14/07/2026
सावन की अंधियारी रात है। कमरे में लेटी मीनू बिना पल्लों वाली खिड़की से बाहर आसमान को निहार रही है। तभी घने बादलों की ओट से बारिश का झोंका उसके चेहरे को भिगोते हुए गुजर जाता है।
अभी थोड़ी देर पहले उसने नमक, मिर्च और लहसुन की चटनी गोंइठे में सेंकी लिट्टी के साथ खायी है, जिसकी तीखी तासीर अब तक जब़ान महसूस कर रही है।
तभी मोबाइल की घंटी बजती है।
दो महीने पहले कमाने के लिए दिल्ली गये उसके पति का फोन है।
"हैलो!"
दूसरी तरफ से पति की भारी आवाज सुनकर उसका मन बैठ गया!
"क्या बात है जी?"
प्रत्युत्तर में दूसरी तरफ से रुलाई फूट पड़ी!
"ये क्या! आप हम औरतों की तरह रो रहे हैं! अभी घर से गये दो महीने ही तो हुए हैं!"
"वो बात नहीं है रे!"
"फिर रो क्यों रहे हैं! जानते हैं ना, कितनी मुश्किल से आपकी नौकरी पाहुन ने लगवायी है! अब हमारे दिन भी फिर जायेंगे इस नौकरी से! रोइये मत, मन लगाकर काम कीजिये!"
"तुम बात नहीं समझ रही!"
"क्या नहीं समझ रही! बाइस हजार की नौकरी मिलेगी कहीं!"
"पर बाइस मिल कहाँ रहे हैं!"
"क्या!"--मीनू को सहसा विश्वास नहीं हुआ--"पाहुन ने तो बाइस ही कहा था!"
"पाहुन ने गलत नहीं कहा था!"
"फिर...!"
"तुम्हें तो पता है कि हमारी कंपनी एक सरकारी उपक्रम के पार्ट्स ठेके पे बनाती है!"
"हाँ, तो...!"
"उसके हेड ने हमारे सुपरवाइजर से मैसेज भिजवाया है! महीने के पाँच हजार उसको चाहिए!"
मीनू का पारा चढ़ा--"ऐसे कैसे भला! मेहनत आपकी और बाइस में पाँच उसके!"
"यहाँ का यही रिवाज है!"
"भांड़ में गया ऐसा रिवाज! वो हेड कौन जात का है मुँहझौंसा?"
"जात तो नहीं पता, पर हमारे प्रदेश को लेकर बड़ा उल्टा-सीधा बोल रहा था!"
"आपको?"
"नहीं! मेरे सुपरवाइजर को। कह रहा था, ऐसे काम के लिए दिल्ली में पंद्रह-सोलह हजार बहुत हैं, और तुम बाइस पर ठीक किये हो! वो एक्स्ट्रा पाँच हजार मुझे चाहिए!"
"सुपरवाइजर ने क्या कहा!"
"वो बिचारा क्या कहेगा! उसने तो खुद मन बनाया था कि महीने के एक हजार लेगा मुझसे! पर अब कह रहा है कि जब हेड ने ही इतना बड़ा मुँह खोल दिया तो मैं क्या कहूँ!"
"तो आप हेड की शिकायत ऊपर कीजिए! उससे भी बड़े पद पर तो लोग होंगे ना!"
"कोई फायदा नहीं! वो भी नीचे वाले सिक्योरिटी गार्ड, रसोइये और माली वगैरह से रुपये बाँधे हैं महीने के! मैं शिकायत करुंगा तो हेड मेरे काम में जानबूझकर मीनमेख निकालेगा और नौकरी खा जायेगा!"
"तनख्वाह कितनी है उस पापी की?"
"डेढ़ लाख!"
"फिर भी पेट नहीं भरता उस मुँहझौंसे का! आप उससे अपनी परिस्थिति तो बताइये, शायद तरस खा जाये!"
"सुपरवाइजर ने कहा था कि गरीब बंदा है। गाँव में बीवी-बच्चे किसी तरह गुजर-बसर कर रहे हैं, छोड़ दीजिए इसे!"
"तो क्या कहा उसने?"
"कहता है, नहीं छोड़ सकता! सबसे जो लेता है!"
"तो क्या करेंगे? छोड़ देंगे नौकरी?"
"दूसरी इतनी आसानी से कहाँ मिलेगी रे! मान कर चलो कि मुझे सत्रह ही मिल रहे हैं!"
"कैसे मान लूं जी! साल के साठ हजार होते हैं खून-पसीने की कमाई के! मैं तो समझती थी कि ये घूस-फूस का चक्कर बस सरकारी नौकरी में ही चलता है, पर प्राइवेट में भी...!"
"आदमी, बस आदमी होता है रे! सरकारी या प्राइवेट होने से उसकी नीयत थोड़े बदलती है!"
"अब क्या करेंगे आप? इससे अच्छा तो कोई धंधा ही कर लेते!"
"नौकरी करुंगा, और क्या! बाकी धंधा करने की सलाह तो सभी देते हैं, मानो इसमें कुछ लगता ही नहीं!"
"क्या हो गया है इस समाज को!"
जहाँ डेथ सर्टिफिकेट तक बनवाने के लिए पैसे देने पड़ते हों, जहाँ किसी का पति मरा हो, उसकी पत्नी को पेंशन चालू करवाने के लिए चढ़ावा चढ़ाना पड़ता हो, उस सिस्टम और समाज से क्या ही आस करें हम नैतिकता की! ये अच्छा फल मिल रहा है मन लगाकर काम करने का!"
कुछ देर तक मीनू के मुँह से बोल ना फूटे! फिर उसने एक गहरी साँस ली....
"ठीक है, देते रहिये उसे हर महीने पाँच हजार! किसी दूसरे की मेहनत का हक मारने वाला! कीड़े पड़ेंगे उस मुँहझौंसे को! एक दिन भगवान उसका भी न्याय करेंगे...!"*