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23/06/2024

‼ऋषि चिंतन‼*
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*सदैव सद्विचारों का स्वागत करो*
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👉 "आपसे पूछा जाए कि क्या आप इस संसार और मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठ वस्तु प्राप्त करना चाहते हैं?" आप पूछेंगे - "बतलाइए यह क्या है? हम और सब छोड़कर उसे अवश्य ही प्राप्त करना चाहेंगे।" संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु बड़ी दिव्य और अदृश्य है। ईश्वर ने हम सभी को वह बहुमूल्य मशीन दी है, जिसके द्वारा यह सर्वश्रेष्ठ वस्तु उत्पन्न की जा सकती है।

👉 अथर्ववेद (६/१०८/१) में इस महाशक्ति-इस सर्वश्रेष्ठ वस्तु का संकेत इन शब्दों में कर दिया गया है- _*"त्वं नो मेधे प्रथमा।" अर्थात "सद्विचार ही संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है।* विचार उत्पन्न करने का यंत्र हमारा मस्तिष्क है।
👉 विचारों का स्वभाव है कि उनका अतिथि सत्कार करो तो वे पुष्ट होते हैं, बढ़ते हैं, विकसित होकर नवजीवन निर्माण करते हैं। यदि उन्हें दुत्कार दो या उनको बेइज्जत कर दो और उचित परवाह न करो, तो वे चले जाते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं। ऐसे विचारों की कब्रें मन में पड़ी रहती हैं। अत: तुम जिन विचारों को अपना मित्र समझो, जिनसे अच्छी आदत बनती हो, उत्तम स्वभाव का निर्माण होता हो, उन्हीं का बार-बार चिंतन करो। "अतिथि-सत्कार करो।" इन भव्य विचारों का तुम्हारे जीवन की प्रत्येक घटना पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। "मनुष्य का जीवन घटनाओं का समूह है और ये घटनाएँ हमारे विचारों के परिणाम हैं।" तुम्हारे अंदर जो विचारशक्ति है, तुम चाहो तो उसके उचित उपयोग से देवता बन सकते हो और यदि चाहो तो पशु भी बन सकते हो।
👉 "विचार" एक "शक्ति" है, उसका अच्छे कार्यों में भी प्रयोग किया जा सकता है और मानवता को कलंकित करने वाले कार्यों में भी नष्ट किया जा सकता है।
👉 "भारतवर्ष में "महामानवों" की संख्या शेष विश्व के महापुरुषों की सम्मिलित संख्या से भी बहुत अधिक है; उसका एक ही कारण है कि यहाँ "विचारशक्ति" का नियंत्रित उपयोग किया गया।" विश्व के इतिहास में ऐसा कोई भी देश नहीं है, जिसने विचारबल की इतनी तत्परतापूर्वक शोध की हो और उसका उपयोग जन-कल्याण में किया हो। "हमारे यहाँ इस महामहिमामयी शक्ति का उपयोग व्यक्तिगत उत्थान, शिक्षा, संपत्ति, शोध कार्य आदि में भी किया गया और लोकोत्तर जीवन के रहस्य जानने के लिए भी उसे काम में लाया गया।)
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*विचार परिवर्तन से व्यक्तित्व निर्माण पृष्ठ-६*
*🪴पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 🪴*
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गायत्री मंत्र हर कोई जानता ही है पर मूल ज्ञान और बोध से सब दूर है गायत्री तीनों आयामों की प्राण शक्ति है जो सबसे पहले आप...
20/06/2024

