Gonda Junction

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14/03/2026

यूपी पुलिस एसआई भर्ती परीक्षा में हिंदी पेपर में पूछा गया एक सवाल... प्रश्न था- 'अवसर के अनुसार बदल जाने वाला कौन', जिसके विकल्पों में 'पंडित' शब्द भी दिया गया था. लगता है किसी मूर्ख ने पेपर बनाया जिसे ये तक नहीं समझ आया की वो पेपर बना रहा है या बकवास... हद है...

06/02/2026
06/02/2026

पाण्डेय जी और बाजपेयी जी मिलकर बनाये हैं घूसखोर पंडत... बाभन, बाभन कै बदनामी करिहैँ तौ यूजीसी न आयी तौ का आयी...

ये थरूर साहब के गले मे क्या है??
01/02/2026

ये थरूर साहब के गले मे क्या है??

28/01/2026

बहुत ही प्रेम से माननीय नेता जी ने जन मानस की बात की है l जो की समाज की वास्तविकता हैं जिसमे हम जी रहे हैं पर कुछ लोगों ने समाज में कड़वाहट घोलने की खातिर ऐसे कदम उठा लिए जो की केवल एक ही वर्ग को टारगेट कर रहा है l मानो उसके साथ कुछ गलत हो ही नहीं सकता...

28/01/2026

आदरणीय प्रधानमंत्री जी —
आइए आपको बताता हूं सामान्य वर्ग कौन है...?

जो सामने दिखे, वही “सामान्य वर्ग” है।
वह वर्ग नहीं जो पोस्टरों पर दिखता है,
वह नहीं जिसके लिए आयोग बैठते हैं,
वह नहीं जिसकी शिकायत पर जांच से पहले गिरफ़्तारी होती है —
वह वह वर्ग है,
जिसके साथ सब कुछ होते हुए भी
कुछ भी उसके लिए नहीं होता।

जिस पर एक क़ानून लिखते समय ये नहीं सोचा गया
कि आरोप झूठा भी हो सकता है,
जिसके नाम के आगे “बिना जांच” शब्द चिपका दिया गया —
वही सामान्य वर्ग है।

जिसे जातिसूचक गालियाँ दी जाएँ
तो लोकतंत्र चुप रहता है,
मगर वही अगर जवाब दे दे
तो संविधान की मोटी किताबें खुल जाती हैं —
वही सामान्य वर्ग है।

जिसे वोट देने का हक़ है,
पर सैकड़ों सीटों पर खड़े होने का नहीं,
जिसकी उँगली से सरकार बनती है
पर कुर्सी तक पहुँचने का रास्ता पहले से बंद है —
वही सामान्य वर्ग है।

जिसके नाम पर न आयोग बना,
न रिपोर्ट आई,
न “विशेष पैकेज” घोषित हुआ —
वही सामान्य वर्ग है।

जिसके बच्चों की फीस चार गुनी है
और उम्मीदें दस गुनी,
पर सहारा शून्य —
वही सामान्य वर्ग है।

जिसके साथ नौकरी में भेदभाव
कानूनी है,
प्रमोशन में भेदभाव
संवैधानिक है,
और मकान allotment में भेदभाव
नीतिगत है —
वही सामान्य वर्ग है।

जिसके लिए निगरानी संस्थान नहीं,
बल्कि दंड संस्थान बने,
जिसे न्याय के नाम पर
सबसे पहले कटघरे में खड़ा किया गया —
वही सामान्य वर्ग है।

जिसने सभाओं में फर्श बिछाई,
नारे लगाए,
तन-मन-धन से साथ दिया,
और बदले में
चुप्पी, उपेक्षा और उपदेश पाए —
वही सामान्य वर्ग है।

जो सबसे ज़्यादा वोट देकर भी
हर चुनाव के बाद
अपने ही देश में
अजनबी-सा महसूस करता है —
वही सामान्य वर्ग है।

और सबसे अजीब बात जानते हैं क्या?
इतने अपमान,
इतनी अनदेखी,
इतने भेदभाव के बावजूद
जो आज भी कहता है —
“धर्म की जय हो,
अधर्म का नाश हो,
प्राणियों में सद्भावना हो,
विश्व का कल्याण हो” —
वही सामान्य वर्ग है।

