Pintu Kumar kachhiyana

Pintu Kumar kachhiyana short Trick Pintu Kumar

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हमारे देश के सबसे पसंदीदा उद्योग पति रतन टाटा जी अब इस दुनिया में नहीं रहे ना आप के जैसा कोई ईमानदार था ना कोई सईद भविष्...
10/10/2024

हमारे देश के सबसे पसंदीदा उद्योग पति रतन टाटा जी अब इस दुनिया में नहीं रहे ना आप के जैसा कोई ईमानदार था ना कोई सईद भविष्य में कोई होगा पूरा देश आप के जाने से दुःखी है सर भगवान आप को अपने श्री चरणों में स्थान दे
I miss u 😭😭😭😭😭😭😭

Masti time holi
13/03/2023

Masti time holi

Selfee time
03/03/2023

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ऐ सच्ची कहानी है साथियों
23/01/2023

ऐ सच्ची कहानी है साथियों

Masti time
04/07/2022

Masti time

नज़र और नसीब का भी क्या इत्तेफाक है यारों,नज़र उसे ही पसंद करती है जो नसीब में नहीं होता!!(I Miss you life)
09/06/2022

नज़र और नसीब का भी क्या इत्तेफाक है यारों,
नज़र उसे ही पसंद करती है जो नसीब में नहीं होता!!(I Miss you life)

“अरे बुढ़िया तू यहाँ न आया कर, तेरा बेटा तो चोर-डाकू था, इसलिए गोरों ने उसे मार दिया“ जंगल में लकड़ी बीन रही एक मैली सी धो...
03/04/2022

“अरे बुढ़िया तू यहाँ न आया कर, तेरा बेटा तो चोर-डाकू था, इसलिए गोरों ने उसे मार दिया“
जंगल में लकड़ी बीन रही एक मैली सी धोती में लिपटी बुजुर्ग महिला से वहां खड़े व्यक्ति ने हंसते हुए कहा
“नही चंदू ने आजादी के लिए कुर्बानी दी हैं“ बुजुर्ग औरत ने गर्व से कहा।
उस बुजुर्ग औरत का नाम था जगरानी देवी और इन्होने पांच बेटों को जन्म दिया था, जिसमें आखिरी बेटा कुछ दिन पहले ही आजादी के लिए बलिदान हुआ था। उस बेटे को ये माँ प्यार से चंदू कहती थी और दुनिया उसे आजाद ... जी हाँ ! चंद्रशेखर आजाद के नाम से जानती है।

हिंदुस्तान आजाद हो चुका था, आजाद के मित्र सदाशिव राव एक दिन आजाद के माँ-पिता जी की खोज करते हुए उनके गाँव पहुंचे। आजादी तो मिल गयी थी लेकिन बहुत कुछ खत्म हो चुका था। चंद्रशेखर आज़ाद के बलिदान के कुछ वर्षों बाद उनके पिता जी की भी मृत्यु हो गयी थी। आज़ाद के भाई की मृत्यु भी इससे पहले ही हो चुकी थी।
अत्यंत निर्धनावस्था में हुई उनके पिता की मृत्यु के पश्चात आज़ाद की निर्धन निराश्रित वृद्ध माता उस वृद्धावस्था में भी किसी के आगे हाथ फ़ैलाने के बजाय जंगलों में जाकर लकड़ी और गोबर बीनकर लाती थी तथा कंडे और लकड़ी बेचकर अपना पेट पालती रहीं। लेकिन वृद्ध होने के कारण इतना काम नहीं कर पाती थीं कि भरपेट भोजन का प्रबंध कर सकें। कभी ज्वार कभी बाज़रा खरीद कर उसका घोल बनाकर पीती थीं क्योंकि दाल चावल गेंहू और उसे पकाने का ईंधन खरीदने लायक धन कमाने की शारीरिक सामर्थ्य उनमे शेष ही नहीं थी।