गायत्री मंत्र हर कोई जानता ही है पर मूल ज्ञान और बोध से सब दूर है गायत्री तीनों आयामों की प्राण शक्ति है जो सबसे पहले आपको जरूरतमंद से उठाकर देवता बना देगी ततसवितुर वरेण्यम यानी जो जो भी कमी है आपके पास वह सब कुछ आपके पास दौड़ा चला आएगा परिवार रिश्ते धन दौलत संपन्नता और सर्व प्रकार के सुख वॆॆभव जो चाहा सब कुछ मिला सफलता पराक्रम ब्रह्म ज्ञान पालन की क्षमता कल्याण करने की शक्ति पवित्र जीवन गृह लक्ष्मी के प्रतीषठऻ प्रकृति अनुरूप अनुशासन योग प्रेम तेज बल सब कुछ यह तो था पहलऻ आयाम।।।।।दूसरा आयाम यह सब मिल जाने के कारण मानसिक संतुलन अच्छा हुआ सहयोग और सहिष्णुता समाज में मिली दूसरों की रक्षा करने और खुद रक्षित होने हेतु भाव। उत्पन्न हुई बुद्धि प्रखर हुई दमन और निष्ठा धरण की । इंद्रिय संयम प्राप्त हुआ प्राण संयम तब के बल सबका उद्धार हो ऐसी भावनाएं जागी और अच्छे उत्तम स्वास्थ्य के प्रति सजगता।।भर्गो देवस्य धीमहि ।।।।।।जो कुछ मिला उसे सबका फायदा पहुंचाओ या यह मिला ही इसीलिए है कि दूसरों को लाभ पहुंचाया जा सके तथा जो कुछ भी उन दोनों आयाम से मिला है उनको समाज की सेवा में लगा सकें शिष्टाचार का परिचय दें और सब का सहयोग करें यही है तीसरा आयाम धियो यो न प्रचोदयात् ।।धर्म यानी जीवन प्रबंधन अर्थ यानी धन प्रबंधन कऻम यानी स्वास्थ्य प्रबंधन और मोक्ष यानी अपनी ऊर्जाओं को मूलाधार से उठाकर सहस्त्र के द्वारा संपूर्ण ब्रह्मांड में विस्तारित कर देना अपने आप को एक विचार के रूप में मुक्त कर देना। ।

मन्त्र को रट्टा मारके उसका जप या रटण करना उसका होम हवन अनुष्ठान करना एक फैशन हो गया है

कोई पूछे भाई गायत्री क्यूँ करनी चाहिए उसके पास चव्वनी जितनी समझ होती है बात मानो पंडितो की तरह कर रहा होगा

इसका महाविज्ञान कोई कम ही जानता होगा और उसका मूल स्वरुप क्या है उसकी पहचान करोड़ो में से किसी एक को होगी

विश्वामित्र रचित एक त्रिपदा को जपना और उसको एक युनिवर्सल मन्त्र बना देना उसके पीछे का रहस्य क्या?

क्यों यह मन्त्र इतना विशेष है ?

लोग सुबह सीडी में या पेन ड्राइव या फिर अलारम या रींग टोन में बजा देते है

इनको पता भी नहीं की इसका अर्थ क्या होता है

किसी वैज्ञानिक ने एक अविष्कार कर दिया फिर वो अविष्कार घर के एक कोने में पड़ा होगा

जैसे मोबाइल टीवी ac बनाने वाले ने मेहनत का निचोड़ कर दिया पर भोगने वाले को यह पता ही नहीं की इसकी कीमत वो वैज्ञानिक के लिए कितनी रही होगी

थोडा गायत्री के बारे में जान लेते है

की यह ब्रह्मांडीय उर्जा को गायत्री का नाम क्यों दिया गया है
नाम में अर्थ को खोजो
भाषा में प्रयोजन को
और लय में उर्जा को खोजो

गायत्री को समजने हेतु खुद की समझ को एक उच्च आयाम पर ले जानी होगी

जब इसका अविष्कार हुआ या उपनिषदों ने कुछ संज्ञा दी इस मन्त्र की तो यह मन्त्र के कुछ रहस्य खुले

आज के युग में उसे प्रोग्राम कहते है

गायत्री वो परब्रह्म की वाणी का इस जगत में किया हुआ प्रोग्रामिंग है

यह मनुष्य को उसको क्या करना है और वो खुद के साथ क्या कर सकता है वो समझता है

इक सामान्य मनुष्य एक देवता और देवता से परे कैसे बन सकता है
एक ब्रह्मांड को सर्जन और प्रकृति को अपने आज्ञा से कैसे साध सकता है यह गायत्री समझाती है

