08/05/2026
. राधाजी का नुपुर
वृन्दावन में प्रियाजी के एक परम भक्त श्यामचरणदासजी थे। वे सन्त अत्यन्त विनम्र और सेवाभावी थे। उनका मुख्य भजन और सेवा सुबह 4:00 बजे उठकर पूरे वृन्दावन के मार्गों पर झाड़ू (सोहनी सेवा करना) लगाना था।
वे इस सेवा को बहुत ही कोमलता से करते थे, क्योंकि उनके मन में यह भाव था कि वृन्दावन की रज श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) का ही स्वरूप है। सोहनी सेवा करते समय वे हमेशा इस आशा में रहते थे कि शायद उन्हें कहीं किशोरी जी या ठाकुर जी के चरण चिन्हों के दर्शन हो जाएं।
बरसों की इस निस्वार्थ सेवा को देखकर श्री राधा रानी के मन में उन पर कृपा करने का भाव आया। एक दिन उन्होंने सन्त को अपने दिव्य चरण चिन्हों के दर्शन कराए।
इन चिन्हों को देखकर सन्त का विश्वास और गहरा हो गया और अब उनके मन में साक्षात राधा रानी के दर्शन की तीव्र अभिलाषा जाग उठी।
भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए राधा रानी ने एक लीला रची। रास के दौरान उन्होंने अपना एक बहुमूल्य नूपुर (पायल) वहीं छोड़ दिया।
अगले दिन सोहनी सेवा करते समय वह नूपुर उस सन्त को मिला। उसकी अलौकिक सुन्दरता और हल्कापन देखकर वे समझ गए कि यह किसी साधारण स्त्री का नहीं है। उन्होंने उसे सुरक्षित रख लिया कि जब कोई इसे मांगने आएगा तो वे उसे लौटा देंगे।
सखियों के साथ विचार-विमर्श कर राधा रानी ने ललिता और विशाखा सखियों को एक वृद्धा का रूप धरकर नूपुर खोजने भेजा।
जब वे सन्त के पास पहुँचीं और नूपुर मांगा, तो सन्त ने बड़ी चतुराई दिखाई। उन्होंने कहा–‘वे नूपुर तभी देंगे जब उसकी असली मालकिन स्वयं आकर दूसरे पैर का नूपुर दिखाकर उसकी पहचान कराएगी।’
सखियों के माध्यम से राधा रानी स्वयं एक वधू के रूप में वहां पहुँचीं। जैसे ही सन्त ने उनके चरणों का स्पर्श किया, उन्हें साक्षात किशोरी जी के दर्शन हो गए।
भावविभोर होकर वे उनके चरणों से लिपट गए। राधा रानी ने प्रसन्न होकर उसी नूपुर से सन्त के माथे पर एक तिलक का चिन्ह बना दिया और कहा–‘यह छाप सदैव उनके मस्तक पर रहेगी।’
जब सन्त अपने आश्रम लौटे, तो उनके गुरुजी ने माथे पर नया चिन्ह देखकर उन्हें टोका और उसे मिटाकर पारंपरिक तिलक लगाने को कहा।
गुरु की आज्ञा मानकर सन्त ने उसे यमुना जल से मिटाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वह दिव्य चिन्ह नहीं मिटा। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। गुरुजी को लगा कि उनका शिष्य हठ कर रहा है और उनकी अवहेलना कर रहा है। इस अविश्वास के कारण आश्रम में विवाद की स्थिति बन गई।
सन्त ने तब मन ही मन प्रार्थना की कि उनके कारण गुरु के मन में संशय न रहे। राधा रानी के आदेश पर भगवान के सखा सुबल जी साक्षात् आश्रम में प्रकट हुए।
सुबलजी ने प्रमाणित किया कि यह चिन्ह स्वयं किशोरी जी ने भक्त पर प्रसन्न होकर प्रदान किया है। सच्चाई जानकर गुरुजी को अपनी भूल पर बहुत पश्चाताप हुआ।
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॥जय जय श्री राधे॥
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