,बालियाँ, झुमके आदि बनवाकर हम पर ही लटकाये...!!!*

*छेदन हमारा हुआ,*
*और तारीफ चेहरे की ...!*

और तो और...
श्रृंगार देखो...
*आँखों के लिए काजल...*
*मुँह के लिए क्रीमें...*
*होठों के लिए लिपस्टिक...*
*हमने आज तक कुछ माँगा हो तो बताओ...*

कभी किसी कवि ने,
शायर ने
*कान की कोई तारीफ की हो तो बताओ...*

*इनकी नजर में आँखे, होंठ, गाल,ये ही सब कुछ है...*

*हम तो जैसे किसी मृत्युभोज की*
*बची खुची दो पूड़ियाँ हैं..,*

जिसे उठाकर चेहरे के साइड में चिपका दिया बस...

और तो और,

*कई बार बालों के चक्कर में हम पर भी कट लगते हैं* ...

हमें डिटाॅल लगाकर पुचकार दिया जाता है...

बातें बहुत सी हैं,
किससे कहें...???

कहते है दर्द बाँटने से मन हल्का
हो जाता है...

*आँख से कहूँ तो वे आँसू टपकाती हैं..*
*नाक से कहूँ तो वो बहती है...*

*मुँह से कहूँ तो वो हाय हाय करके रोता है...*

और बताऊँ...

*पण्डित जी का जनेऊ,*
*टेलर मास्टर की पेंसिल,*
*मिस्त्री की बची हुई गुटखे की पुड़िया*
*मोबाइल का एयरफोन सब हम ही सम्भालते हैं..*
*और तो और,गांवों में तो आधी बीडी पिकर बची हुई आधी बीडी भी लोग हमारी दरार में फंसा देते हैं..*

और

*आजकल ये नया नया मास्क का झंझट भी हम ही झेल रहे हैं...*

*कान नहीं जैसे पक्की खूँटियाँ हैं हम...और भी कुछ टाँगना, लटकाना हो तो ले आओ भाई...*

*तैयार हैं हम दोनों भाई...!¡!*

*थोड़ा थोड़ा हँसते रहिये*

*हमेशा मस्त रहिए*
*हमेशा स्वस्थ रहिए ।।*

किसी दिन सुबह उठकर एक बार इसका जायज़ा लीजियेगा कि कितने घरों में अगली पीढ़ी के बच्चे रह रहे हैं? कितने बाहर निकलकर नोएडा, ...
06/08/2022