यह सिर्फ गायत्री का संक्षिप्त विवरण है
अब गायत्री को समझे

गायन्तं जायते इति गायत्री

जो हम गा सकते है जो वो परमात्मा भी गा रहा है

जब हमारा गान और परमात्मा के सुर का मिश्रण होता है तब गायत्री का प्रागट्य होता है

क्यूंकि अव्यक्त का व्याप्त वाणी से ही होता है और उसे सामगान यानि बोध रूपी ज्ञान कहते है

शतपथ ब्राह्मण यही केहता है

गर्या स्तत्रे तस्मात् गायत्री नाम

जो प्राणों की रक्षा करता है कितने साधक कुंडलिनी योग करते है किन्तु जब तक अथर्व का गान का स्पर्श साधक की चेतसिक सत्ता पर नहीं होता तब तक साधक में सुशुप्त पड़ा ज्ञान और विज्ञानमय शरीर प्रगट नहीं होता

वो परम पुरुष की जाग्रति हेतु गान आवश्यक है यह पुरुष और कोई नहीं तुम्हारे भीतर का आत्मन है

पर पुरुष गहरी नींद में है और ब्रह्म का बिज है जब तक अनुसन्धान गायत्री से नहीं होगा वो ब्राह्मण नहीं हो पायेगा

उपनयन या जनोई धारण कर लेने से ब्रह्म तत्व की प्राप्ति नहीं होगी
इसके चरण गायत्री मन्त्र में ही बताये गए है की ब्राह्मण को कैसे जीना है और उसका परम लक्ष्य क्या है

गातारं जायते यस्मात् गायत्री तेन गीयते

जो खुद के गान की रक्षा करती है जो अपनी वाणी की रक्षा करती है

विश्वामित्र ही क्यों?

ब्रह्मज्ञान और ब्रह्मवाणी किसी स्वार्थी को नहीं मिल सकती जो सबका मित्र है सब में समभाव परमात्मा की चेतना शक्ति को देखता है जो पुरे विश्व का मित्र है
उसे यह गान समझ आएगा जिसे गायत्री कह्ते है

गायत्री कोई मन्त्र नहीं है वो मार्ग है
भू भुव स्व: का
वामन से विराट होने का

इस हेतु से परब्रह्म अपनि वाणी की खुद ही रक्षा करते है की कोई अस्वथामा जैसा वापस दुरूपयोग न कर सके

त्रिगम गमत्री इति गायत्री

जो गान अनहत है अनहद है सायं प्रात: मध्यान का साक्षी है

जो अकर्ता है द्रष्टा है वो भेद जान सकता है की ब्रह्मांड का गान अचलित है वो गुंजन हर जगह समान है

गायत्री यही समजाती है की इश्वर सब जगह है उसको भीतर स्थिर करो और वो त्रिपदा को त्रिसंध्या अंतर्गत त्रिकुट पर स्थिर करना बताया गया है

जो आदि मध्य और अंत का भी अंत है और उसका भी साक्षी है वो परब्रह्म गायत्री के माध्यम से यह मृत्यु लोक को जीवित रखता है

जिससे सूर्य अपनी सविता शक्ति को कार्यरत रखता है
गायत्री का एक पद सृष्टि का आरम्भ है दूसरा नियमन और तीसरा प्रलय है

भुत भविष्य वर्तमान
आत्मा साक्षी और द्रष्टा
फिर भी गान को अपने भीतर स्थिर कर अपने अनेक अंशो को पोषित करने का काम परब्रह्म करता है

एक और सर्जन है और दूसरी और विसर्जन

जो पंचमुख से भी वो मापा नहीं जाता
पांच मुख पंच तत्व है और दस आयुध मानुष को धर्म में कैसे चलना है वो दिखाते है

गायत्री का ब्रह्मास्त्र एक परब्रह्म की शक्ति जितना है ऐसे अनेको ब्रह्मास्त्र एक होते है तब पारब्रह्म की सत्ता बनती है जहा करोड़ो सूर्य का तेज साधक को बूंद में मिल जाता है

