24/10/2026
चप्पल और पिता के फटे जूते
रोहन का आज कॉलेज का पहला दिन था। उसने बड़े शहर के एक नामी कॉलेज में दाखिला लिया था। जब वह घर से निकलने लगा, तो उसके पिता, जो एक मामूली दर्जी थे, ने अपने पुराने बटुए से कुछ मुड़े-तुड़े नोट निकाले और रोहन के हाथ में रख दिए।
रोहन ने जब पिता के पैरों की तरफ देखा, तो उसे बहुत बुरा लगा। पिता के जूते आगे से पूरी तरह फट चुके थे, और उनकी उंगलियाँ बाहर दिख रही थीं। रोहन ने भारी आवाज़ में कहा, "पापा, आपके जूते टूट गए हैं। आप पहले अपने लिए नए जूते ले लीजिए, कॉलेज की फीस और किताबों के बाद जो बचेगा, मैं उससे काम चला लूँगा।"
पिता ने मुस्कुराते हुए रोहन के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, दर्जी का काम है, बैठे-बैठे मशीन चलानी होती है। मुझे नए जूतों की क्या ज़रूरत? तुम जाओ और मन लगाकर पढ़ाई करो।"
कॉलेज की दौड़-भाग में दो साल बीत गए। रोहन हर महीने घर आता, तो देखता कि पिता उन्हीं फटे जूतों में गुज़ारा कर रहे थे। वे हमेशा कहते, "अगले महीने ले लूँगा।"
एक दिन कॉलेज में एक बड़ी कंपनी का इंटरव्यू था। रोहन ने बहुत मेहनत की थी और उसका चयन (Selection) हो गया। उसे एक बहुत अच्छी नौकरी मिल गई थी। कंपनी ने उसे तुरंत ज्वाइनिंग बोनस के रूप में कुछ पैसे दिए।
पैसे मिलते ही रोहन के दिमाग में सबसे पहला ख्याल अपने पिता का आया। वह बिना किसी को बताए सीधे बाज़ार गया और पिता के लिए सबसे बेहतरीन चमड़े के जूते खरीदे। वह उसी शाम सरप्राइज देने के लिए गाँव की बस पकड़कर घर पहुँच गया।
जब वह घर पहुँचा, तो घर में सन्नाटा था। पिता अपनी सिलाई मशीन के पास बैठे काम कर रहे थे। रोहन चुपके से पीछे गया और जूतों का डिब्बा उनके सामने रख दिया।
"ये क्या है बेटा?" पिता ने चौंककर पूछा।
"पापा, मेरी नौकरी लग गई है! और ये आपके लिए नए जूते हैं। अब आपको वो फटे जूते पहनने की कोई ज़रूरत नहीं है।" रोहन ने गर्व से कहा।
पिता की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने धीरे से सिलाई मशीन के नीचे से अपने पैर निकाले। रोहन ने देखा कि पिता के पैरों में जूतों की जगह एक पुरानी रबर की चप्पल थी।
रोहन ने हैरान होकर पूछा, "पापा, वो जूते कहाँ गए? सुबह तो आप वही पहनकर दुकान गए थे ना?"
तभी माँ रसोई से बाहर आईं और रोहन के सिर पर हाथ रखकर रोते हुए बोलीं, "बेटा, वो जूते तुम्हारे पापा के नहीं थे। वो तो उन्होंने तीन साल पहले कूड़े के ढेर से उठाए थे, ताकि जब तुम कॉलेज जाओ, तो तुम्हें यह न लगे कि तुम्हारे पिता के पास जूते भी नहीं हैं। वे रोज़ सुबह घर से निकलते वक्त वो फटे जूते पहन लेते थे ताकि तुम्हें तसल्ली रहे, और गली मोड़ते ही उन्हें उतारकर थैले में रख लेते थे और चप्पल पहनकर दुकान जाते थे।"
माँ ने आगे कहा, "उन्होंने उन जूतों को बस एक मुखौटा बनाया था, ताकि तुम्हारी पढ़ाई का खर्च उठाने में कोई कमी न आए और तुम कभी हीन भावना (Inferiority Complex) का शिकार न हो।"
यह सुनकर रोहन के हाथ से जूतों का डिब्बा छूट गया। वह पिता के घुटनों के बल बैठ गया और उनके पैरों को पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगा। उसने महसूस किया कि ब्रांडेड जूतों से कहीं ज़्यादा कीमती उसके पिता के पैरों के छाले और उनका वह मूक त्याग था।