किसी दिन सुबह उठकर एक बार इसका जायज़ा लीजियेगा कि कितने घरों में अगली पीढ़ी के बच्चे रह रहे हैं? कितने बाहर निकलकर नोएडा, गुड़गांव, पूना, बेंगलुरु, चंडीगढ़,बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, हैदराबाद, बड़ौदा जैसे बड़े शहरों में जाकर बस गये हैं?
कल आप एक बार उन गली मोहल्लों से पैदल निकलिएगा जहां से आप बचपन में स्कूल जाते समय या दोस्तों के संग मस्ती करते हुए निकलते थे।
तिरछी नज़रों से झांकिए.. हर घर की ओर आपको एक चुपचाप सी सुनसानियत मिलेगी, न कोई आवाज़, न बच्चों का शोर, बस किसी किसी घर के बाहर या खिड़की में आते जाते लोगों को ताकते बूढ़े जरूर मिल जायेंगे।
आखिर इन सूने होते घरों और खाली होते मुहल्लों के कारण क्या हैं ?
भौतिकवादी युग में हर व्यक्ति चाहता है कि उसके एक बच्चा और ज्यादा से ज्यादा दो बच्चे हों और बेहतर से बेहतर पढ़ें लिखें।
उनको लगता है या फिर दूसरे लोग उसको ऐसा महसूस कराने लगते हैं कि छोटे शहर या कस्बे में पढ़ने से उनके बच्चे का कैरियर खराब हो जायेगा या फिर बच्चा बिगड़ जायेगा। बस यहीं से बच्चे निकल जाते हैं बड़े शहरों के होस्टलों में।
अब भले ही दिल्ली और उस छोटे शहर में उसी क्लास का सिलेबस और किताबें वही हों मगर मानसिक दबाव सा आ जाता है बड़े शहर में पढ़ने भेजने का।
हालांकि इतना बाहर भेजने पर भी मुश्किल से 1% बच्चे IIT, PMT या CLAT वगैरह में निकाल पाते हैं...। फिर वही मां बाप बाकी बच्चों का पेमेंट सीट पर इंजीनियरिंग, मेडिकल या फिर बिज़नेस मैनेजमेंट में दाखिला कराते हैं।
4 साल बाहर पढ़ते पढ़ते बच्चे बड़े शहरों के माहौल में रच बस जाते हैं। फिर वहीं नौकरी ढूंढ लेते हैं । सहपाठियों से शादी भी कर लेते हैं।आपको तो शादी के लिए हां करना ही है ,अपनी इज्जत बचानी है तो, अन्यथा शादी वह करेंगे ही अपने इच्छित साथी से।
अब त्यौहारों पर घर आते हैं माँ बाप के पास सिर्फ रस्म अदायगी हेतु।
माँ बाप भी सभी को अपने बच्चों के बारे में गर्व से बताते हैं । दो तीन साल तक उनके पैकेज के बारे में बताते हैं। एक साल, दो साल, कुछ साल बीत गये । मां बाप बूढ़े हो रहे हैं । बच्चों ने लोन लेकर बड़े शहरों में फ्लैट ले लिये हैं।
अब अपना फ्लैट है तो त्योहारों पर भी जाना बंद।
अब तो कोई जरूरी शादी ब्याह में ही आते जाते हैं। अब शादी ब्याह तो बेंकट हाल में होते हैं तो मुहल्ले में और घर जाने की भी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती है। होटल में ही रह लेते हैं।
हाँ शादी ब्याह में कोई मुहल्ले वाला पूछ भी ले कि भाई अब कम आते जाते हो तो छोटे शहर, छोटे माहौल और बच्चों की पढ़ाई का उलाहना देकर बोल देते हैं कि अब यहां रखा ही क्या है?
खैर, बेटे बहुओं के साथ फ्लैट में शहर में रहने लगे हैं । अब फ्लैट में तो इतनी जगह होती नहीं कि बूढ़े खांसते बीमार माँ बाप को साथ में रखा जाये। बेचारे पड़े रहते हैं अपने बनाये या पैतृक मकानों में।
कोई बच्चा बागवान पिक्चर की तरह मां बाप को आधा - आधा रखने को भी तैयार नहीं।
अब साहब, घर खाली खाली, मकान खाली खाली और धीरे धीरे मुहल्ला खाली हो रहा है। अब ऐसे में छोटे शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये "प्रॉपर्टी डीलरों" की गिद्ध जैसी निगाह इन खाली होते मकानों पर पड़ती है । वो इन बच्चों को घुमा फिरा कर उनके मकान के रेट समझाने शुरू करते हैं । उनको गणित समझाते हैं कि कैसे घर बेचकर फ्लैट का लोन खत्म किया जा सकता है । एक प्लाट भी लिया जा सकता है।
साथ ही ये किसी बड़े लाला को इन खाली होते मकानों में मार्केट और गोदामों का सुनहरा भविष्य दिखाने लगते हैं।
बाबू जी और अम्मा जी को भी बेटे बहू के साथ बड़े शहर में रहकर आराम से मज़ा लेने के सपने दिखाकर मकान बेचने को तैयार कर लेते हैं।
आप स्वयं खुद अपने ऐसे पड़ोसी के मकान पर नज़र रखते हैं । खरीद कर डाल देते हैं कि कब मार्केट बनाएंगे या गोदाम, जबकि आपका खुद का बेटा छोड़कर पूना की IT कंपनी में काम कर रहा है इसलिए आप खुद भी इसमें नहीं बस पायेंगे।
हर दूसरा घर, हर तीसरा परिवार सभी के बच्चे बाहर निकल गये हैं।
वही बड़े शहर में मकान ले लिया है, बच्चे पढ़ रहे हैं,अब वो वापस नहीं आयेंगे। छोटे शहर में रखा ही क्या है । इंग्लिश मीडियम स्कूल नहीं है, हॉबी क्लासेज नहीं है, IIT/PMT की कोचिंग नहीं है, मॉल नहीं है, माहौल नहीं है, कुछ नहीं है साहब, आखिर इनके बिना जीवन कैसे चलेगा?

भाईसाब ये खाली होते मकान, ये सूने होते मुहल्ले, इन्हें सिर्फ प्रोपेर्टी की नज़र से मत देखिए, बल्कि जीवन की खोती जीवंतता की नज़र से देखिए। आप पड़ोसी विहीन हो रहे हैं। आप वीरान हो रहे हैं।
आज गांव सूने हो चुके हैं
शहर कराह रहे हैं |
सूने घर आज भी राह देखते हैं.. वो बंद दरवाजे बुलाते हैं पर कोई नहीं आता...🙏🙏

एकदम सच्ची बात जिसको कॉपी पेस्ट करने से रोक नहीं पायाकिसी दिन सुबह उठकर एक बार इसका जायज़ा लीजियेगा कि कितने घरों में अगल...
04/08/2022