यहा एक बार और स्पष्ट करुगा गायत्री कोई मन्त्र नहीं है

यह परमात्मा का आदिम विज्ञानं है जिससे वो सृष्टि का नियमन करते है और वो ही नियमन ऋषियो और वेदों ने
मनुष्य को दिया है किन्तु भौतिक साधको ने रास्ते को लक्ष्य बना दिया

रास्ता छोड़ने पर ही मंजिल मिलेगी

भौतिक वादियों ने उसे व्यापार में डाल दिया है जो सर्वथा गलत है

गाया: प्राणा त्रयान्ते रक्ष्यन्ते येन वद् गायत्री

जिसके गान मात्र से देवताओ की स्तुति हो जाती है
यह गान से ही देवताओ की उत्त्पति हुई है
अथर्वा से सब कोई उपजा है

यह साधक को गुरुदीक्षा से प्राप्त होता है
गायत्री को सम्यकता से धारण करने वाले साधक की स्तुति तो देवता स्वयं करते है

गायतो मुखाद् उदयपदिती गायत्री

परमात्मा से मुख से निकलने वाला प्रथम गीत वो गायत्री है

यह गान अभी तक चल रहा है इसके सुर मन्द्र तार और मध्य होते है मन्द्र में उत्त्पति होती है मध्यमे नियमन और तार सप्तक में लय

यह गान ही सरस्वती और संगीत की जननी है

यह गान की प्राप्ति हेतु जो यत्न करना है उसका मार्ग दिखाते हुए विश्वामित्र ने गायत्री के मन्त्र के प्रोग्राम की रचना की

और प्रोग्राम वो मन्त्र है उसका आयुध मनुष्य तन है और उसकी विद्युत शक्ति गान है

02/06/2024
👉 पूज्यगुरुदेव का आश्वासन एवं अनुरोध :- 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹         यह निश्चित है कि शरीर के बिना भी बहुत कुछ करते बन पड़ेगा.....
02/06/2024

👉 पूज्यगुरुदेव का आश्वासन एवं अनुरोध :-
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

यह निश्चित है कि शरीर के बिना भी बहुत कुछ
करते बन पड़ेगा................
जीवित रहने की अपेक्षा शरीर के न रहने पर समर्थता एवं सक्रियता और भी अधिक बढ़ जाती है। इसी मान्यता के आधार पर प्रज्ञा परिजनों से विशेष रूप से कहा जा सकता है कि ऑंखों से न दीख पड़ने पर तनिक भी उदास न हों और निरन्तर यह अनुभव करें कि हम उन्हें अधिक प्यार, अधिक उत्कर्ष और अधिक समर्थ सहयोग दे सकने की स्थिति में तब भी होंगे, जब यह पंच भौतिक शरीर मिट्टी में मिल जायेगा। जो पुकारेगा जो खोजेगा उसे हम सामने ही खड़े और समर्थ सहयोग करते दीख पड़ेगें।

-- युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य
महाप्रयाण दिवस( २जून १९९० )
पूज्य सदगुरुदेव के श्री चरणों में शत - शत
नमन व श्रद्धा सुमन समर्पित ।
विचार क्रांति अभियान awgp sot
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12/05/2023
🌷 तीन दुख और उनका कारण🌷ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।🌷पिछले पृष्ठों में बता...
05/05/2023

🌷 तीन दुख और उनका कारण🌷

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

🌷पिछले पृष्ठों में बताया जा चुका है कि आकस्मिक सुख-दुःख हर व्यक्ति के जीवन में आया करते हैं। इनसे सुर-मुनि, देव-दानव कोई नहीं बचता। भगवान राम तक इस कर्म-गति से छूट न सके। सूरदास ने ठीक कहा है-

