02/06/2026
हाल ही मे गुड फ्राइडे निकला लेकिन इसकी कहानी जानना हिन्दुओ के लिए भी जरूरी है ताकि हमें ये आइडिया हो सके कि पश्चिमी देश राजनीति मे धर्म का प्रयोग कैसे करते है।
2200 साल पहले मिडिल ईस्ट मे यहूदियों के 12 कबीले थे, ये कई जगह अत्याचार सहकर आज के येरुशलम और उसके आसपास बसे थे। यहाँ इनका एक पवित्र मंदिर था और इन्हे आशा थी कि भगवान अपना कोई दूत कभी भेजेगा, ये कुछ वैसा है जैसे आप गौतम बुद्ध के बाद से भगवान विष्णु की प्रतीक्षा कर रहे है।
इन्ही मे एक कबीले मे ईसा मसीह का जन्म होता है, उस समय रोम साम्राज्य था और येरुशलम का हिस्सा रोमनो ने यहूदियों को स्वतंत्र प्रभार के लिए दे रखा था। यहूदियों के पवित्र मंदिर मे ईसा मसीह के यहूदी संस्कार पूरे हुए, बाद मे ईसा मसीह कई वर्षो के लिए गायब हो गए और फिर उनके द्वारा कई चमत्कारो की खबरें येरुशलम पहुंची।
ईसा मसीह येरुशलम भी आये, उन्होंने देखा कि उस मंदिर मे व्यापार हो रहा है। भारत और चीन से आये व्यापारी वहाँ घोड़े और ऊंट बाँधते है, उन्होंने इसका विरोध किया जिस वजह से यहूदी धर्मांध भड़क गए और उन्होंने ईसा मसीह को शत्रु घोषित किया। उसी दिन शाम को ईसा मसीह अपना अंतिम भोजन करते है, उनका एक शिष्य यहूदा उनसे धोखा करता है।
अगली सुबह ईसा मसीह गिरफ्तार कर लिए जाते है और उन्हें बेरहमी से सूली पर लटका दिया जाता है जिस वजह से गुड फ्राइडे मनाया जाता है। ईसा मसीह के वचन उनके कई शिष्य रोमन साम्राज्य मे प्रचारित करते है और कई दशकों बाद रोमन साम्राज्य ईसाई धर्म अपना लेता है। उसके भी कई सालो बाद रोमनो ने येरुशलम पर हमला किया और दुहाई दी की इन यहूदियों ने ईसा मसीह को मारा था।
अब ट्विस्ट ये है कि ऊपर जो ईसा मसीह वाली कहानी लिखी है वो उनके जाने के 70 साल बाद लिखी गयी, 70 साल? आपने 7 महीने पहले कोई फ़िल्म देखी हो उसकी स्क्रिप्ट लिखकर दिखा सकते है?
ऐसे मे बौद्धिक प्रश्न है कि क्या ईसा मसीह सच मे थे भी? रोमनो को येरुशलम पर अधिकार करना था क्या इसीलिए तो ईसा मसीह की कहानी नहीं बनी? ईसा मसीह पवित्र मंदिर को बचाना चाहते थे जबकि रोमनो ने उस मंदिर को तोड़ दिया था, ऐसा क्यों?
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हज़रत मुहम्मद के जीवन का लेखन उनकी मृत्यु के 200 वर्षो बाद तक पूरा हुआ। मै हिन्दुओ का तुष्टिकरण नहीं कर रहा लेकिन वाल्मीकि ने रामायण राम के जीवित रहते लिखी, वेदव्यास ने महाभारत कृष्ण के जीवित रहते लिखी, महाभारत का तो पाठन भी जनमेजय के शासन काल मे ही हो गया था।
लेकिन अब्राहम के मानने वालों के केस मे ऐसा नहीं है, हिन्दू विचार करें कि जिन मजहबो ने दुनिया को नफ़रत से रंग दिया है उनका तरीका क्या है? ये एक पात्र बनाते है और उसके अनुरूप आरोप प्रत्यारोप करके सत्ता का युद्ध लड़ते है। महाभारत मे तो अभिमन्यु और घटोतकच समेत कई योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए।
उनके नाम आज भी इतिहास मे है लेकिन ईसाई और मुसलमानो के युद्ध मे कितने लोग कहाँ कहाँ मरे वो शायद ही किसी को याद हो, जबकि सत्ता किसे मिली वो जगजाहिर है। हो सकता है मेरा आंकलन भी गलत हो लेकिन जितना अब्राहमिक धर्मों को पढ़ा है कुछ ना कुछ अपूर्ण लगता है।
कृष्ण, महावीर, बुद्ध और नानक के बारे मे कैसे भी पढ़े कहानी पूरी है लेकिन ज़ब इब्राहिम, इस्माइल, जीजस और मुहम्मद को पढ़ते है तो ऐसा लगता है जैसे वो एक चैप्टर था और दूसरा भाग अधिक भयावह तथा रक्तरंजीत होगा। इसलिए गर्व कीजिए की आप हिन्दू है, आप एक ऐसी माटी से जुड़े है जहाँ ज्ञान की नदिया बही है ना कि खून की।
बाकि खुद को तैयार कीजिए क्योंकि ईरान युद्ध अंत नहीं है, अमेरिका यूरोप और मिडिल ईस्ट वाले ज़ब तक लड़ लड़ कर मर नहीं जाएंगे वे सुकून से नहीं बैठेंगे। कारण वही कि ये शत्रु होते नहीं है अपितु सत्ता के लिए काल्पनिक पात्र बनाकर लड़ाते है।
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