30/10/2021
आदिवसी धर्म एक सोचनीय विषय,इसीलिए 10 मिनिट समय निकालकर जरूर पढ़ें व विचार करें।
सबसे पहले तो कहना चाहूँगा कि आदिवासी किसी भी धर्म में नही आते हैं। क्योंकि उनकी जो संस्कृति-कला,रीति-रिवाज,रहन-सहन,खानपान सभी धर्मों से अलग है। आप भारत के आदिवासियों के किसी भी क्षेत्र में चले जाइये। आपको उनकी संस्कृति-कला सबसे अलग देखने को मिल जायेगी। हालांकि इसके पहले,,मैं आदिवासी धर्म के मुद्दे को लेकर,,चर्चा कर चुका हूँ। जो पूर्णतः सत्य है। आदिवासी प्रकृति पूजक होतें हैं। वो सूर्य-आकाश-भूमि-जल-अग्नि को सत्य मानते हैं। हाँ, हम कह सकतें हैं कि हिन्दू धर्म और आदिवासी धर्म में ये पांचों तत्व समानता है। हिन्दू धर्म में भी पांचों तत्वों की पूजा होती है और आदिवासी धर्मों में भी पांचों तत्वों की पूजा होती है। इसके अलावा हिन्दू धर्म में और आदिवासी धर्म में महादेव की समानता है। इसके अलावा हिन्दू धर्म की संस्कृति-कला और आदिवासी धर्म की संस्कृति कला सबसे अलग है।
ऐसे ही ईसाई धर्म,मुस्लिम धर्म, सिख धर्म,बौद्ध-जैन धर्म,वैष्णव धर्म और पारसी धर्म से भी,,आदिवसी धर्म सबसे अलग धर्म है। हालांकि एक समयानुसार आदिवसी लोगों को सभी धर्मों में विलुप्त कर लिया गया।
लेकिन इससे आदिवसी धर्म का अस्तित्व आज खतरे में पड़ गया है। जो बहुत ही सोचनीय व विचारणीय वाली बात है। यदि आदिवसी धर्म अलग नही किया गया,तो आने वाले समय में आदिवसी धर्म ही समाप्त हो जायेगा।
आज भारत में आदिवासियों की जनसंख्या लगभग 11-12 करोड़ है। जो अलग-अलग समुदायों की अलग-अलग संस्कृति-कला की भारत में अलग ही पहचान है।
आज खुद को कुछ लोग आदिवासी कहतें हैं। जो कि ये बिल्कुल असत्य है,,क्योंकि जो आदिवासी होगा। उसकी अपनी एक अलग ही पहचान व संस्कृति-कला होगी। जो भारत के किसी भी जाति-धर्मों से सबसे अलग है। हालांकि आप लोग आदिवासी क्षेत्र में जाकर पता लगा सकतें हैं।
मैं ऐसे लोगों को आदिवसी नही मानता,जो खुद तो आदिवसी कहता है और आदिवसी धर्म अलग करने का विरोध करता है। यदि आदिवसियों से किसी भी जाति-धर्म की संस्कृति-कला,रहन-सहन मिल जाये,,या फिर ऐसा कोई जाति-धर्म बताओ। जो आदिवसी संस्कृति- कला को मानता हो या फिर अपनाये हों। भारत में ऐसा कोई जाति-धर्म ही नही है,जो आदिवसी संस्कृति- कला को अपनाया हो। इसीलिए आदिवासी धर्म को बचाने के लिए,, आदिवसी धर्म अलग होना बहुत जरूरी है।
भारत एक पंथ निरपेक्ष राष्ट्र है।
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