एकदम सच्ची बात जिसको कॉपी पेस्ट करने से रोक नहीं पाया

किसी दिन सुबह उठकर एक बार इसका जायज़ा लीजियेगा कि कितने घरों में अगली पीढ़ी के बच्चे रह रहे हैं? कितने बाहर निकलकर नोएडा, गुड़गांव, पूना, बेंगलुरु, चंडीगढ़,बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, हैदराबाद, बड़ौदा जैसे बड़े शहरों में जाकर बस गये हैं?
कल आप एक बार उन गली मोहल्लों से पैदल निकलिएगा जहां से आप बचपन में स्कूल जाते समय या दोस्तों के संग मस्ती करते हुए निकलते थे।
तिरछी नज़रों से झांकिए.. हर घर की ओर आपको एक चुपचाप सी सुनसानियत मिलेगी, न कोई आवाज़, न बच्चों का शोर, बस किसी किसी घर के बाहर या खिड़की में आते जाते लोगों को ताकते बूढ़े जरूर मिल जायेंगे।
आखिर इन सूने होते घरों और खाली होते मुहल्लों के कारण क्या हैं ?
भौतिकवादी युग में हर व्यक्ति चाहता है कि उसके एक बच्चा और ज्यादा से ज्यादा दो बच्चे हों और बेहतर से बेहतर पढ़ें लिखें।
उनको लगता है या फिर दूसरे लोग उसको ऐसा महसूस कराने लगते हैं कि छोटे शहर या कस्बे में पढ़ने से उनके बच्चे का कैरियर खराब हो जायेगा या फिर बच्चा बिगड़ जायेगा। बस यहीं से बच्चे निकल जाते हैं बड़े शहरों के होस्टलों में।
अब भले ही दिल्ली और उस छोटे शहर में उसी क्लास का सिलेबस और किताबें वही हों मगर मानसिक दबाव सा आ जाता है बड़े शहर में पढ़ने भेजने का।
हालांकि इतना बाहर भेजने पर भी मुश्किल से 1% बच्चे IIT, PMT या CLAT वगैरह में निकाल पाते हैं...। फिर वही मां बाप बाकी बच्चों का पेमेंट सीट पर इंजीनियरिंग, मेडिकल या फिर बिज़नेस मैनेजमेंट में दाखिला कराते हैं।
4 साल बाहर पढ़ते पढ़ते बच्चे बड़े शहरों के माहौल में रच बस जाते हैं। फिर वहीं नौकरी ढूंढ लेते हैं । सहपाठियों से शादी भी कर लेते हैं।आपको तो शादी के लिए हां करना ही है ,अपनी इज्जत बचानी है तो, अन्यथा शादी वह करेंगे ही अपने इच्छित साथी से।
अब त्यौहारों पर घर आते हैं माँ बाप के पास सिर्फ रस्म अदायगी हेतु।
माँ बाप भी सभी को अपने बच्चों के बारे में गर्व से बताते हैं । दो तीन साल तक उनके पैकेज के बारे में बताते हैं। एक साल, दो साल, कुछ साल बीत गये । मां बाप बूढ़े हो रहे हैं । बच्चों ने लोन लेकर बड़े शहरों में फ्लैट ले लिये हैं।
अब अपना फ्लैट है तो त्योहारों पर भी जाना बंद।
अब तो कोई जरूरी शादी ब्याह में ही आते जाते हैं। अब शादी ब्याह तो बेंकट हाल में होते हैं तो मुहल्ले में और घर जाने की भी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती है। होटल में ही रह लेते हैं।
हाँ शादी ब्याह में कोई मुहल्ले वाला पूछ भी ले कि भाई अब कम आते जाते हो तो छोटे शहर, छोटे माहौल और बच्चों की पढ़ाई का उलाहना देकर बोल देते हैं कि अब यहां रखा ही क्या है?
खैर, बेटे बहुओं के साथ फ्लैट में शहर में रहने लगे हैं । अब फ्लैट में तो इतनी जगह होती नहीं कि बूढ़े खांसते बीमार माँ बाप को साथ में रखा जाये। बेचारे पड़े रहते हैं अपने बनाये या पैतृक मकानों में।
कोई बच्चा बागवान पिक्चर की तरह मां बाप को आधा - आधा रखने को भी तैयार नहीं।
अब साहब, घर खाली खाली, मकान खाली खाली और धीरे धीरे मुहल्ला खाली हो रहा है। अब ऐसे में छोटे शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये "प्रॉपर्टी डीलरों" की गिद्ध जैसी निगाह इन खाली होते मकानों पर पड़ती है । वो इन बच्चों को घुमा फिरा कर उनके मकान के रेट समझाने शुरू करते हैं । उनको गणित समझाते हैं कि कैसे घर बेचकर फ्लैट का लोन खत्म किया जा सकता है । एक प्लाट भी लिया जा सकता है।
साथ ही ये किसी बड़े लाला को इन खाली होते मकानों में मार्केट और गोदामों का सुनहरा भविष्य दिखाने लगते हैं।
बाबू जी और अम्मा जी को भी बेटे बहू के साथ बड़े शहर में रहकर आराम से मज़ा लेने के सपने दिखाकर मकान बेचने को तैयार कर लेते हैं।
आप स्वयं खुद अपने ऐसे पड़ोसी के मकान पर नज़र रखते हैं । खरीद कर डाल देते हैं कि कब मार्केट बनाएंगे या गोदाम, जबकि आपका खुद का बेटा छोड़कर पूना की IT कंपनी में काम कर रहा है इसलिए आप खुद भी इसमें नहीं बस पायेंगे।
हर दूसरा घर, हर तीसरा परिवार सभी के बच्चे बाहर निकल गये हैं।
वही बड़े शहर में मकान ले लिया है, बच्चे पढ़ रहे हैं,अब वो वापस नहीं आयेंगे। छोटे शहर में रखा ही क्या है । इंग्लिश मीडियम स्कूल नहीं है, हॉबी क्लासेज नहीं है, IIT/PMT की कोचिंग नहीं है, मॉल नहीं है, माहौल नहीं है, कुछ नहीं है साहब, आखिर इनके बिना जीवन कैसे चलेगा?