शर्मनाक बात तो यह कि उनकी यह स्थिति देश को आज़ादी मिलने के 2 वर्ष बाद (1949 ) तक जारी रही।
चंद्रशेखर आज़ाद जी को दिए गए अपने एक वचन का वास्ता देकर सदाशिव जी उन्हें अपने साथ अपने घर झाँसी लेकर आये थे, क्योंकि उनकी स्वयं की स्थिति अत्यंत जर्जर होने के कारण उनका घर बहुत छोटा था। अतः उन्होंने आज़ाद के ही एक अन्य मित्र भगवान दासमाहौर के घर पर आज़ाद की माताश्री के रहने का प्रबंध किया और उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा की।

मार्च 1951 में जब आजाद की माँ जगरानी देवी का झांसी में निधन हुआ तब सदाशिव जी ने उनका सम्मान अपनी माँ के समान करते हुए उनका अंतिम संस्कार स्वयं अपने हाथों से ही किया था।

देश के लिए बलिदान देने वाले क्रांतिकारियों के परिवारों की ऐसी ही गाथा है।

 #भगतसिंह  #स्वाधीनतासंग्राम   इस असाधारण व्यक्तित्व के बारे में होने को हजार बातें है मगर फिलहाल सिर्फ तीन ;एक. इतनी कम...
30/03/2022

#भगतसिंह #स्वाधीनतासंग्राम
इस असाधारण व्यक्तित्व के बारे में होने को हजार बातें है मगर फिलहाल सिर्फ तीन ;

एक.
इतनी कम उम्र में वे हर मामले में समूची समग्रता के साथ स्पष्ट थे। दुनिया के बारे में भी देश के बारे में भी ।

🔴 साम्प्रदायिकता (हिन्दू मुस्लिम के नाम पर की जाने वाली राजनीतिक लुच्चयाई) के बारे में एकदम बेबाक थे तब जबकि अंग्रेजो की फूट डालो राज करो नीति उभार पर थी, और उनके पटु सावरकर कूद चुके थे ।

🔴 जाति के बारे में पूरी तरह मुखर थे ; उसकी ज्यादतियों के निर्मम आलोचक थे, उसके उन्मूलन के बारे में दृढ़प्रतिज्ञ थे । वह भी तब जब उस दौर के सबसे बड़े नेता गांधी (तब तक कट्टर वर्णाश्रमी) और छुआछूत बरतने वाले तिलक थे । तब जब डॉक्टर आंबेडकर की थीसिस नहीं आयी थी ।

🔴 विकास के रास्ते के बारे में भी साफ़ थे। वैज्ञानिक समाजवाद के हामी थे।

🔴 आजादी के स्वरूप और संगठन के रूप के मामले में वे बिलकुल साफ़ थे ; (सिर्फ फिलॉसफी ऑफ़ बम और नौजवानो के नाम चिट्ठी ही पढ़ लें ।)

दो
🔴 वे परिपक्व क्रांतिकारी - मैच्योर राजनीतिज्ञ थे ।
लाला लाजपत राय से असहमति थी मगर बदला उन्हीं की मौत का लिया । गांधी से मतभेद थे किन्तु उनके प्रति उग्रता कभी नहीं दिखाई । नेहरू, सुभाष के साथ गांधी को देश का सबसे बड़ा नेता ही माना ।

🔴 न अहंकार था, न व्यक्तिवाद । न प्रचार लिप्सा न सुविधा की कोई आकांक्षा ।

तीन
इतनी कम उम्र में वे दुनिया के सबसे पढ़े लिखे क्रांतिकारी थे । दुनिया को जानना चाहते थे - ताकि उसे बदल सकें ।

🔴 फांसी के वक़्त भगत सिंह सिर्फ 23 वर्ष, 5 महीने, 25 दिन के थे । मगर इस बीच वे सैकड़ों किताबे पढ़ चुके थे।
उनके सहयोगी शिव वर्मा के अनुसार वे ;
🔺 स्कूल के दिनों में 50
🔺 कालेज के दिनों में 200
🔺 716 दिन की जेल में 300 किताबें पढ़ चुके थे ।

