08/12/2023
ये ही असली भारत है आगे जाकर ये छोटे हाथ वाले भारत का सफल संचालन करेंगे।
नमस्कार जोहार
हम हैं ग्रामीण भारत के उस जगह पर जहां पर ना तो जात -पात की बात होती है ना भेदभाव की। हमेशा समता समानता का पाठ और अनुशासन सिखाया जाता है और भावी समाज निर्माण को लिए प्रयत्न किया जाता है । जी हां यही वो जगह है जो सबसे पवित्र है ।
ये सरकारी स्कूलों के बच्चे हैं ये कोयतूर है परिस्थिति से समायोजन करने में सक्षम होते हैं ।
मैंने बहूत करीब से अनुभव किया है इन बच्चों के पास कापी पेन पेंसिल बहूत मुश्किल से ही रहता है । क्योकि माता पिता के पास इतना समय नहीं की बच्चे को क्या चाहिए वे तो दिन भर कड़ी मेहनत में रत रहते हैं क्योंकि परिवार का भरण पोषण भी करना है । ग़लती माता की भी नहीं पर गलती गरीबी और मजबूरी की है
कुछ बच्चों के पास पेंसिल मिल भी जाये तो वह पेंसिल को बच्चे बहूत सम्हाल कर रखते हैं पेंसिल का लंबाई लगातार घटते जाती है और फिर इतनी छोटी हो जाती है कि सिर्फ़ दो उंगली में पकड़ जा सकता है।
क्योंकि बच्चा जानता है कि यह पेंसिल ख़त्म हो गई तो नयी पेंसिल कहां से आयेगी कौन देगा कब देगा पता नहीं । एक ही कापी में पुरे सब्जेक्ट लिखे जाते हैं वो इसलिए कि पुरी सब्जेक्ट की कापियां पिता जी नहीं देंगे क्योकि पिताजी के पास पैसा नहीं ।
इन परिस्थितियों से बच्चे समायोजन बिठाते हैंऔर इस चुनौती को स्वीकार कर लेते हैं वे कभी संसाधनों का रोना नहीं रोते और कोशिश में रहते हैं कि पढ़ने से ही बहुत कुछ संभव है ।
शहरी बच्चो की तुलना में ग्रामीण बच्चे काफी संवेदनशील होते हैं।
समाज और सरकार को इन्हीं जगह पर अधिक काम करना चाहिए। ताकी भारत का भविष्य सशक्त हो सके ।
जय भारत