कर्मगति टारे नाहि टरे।

गुरु वशिष्ट पण्डित बड़ ज्ञानी, रचि पचि लगन धरै ।

पिता मरण और हरण सिया को, वन में विपति परै।।

वशिष्ट जैसे गुरु के होते हुए भी राम कर्म गति को टाल न सके। उन्हें भी पिता का मरण, सिया का हरण एवं वन की विपत्तियाँ सहन करनी पड़ीं। यह विपत्तियाँ कहीं से अकस्मात् टूट पड़ती हैं या ईश्वर नाराज होकर दुःख-दण्ड देता है, ऐसा समझना ठीक न होगा। ‘पंचाध्यायी’ का निश्चित मत है कि सब प्रकार के दुःख अपने ही बुलाने से आते हैं। रामायण का मत भी इस सम्बन्ध में यही है-

🌸काहु न कोउ दुःख सुखकर दाता।

निज-निज कर्म भोग सब भ्राता।।

दूसरा कोई भी प्राणी या पदार्थ किसी को दुःख देने की शक्ति नहीं रखता। सब लोग अपने ही कर्मों का फल भोगते हैं और उसी भोग से रोते, चिल्लाते रहते हैं। जीव की पीछे से ऐसी कठोर व्यवस्था बँधी हुई है, जो कर्मों का फल तैयार करती रहती है। मछली पानी में तैरती है, उसकी पूँछ पानी को काटती हुई पीछे-पीछे एक रेखा-सी बनाती चलती है। साँप रेंगता जाता है और रेत पर उसकी लकीर बनती जाती है, जो काम हम करते हैं, उनके संस्कार बनते जाते हैं। बुरे कर्मों के संस्कार स्वयं बोई हुई कँटीली झाड़ी की तरह अपने लिए ही दुःखदायी बन जाते हैं।

💮अब हम तीन प्रकार के कर्म, उनके तीन प्रकार के स्वभाव एवं तीन तरह के फल की चर्चा आरम्भ करते हैं। सुख तो मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति है। सुकर्म करना स्वभाव है, इसलिए सुख प्राप्त करना भी स्वाभाविक ही है। कष्ट दुःख में होता है। दुःख से ही लोग डरते-घबराते हैं, उसी से छुटकारा पाना चाहते हैं। इसलिए दुःखों का ही विवेचन यहाँ होना उचित है। आरोग्यवर्द्धक शास्त्र और चिकित्सा-शास्त्र दो अलग-अलग शास्त्र हैं। इसी प्रकार सुख-दुःख के भी दो अलग विज्ञान हैं। सुख-वृद्धि के लिए धर्माचरण करना चाहिए जैसे कि स्वास्थ्य वृद्धि के लिए पौष्टिक पदार्थों का सेवन किया जाता है। दुःख निवृत्ति के लिए, रोग का निवारण करने के लिए उसका निदान और चिकित्सा जानने की आवश्यकता है। कर्म की गहन गति की जानकारी प्राप्त करने से दुःखों का मर्म समझ में आता है। दुःखों के कारण को छोड़ देने से सहज ही दुःखों से निवृत्ति हो जाती है। आइए, अब हम दुःखों का स्वरूप आपके सामने रखने का प्रयत्न करें।