सत्ता को सवर्णों का वोट चाहिए था,
कंधे चाहिए थे,
सीढ़ी चाहिए थी।
मिल गया।
अब वही कंधे बोझ लगने लगे हैं,
अब वही सीढ़ी हटाई जा रही है,
अब वही वर्ग
“असुविधाजनक” हो गया है।
यही है “सबका साथ, सबका विकास” में
सामान्य वर्ग की स्थिति।

यह लेख किसी वर्ग के ख़िलाफ़ नहीं,
यह अनदेखे वर्ग की चीख़ है।
अगर यह आवाज़ आपको चुभी है,
तो समझिए —
लिखा सही गया है।
और अगर चुप रह गए,
तो अगली बार
आईने में देखने से पहले
सोचिएगा —
क्या आप अब भी “सामान्य” हैं? साभार – शरद जी

 #दिलचस्प लखनऊ में जब पहली बार म्युनिसिपैलिटी के चुनाव हुए,तो चौक से अपने ज़माने की मशहूर तवायफ़, महफ़िलों की रौनक और नज...
28/01/2026

#दिलचस्प

लखनऊ में जब पहली बार म्युनिसिपैलिटी के चुनाव हुए,

तो चौक से अपने ज़माने की मशहूर तवायफ़, महफ़िलों की रौनक और नज़ाकत की मिसाल — दिलरुबा जान — उम्मीदवार बनीं। उनके रुतबे और लोकप्रियता का ऐसा असर था कि कोई भी उनके मुक़ाबिल खड़ा होने को तैयार न हुआ।

उन्हीं दिनों चौक में एक नाम बड़े अदब से लिया जाता था — हकीम शम्शुद्दीन साहेब। दवाख़ाना भी था, शोहरत भी, और मरीज़ों की भीड़ भी। दोस्तों ने ज़ोर-ज़बरदस्ती उन्हें दिलरुबा जान के मुक़ाबिल मैदान-ए-इंतिख़ाब में उतार दिया।

दिलरुबा जान का प्रचार शबाब पर था। चौक में हर शाम महफ़िलें सजतीं, मशहूर नर्तकियाँ बुलायी जातीं, और हुजूम उमड़ पड़ता। उधर हकीम साहेब के साथ बस वही गिने-चुने दोस्त थे, जिन्होंने उन्हें इस आज़माइश में धकेला था।

हकीम साहेब खिन्न होकर बोले, “तुम लोगों ने तो मुझे पिटवा ही दिया, हार अब मुक़द्दर है।”

दोस्तों ने हिम्मत न हारी और एक नारा गढ़ा —

“है हिदायत चौक के हर वोटर-ए-शौक़ीन को, दिल दीजिए दिलरुबा को, वोट शम्शुद्दीन को!”

जवाब में दिलरुबा जान ने अपनी नज़ाकत से तराशा हुआ नारा दिया —

“है हिदायत चौक के हर वोटर-ए-शौक़ीन को, वोट दीजिए दिलरुबा को, नब्ज़ शम्शुद्दीन को!”

नतीजा वही हुआ जो लखनवी ज़ेहनियत से मेल खाता था। हकीम साहेब का नारा दिलों में उतर गया और वो चुनाव जीत गए।

लखनऊ की तहज़ीब देखिए कि दिलरुबा जान ख़ुद हकीम साहेब के घर तशरीफ़ लाईं, मुबारकबाद पेश की और मुस्कुराकर बोलीं —

“मैं इंतिख़ाब हार गई और आप जीते, मुझे इसका कोई मलाल नहीं। मगर आपकी जीत ने एक हक़ीक़त साबित कर दी है

‘लखनऊ में मर्द कम हैं, मरीज़ ज़्यादा'

(साभार अज्ञात)

विनम्र प्रस्तुति...

#टीम_पी_बी_सी_क्रिएशन_भारत

27/01/2026

“चाहे तिल लो या ताड़ लो राजा,
राई लो या पहाड़ लो राजा,
मैं अभागा ‘सवर्ण’ हूँ मेरा,
रौंया-रौंया उखाड़ लो राजा ..।”😢🙏
(स्व० रमेश रंजन मिश्र)

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