28/01/2026
आदरणीय प्रधानमंत्री जी —
आइए आपको बताता हूं सामान्य वर्ग कौन है...?
जो सामने दिखे, वही “सामान्य वर्ग” है।
वह वर्ग नहीं जो पोस्टरों पर दिखता है,
वह नहीं जिसके लिए आयोग बैठते हैं,
वह नहीं जिसकी शिकायत पर जांच से पहले गिरफ़्तारी होती है —
वह वह वर्ग है,
जिसके साथ सब कुछ होते हुए भी
कुछ भी उसके लिए नहीं होता।
जिस पर एक क़ानून लिखते समय ये नहीं सोचा गया
कि आरोप झूठा भी हो सकता है,
जिसके नाम के आगे “बिना जांच” शब्द चिपका दिया गया —
वही सामान्य वर्ग है।
जिसे जातिसूचक गालियाँ दी जाएँ
तो लोकतंत्र चुप रहता है,
मगर वही अगर जवाब दे दे
तो संविधान की मोटी किताबें खुल जाती हैं —
वही सामान्य वर्ग है।
जिसे वोट देने का हक़ है,
पर सैकड़ों सीटों पर खड़े होने का नहीं,
जिसकी उँगली से सरकार बनती है
पर कुर्सी तक पहुँचने का रास्ता पहले से बंद है —
वही सामान्य वर्ग है।
जिसके नाम पर न आयोग बना,
न रिपोर्ट आई,
न “विशेष पैकेज” घोषित हुआ —
वही सामान्य वर्ग है।
जिसके बच्चों की फीस चार गुनी है
और उम्मीदें दस गुनी,
पर सहारा शून्य —
वही सामान्य वर्ग है।
जिसके साथ नौकरी में भेदभाव
कानूनी है,
प्रमोशन में भेदभाव
संवैधानिक है,
और मकान allotment में भेदभाव
नीतिगत है —
वही सामान्य वर्ग है।
जिसके लिए निगरानी संस्थान नहीं,
बल्कि दंड संस्थान बने,
जिसे न्याय के नाम पर
सबसे पहले कटघरे में खड़ा किया गया —
वही सामान्य वर्ग है।
जिसने सभाओं में फर्श बिछाई,
नारे लगाए,
तन-मन-धन से साथ दिया,
और बदले में
चुप्पी, उपेक्षा और उपदेश पाए —
वही सामान्य वर्ग है।
जो सबसे ज़्यादा वोट देकर भी
हर चुनाव के बाद
अपने ही देश में
अजनबी-सा महसूस करता है —
वही सामान्य वर्ग है।
और सबसे अजीब बात जानते हैं क्या?
इतने अपमान,
इतनी अनदेखी,
इतने भेदभाव के बावजूद
जो आज भी कहता है —
“धर्म की जय हो,
अधर्म का नाश हो,
प्राणियों में सद्भावना हो,
विश्व का कल्याण हो” —
वही सामान्य वर्ग है।
सत्ता को सवर्णों का वोट चाहिए था,
कंधे चाहिए थे,
सीढ़ी चाहिए थी।
मिल गया।
अब वही कंधे बोझ लगने लगे हैं,
अब वही सीढ़ी हटाई जा रही है,
अब वही वर्ग
“असुविधाजनक” हो गया है।
यही है “सबका साथ, सबका विकास” में
सामान्य वर्ग की स्थिति।
यह लेख किसी वर्ग के ख़िलाफ़ नहीं,
यह अनदेखे वर्ग की चीख़ है।
अगर यह आवाज़ आपको चुभी है,
तो समझिए —
लिखा सही गया है।
और अगर चुप रह गए,
तो अगली बार
आईने में देखने से पहले
सोचिएगा —
क्या आप अब भी “सामान्य” हैं? साभार – शरद जी