भाईसाब ये खाली होते मकान, ये सूने होते मुहल्ले, इन्हें सिर्फ प्रोपेर्टी की नज़र से मत देखिए, बल्कि जीवन की खोती जीवंतता की नज़र से देखिए। आप पड़ोसी विहीन हो रहे हैं। आप वीरान हो रहे हैं।
आज गांव सूने हो चुके हैं
शहर कराह रहे हैं |
सूने घर आज भी राह देखते हैं.. वो बंद दरवाजे बुलाते हैं पर कोई नहीं आता...

01/08/2022

किसी के मजबूरियां पे न हंसिए,
कोई मजबूरियां खरीदकर नही लाता..!
डरिए वक्त की मार से,
बुरा वक्त किसी को बता कर नही आता..!
अकल कितनी भी तेज हो,
नसीब के बिना नही जीत सकती..!
बीरवल अकलमंद होने के बावजूद,
कभी बादशाह नही बन सका..!
सादर अभिवादन 🌹🌹साथियों 🌹❤️🙏

किसी ने मुझसे पूछा.??*दुनिया में सबसे मुश्किल काम क्या है??* 🤔"बड़ा कठिन सवाल है"..मैने मुस्करा कर कहा! फिर कुछ सोचकर मै...
01/08/2022

किसी ने मुझसे पूछा.??
*दुनिया में सबसे मुश्किल काम क्या है??* 🤔
"बड़ा कठिन सवाल है"..मैने मुस्करा कर कहा!
फिर कुछ सोचकर मैंने कहा....
मेरी नजर में दुनिया का सबसे मुश्किल काम है....
*अपनी आंखों के सामने माता -पिता को...**बूढ़ा होते हुए देखना..!!* 😞

ये वो समय होता है जब हम कुदरत के इस लिखे को टाल नहीं पाते..!! माता-पिता के वो खूबसूरत से चेहरे जब झुर्रीयो से भर जाते हैं तो....दिल भर आता है..!!

उंगली पकड़कर चलाने वालें जब खुद चल नहीं पाते तो....दिल भर आता है..!!

सहारा देने वालें जब खुद सहारे की तलाश में घूमते हैं तो....दिल भर आता है..!!

रास्ता दिखाने वालों को जब अपने ही रास्ते वीरान नजर आते हैं तो....दिल भर आता है..!!

हंसकर बोलने वालें जब खामोश रहने लगते हैं तो....दिल भर आता है..!!

अपने बच्चो की नजर उतारने वालो की जब नजरे धुंधला जाती हैं तो....दिल भर आता है..!!

अगर ईश्वर मुझे कुछ मांगने के लिए कहें तो मैं ये मांगू.....
हे ईश्वर 🤲....किसी के भी माता-पिता को कमजोर..बीमार ना करना....उनकी जितनी भी जिंदगी है वो सेहतमंद रहें.!!💪🏼

*कोई भी बच्चे अपने माता-पिता को असहज ना छोड़े.!! इस छोटी सी दुआ के साथ....*🌹🙏

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