15/08/2026
कभी-कभी ना… मेरा मूड यूँ ही खराब नहीं होता।
इसके पीछे कोई वजह होती है…
और ज़्यादातर वो वजह मेरे अपने घर से ही जुड़ी होती है।
आज भी मन बहुत भारी है।
अंदर से बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा।
ऐसा लगता है जैसे बहुत कुछ कहना है,
बहुत कुछ सहना है…
लेकिन शब्द ही नहीं मिल रहे।
जब मैं बहुत ज़्यादा स्ट्रेस में होती हूँ ना,
तो मुझे घर से थोड़ी देर बाहर निकलना अच्छा लगता है।
ऐसा नहीं है कि बाहर निकलते ही सारी परेशानियाँ खत्म हो जाती हैं…
लेकिन कम से कम कुछ देर के लिए मन को सांस लेने की जगह मिल जाती है।
इसलिए आज फिर घर के सामने लगे फूड स्टॉल की तरफ निकल रही हूँ।
मेरी कोई बड़ी-बड़ी ख्वाहिशें नहीं हैं।
मुझे बस अपना पसंदीदा फ्राइड राइस या बर्गर खाना है…
और कुछ देर के लिए अपने मन को समझाना है कि—
सब ठीक हो जाएगा।
कभी-कभी हम औरतों को ना,
बहुत बड़ी चीज़ नहीं चाहिए होती…
बस थोड़ी सी शांति चाहिए होती है।
कोई बिना पूछे समझ ले कि हम अंदर से कितने थके हुए हैं।
कोई बस इतना कह दे—
“तुम परेशान मत हो, मैं हूँ ना।”
लेकिन जब ऐसा कोई नहीं मिलता,
तो हम खुद ही अपना हाथ पकड़कर बाहर निकलते हैं।
कभी-कभी तो मन करता है…
बस बच्चों को लेकर कहीं बहुत दूर चली जाऊँ।
इतनी दूर…
जहाँ ये रोज़-रोज़ की बातें न हों,
ये तनाव न हो,
ये भारीपन न हो।
फिर सोचती हूँ…
जाऊँ भी तो कहाँ जाऊँ?
घर छोड़ देना शायद आसान ख्याल लगता है,
लेकिन एक माँ के लिए अपने बच्चों के साथ नई शुरुआत की कल्पना करना इतना आसान नहीं होता।
इसलिए फिलहाल…
मैं भाग नहीं रही।
बस थोड़ी देर के लिए बाहर निकल रही हूँ।
थोड़ा अपना पसंदीदा खाना खाऊँगी,
थोड़ी हवा लूँगी,
अपने बच्चों को देखूँगी…
और फिर खुद को समझाऊँगी—
कि जिंदगी चाहे जितनी मुश्किल हो,
मुझे टूटना नहीं है।
क्योंकि मेरे बच्चों की दुनिया में
मेरी मुस्कान की भी एक जगह है।
और शायद आज का दिन भी गुजर जाएगा।
शायद कल मन थोड़ा हल्का हो।
और अगर कल भी नहीं हुआ…
तो कोई बात नहीं।
मैं फिर थोड़ा बाहर निकलूँगी,
फिर अपने लिए कुछ छोटा सा करूँगी,
फिर खुद को संभालूँगी।
क्योंकि हर बार किसी और के सहारे की जरूरत नहीं होती…
कभी-कभी खुद का हाथ पकड़कर भी
बहुत दूर तक चला जा सकता है।
आज बस इतना ही…
एक फ्राइड राइस,
एक बर्गर,
थोड़ी सी खुली हवा…
और बहुत सारा भारी मन।
लेकिन उम्मीद है…
ये मन भी एक दिन हल्का जरूर होगा।