🌺दुःख तीन प्रकार के होते हैं- (१) दैविक, (२) दैहिक, (३) भौतिक। दैविक दुःख वे कहे जाते हैं, जो मन को होते हैं, जैसे चिंता, आशंका, क्रोध, अपमान, शत्रुता, बिछोह, भय, शोक आदि। दैहिक दुःख होते हैं, जो शरीर को होते हैं, जैसे रोग, चोट, आघात, विष आदि के प्रभाव से होने वाले कष्ट। भौतिक दुःख वे होते हैं, जो अचानक अदृश्य प्रकार से आते हैं, जैसे भूकंप, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, महामारी, युद्ध आदि। इन्हीं तीन प्रकार के दुःखों की वेदना से मनुष्यों को तड़पता हुआ देखा जाता है। यह तीनों दुःख हमारे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कर्मों के फल हैं। मानसिक पापों के परिणाम से दैविक दुःख आते हैं, शारीरिक पापों के फलस्वरूप दैहिक और सामाजिक पापों के कारण भौतिक दुःख उत्पन्न होते हैं। दैविक दुःख-मानसिक कष्ट, उत्पन्न होने के कारण वे मानसिक पाप हैं, जो स्वेच्छापूर्वक तीव्र, भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं, जैसे ईर्ष्या, कृतघ्नता, छल, दंभ, घमण्ड, क्रूरता, स्वार्थपरता आदि। इन कुविचारों के कारण जो वातावरण मस्तिष्क में घुटता रहता है, उससे अंतःचेतना पर उसी प्रकार का प्रभाव पड़ता है, जिस प्रकार के धुएँ के कारण दीवार काली पड़ जाती है या तेल से भीगने पर कपड़ा गंदा हो जाता है। आत्मा स्वभावतः पवित्र है, वह अपने ऊपर इन पाप-मूलक कुविचारों, प्रभावों को जमा हुआ नहीं रहने देना चाहती, वह इस फिक्र में रहती है कि किस प्रकार इस गंदगी को साफ करूँ? पेट में हानिकारक वस्तुएँ जमा हो जाने पर पेट उसे कै या दस्त में निकाल बाहर करता है। इसी प्रकार तीव्र इच्छा से, जानबूझ कर किए गए पापों को निकाल बाहर करने के लिए आत्मा आतुर हो उठती है। हम उसे जरा भी जान नहीं पाते, किंतु आत्मा भीतर ही भीतर उसके भार को हटाने के लिए अत्यंत व्याकुल हो जाती है। बाहरी मन, स्थूल बुद्धि को अदृष्य प्रक्रिया का कुछ भी पता नहीं लगता, पर अंर्तमन चुपके ही चुपके ऐसे अवसर एकत्रित करने में लगा रहता है, जिससे वह भार हट जाय। अपमान, असफलता, विछोह, शोक, दुःख आदि यदि प्राप्त होते हों, ऐसे अवसरों को मनुष्य कहीं से एक न एक दिन, किसी प्रकार खींच लाता है, ताकि उन दुर्भावनाओं का, पाप संस्कारों का इन अप्रिय परिस्थितियों में समाधान हो जाय।

🟡शरीर द्वारा किए हुए चोरी, डकैती, व्यभिचार, अपहरण, हिंसा, आदि में मन ही प्रमुख है। हत्या करने में हाथ का कोई स्वार्थ नहीं है वरन् मन के आवेश की पूर्ति है, इसलिए इस प्रकार के कार्य, जिनके करते समय इंद्रियों को सुख न पहुँचता हो, मानसिक पाप कहलाते हैं। ऐसे पापों का फल मानसिक दुःख होता है। स्त्री-पुत्र आदि प्रियजनों की मृत्यु, धन-नाश, लोक निंदा, अपमान, पराजय, असफलता, दरिद्रता आदि मानसिक दुःख हैं, उनसे मनुष्य की मानसिक वेदना

⚫उमड़ पड़ती है, शोक संताप उत्पन्न होता है, दुःखी होकर रोता-चिल्लाता है, आँसू बहाता है, सिर धुनता है। इससे वैराग्य के भाव उत्पन्न होते हैं और भविष्य में अधर्म न करने एवं धर्म में प्रवृत्त रहने की प्रवृत्ति बढ़ती है। देखा गया है कि मरघट में स्वजनों की चिता रचते हुए ऐसे भाव उत्पन्न होते हैं कि जीवन का सदुपयोग करना चाहिए। धन नाश होने पर मनुष्य भगवान को पुकारता है। पराजित और असफल व्यक्ति का घमण्ड चूर हो जाता है। नशा उतर जाने पर वह होश की बात करता है, मानसिक दुःखों का एकमात्र उद्देश्य मन में जमे हुए ईर्ष्या, कृतघ्नता, स्वार्थपरता, क्रूरता, निर्दयता, छल, दम्भ, घमण्ड की सफाई करना होता है। दुःख इसलिए आते हैं कि आत्मा के ऊपर जमा हुआ प्रारब्ध कर्मों का पाप संस्कार निकल जाय। पीड़ा और वेदना की धारा उन पूर्व कृत्य प्रारब्ध कर्मों के निकृष्ट संस्कारों को धोने के लिए प्रकट होती है।