🔵 जंग के बीच आगरा में जब असेम्बली में बम फैंकने की प्लनिंग हो रही थी तब भी उनके पास 70 लेखकों की 175 किताबों की लाइब्रेरी थी ।
🔺 वे हर किताब को पढ़ कर, उसके नोट्स लेते थे, बहस करते थे - अपनी राय और समझ को अपडेट करते थे ।

🔴 फांसी के कुछ घंटों पहले उन्हें वकील प्राण मेहता लेनिन की स्टेट एंड रेवोल्यूशन (राज्य और क्रांति) देकर आये थे । वे उसे पढ़ रहे थे और फाँसी का बुलावा लेकर आये जेलर से उन्होंने कहा था ;
"ठहरो - अभी एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल रहा है।"
इस तरह लेनिन से मिलकर वे शहीद हुए ।

कृपया ध्यान दें
🔴 यही सब करके ही याद किया जा सकता है भगतसिंह को । इसके बिना याद करना पाखण्ड और कर्मकाण्ड होगा
पिंटू कुमार
Pintu Kumar
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 #सिनियर_जस्टिस_सैय्यद_आग़ा_हैदर एक ऐसी  #देशभक्त शक्सियत का नाम है , जिसने महान सेनानी  िंह को अपनी कलम से  #फाँसी लिखन...
30/03/2022

#सिनियर_जस्टिस_सैय्यद_आग़ा_हैदर एक ऐसी #देशभक्त शक्सियत का नाम है , जिसने महान सेनानी िंह को अपनी कलम से #फाँसी लिखने से इनकार कर दिया था,बल्कि इसके विपरीत अंग्रेज़ी हुकूमत को अपना #इस्तीफ़ा लिख दिया था। 🇮🇳

तुम कहाँ कहाँ से गौरवशाली इतिहास को मिटाओगे, जहाँ से खोदोगे वहां से सैय्यद आगा जैसे महान देशभक्त निकलेगे।

इतिहास के पन्नो पर जस्टिस सैय्यद आग़ा हैदर का नाम वतनपरस्ती के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

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जब आप 23 साल में सोना मोना बाबू कर रहे हैं। उस उम्र में एक क्रांतिकारी देश के युवाओं में इंकलाब भर रहा था। उसकी सोच को स...
26/03/2022

जब आप 23 साल में सोना मोना बाबू कर रहे हैं।
उस उम्र में एक क्रांतिकारी देश के युवाओं में इंकलाब भर रहा था। उसकी सोच को समझने के लिए 70 साल के गांधी को नहीं 23 साल के भगत सिंह जी को पढ़िए।
गांधी को जवाब देने के लिए क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा जी और भगत सिंह द्वारा जेल में लिखा गया उनका प्रसिद्ध लेख 'बम दर्शन' पढ़िए। यकीन मानिए आप बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो जाएंगे।

23 दिसम्बर, 1929 को क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्तम्भ वायसराय की गाड़ी को बम से उड़ाने का प्रयास किया, जो असफल रहा। गांधी ने इस घटना पर एक कटुतापूर्ण लेख ‘बम की पूजा’ लिखा, जिसमें उन्होंने अंग्रेज वायसराय को देश का शुभचिंतक और
भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे नवयुवक क्रांतिकारियों को आजादी के रास्ते में रोड़ा अटकाने वाले कहा। इसी के जवाब में हिन्दुस्थान प्रजातन्त्र समाजवादी सभा की ओर से भगवती चरण वोहरा ने “बम का दर्शन” लेख लिखा, जिसका शीर्षक “हिन्दुस्थान प्रजातन्त्र समाजवादी सभा का घोषणापत्र” रखा। भगत सिंह ने जेल में इसे अन्तिम रूप दिया।
26 जनवरी, 1930 को इसे देश भर में बांटा गया। यह पूरा लेख यहां पोस्ट नहीं कर सकता लेकिन आपको गूगल पर सर्च करने पर आसानी से मिल जाएगा और आपको इसे जरूर पढ़ना चाहिए

#भगतसिंह

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