🟤दैविक-मानसिक कष्टों का कारण समझ लेने के उपरांत अब दैहिक-शारीरिक कष्टों का कारण समझना चाहिए। जन्मजात अपूर्णता एवं पैतृक रोगों का कारण पूर्व जन्म में उन अंगों का दुरुपयोग करना है। मरने के बाद सूक्ष्म शरीर रह जाता है। नवीन शरीर की रचना इस सूक्ष्म शरीर द्वारा होती है । इस जन्म में जिस अंग का दुरुपयोग किया जा रहा है, वह अंग सूक्ष्म शरीर में अत्यंत निर्बल हो जाता है, जैसे कोई व्यक्ति अति मैथुन करता हो, तो सूक्ष्म शरीर का वह अंग निर्बल होने लगेगा, फलस्वरुप सम्भव है कि वह अगले जन्म में नपुंसक हो जाय। यह नपुंसकता केवल कठोर दण्ड नहीं है, वरन् सुधार का एक उत्तम तरीका भी है। कुछ समय तक उस अंग को विश्राम मिलने से आगे के लिए वह सचेत और सक्षम हो जाएगा। शरीर के अन्य अंगों के शारीरिक लाभ के लिए पापपूर्ण, अमर्यादित, अपव्यय करने पर आगे के जन्म में वे अंग जन्म से ही निर्बल या नष्ट प्रायः होते हैं। शरीर और मन के सम्मिलित पापों के शोधन के लिए जन्मजात रोग मिलते हैं। या बालक अंग-भंग उत्पन्न होते हैं। अंग-भंग या निर्बल होने से उस अंग को अधिक काम नहीं करना पड़ता, इसलिए सूक्ष्म शरीर का वह अंग विश्राम पाकर अगले जन्म के लिए फिर तरोताजा हो जाता है, साथ ही मानसिक दुःख मिलने से मन का पाप-भार भी धुल जाता है।

🟢मानसिक पाप भी जिस शारीरिक पाप के साथ घुलामिला होता है, वह यदि राजदण्ड, समाज दण्ड या प्रायश्चित द्वारा इस जन्म से शोधित न हुआ, तो अगले जन्म के लिए जाता है, परंतु यदि पाप केवल शारीरिक है या उसमें मानसिक पाप का मिश्रण अल्प मात्रा में है, तो उसका शोधन शीघ्र ही शारीरिक प्रकृति द्वारा हो जाता है, जैसे नशा पिया, उन्माद आया। विष खाया-मृत्यु हुई। आहार-विहार में गड़बडी हुई, बीमार पड़े। इस तरह शरीर अपने साधारण दोषों की सफाई जल्दी-जल्दी कर लेता है और इस जन्म का भुगतान इस जन्म में कर जाता है, परंतु गम्भीर शारीरिक दुर्गुण, जिनमें मानसिक जुड़ाव भी होता है, अगले जन्म में फल प्राप्त करने के लिए सूक्ष्म शरीर के साथ जाते हैं।

🟠भौतिक कष्टों का कारण हमारे सामाजिक पाप हैं। संपूर्ण मनुष्य जाति एक ही सूत्र में बँधी हुई है। विश्वव्यापी जीव तत्व एक है। आत्मा सर्वव्यापी है। जैसे एक स्थान पर यज्ञ करने से अन्य स्थानों का भी वायुमण्डल शुद्ध होता है और एक स्थान पर दुर्गंध फैलने से उसका प्रभाव अन्य स्थानों पर भी पड़ता है, इसी प्रकार एक मनुष्य के कुत्सित कर्मों के लिए दूसरा भी जिम्मेदार है। एक दुष्ट व्यक्ति अपने माता-पिता को लज्जित करता है, अपने घर व कुटुम्ब को शर्मिंदा करता है। वे इसलिए शर्मिंदा होते हैं कि उस व्यक्ति के कामों से उनका कर्तव्य भी बँधा हुआ है। अपने पुत्र, कुटुम्बी या घर वाले को सुशिक्षित, सदाचारी न बनाकर दुष्ट क्यों हो जाने दिया? इसकी आध्यात्मिक जिम्मेदारी कुटुम्बियों की भी है। कानून द्वारा अपराधी को ही सजा मिलेगी, परंतु कुटुम्बियों की आत्मा स्वयमेव ही शर्मिंदा होगी, क्योंकि उनकी गुप्त शक्ति यह स्वीकार करती है कि हम भी किसी हद तक इस मामले में अपराधी हैं। सारा समाज एक सूत्र में बँधा होने के कारण आपस में एक-दूसरे की हीनता के लिए जिम्मेदार है। पड़ौसी का घर जलता रहे और दूसरा पड़ौसी खड़ा-खड़ा तमाशा देखे, तो कुछ देर बाद उसका भी घर जल सकता है। मुहल्ले के एक घर में हैजा फैले और दूसरे लोग उसे रोकने की चिंता न करें, तो उन्हें भी हैजा का शिकार होना पड़ेगा। कोई व्यक्ति किसी की चोरी, बलात्कार, हत्या, लूट आदि होती हुई देखता रहे और सामर्थ्य होते हुए भी उसे रोकने का प्रयास न करे, तो समाज उससे घृणा करेगा एवं कानून के अनुसार वह भी दण्डनीय समझा जाएगा।

🟣ईश्वरीय नियम है हर मनुष्य स्वयं सदाचारी जीवन बिताए और दूसरों को अनीति पर न चलने देने के लिए भरसक प्रयत्न करे। यदि कोई देश या जाति अपने तुच्छ स्वार्थों में संलग्न होकर दूसरों के कुकर्मों को रोकने और सदाचार बढ़ाने का प्रयत्न नहीं करती, तो उसे भी दूसरों का पाप लगता है। उसी स्वार्थपरता के सामूहिक पाप से सामूहिक दण्ड मिलता है। भूकंप, अतिवृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी, महायुद्ध के कारण ऐसे ही सामूहिक दुष्कर्म होते हैं, जिनमें स्वार्थपरता को प्रधानता दी जाती है और परोकार की उपेक्षा की जाती है।

🔴देखा जाता है कि अन्याय करने वाले अमीरों की अपेक्षा मूक पशु की तरह जीवन बिताने वाले भोले-भाले लोगों पर दैवी प्रकोप अधिक होते हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि का कष्ट गरीब किसानों को ही अधिक सहन करना पड़ता है। इसका कारण यह है कि अन्याय करने वाले से अन्याय सहने वाला अधिक बड़ा पापी होता है। कहते हैं कि ‘‘बुजदिल जालिम का बाप होता है।’’ कायरता में यह गुण है कि वह अपने ऊपर जुल्म करने के लिए किसी न किसी को न्यौत बुलाता है। भेड़ की ऊन गड़रिया छोड़ देगा तो दूसरा कोई न कोई उसे काट लेगा। कायरता, कमजोरी, अविद्या स्वयं बड़े भारी पातक हैं। ऐसे पातकियों पर यदि भौतिक कोप अधिक हों तो कुछ आश्यर्च नहीं? संभव है उनकी कायरता को दूर करने एवं स्वाभाविक सतेजता जगाकर निष्पाप बना देने के लिए अदृश्य सत्ता द्वारा यह घटनाएँ उपस्थित होती हों। यह भौतिक दुर्घनाएँ सृष्टि के दोष नहीं हैं वरन् अपने ही दोष हैं। अग्नि में तपाकर सोने की तरह हमें शुद्ध करने के लिए यह कष्ट बार-बार कृपापूर्वक आया करते हैं और संसार को जोरदार चेतावनी देकर सामाजिक निष्पापता बढ़ाने का आदेश दिया करते हैं।

दैविक, दैहिक, भौतिक दुःखों का कुछ विवेचन ऊपर की पंक्तियों में किया जा चुका है। अब हम इसी लेखमाला के अंतर्गत यह बताएँगे कि किस प्रकार के पाप-पुण्यों का फल कितने-कितने समय में मिलता है?

📒 गहना कर्मणोगति
✍️ युग ऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य

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