ब्रह्मवैवर्त पुराण Brahmvaivart Puran

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ब्रह्मवैवर्त पुराण Brahmvaivart Puran ब्रह्मवैवर्त पुराण परम दुर्लभ है।
यह

इसमें नये-नये अत्यंत गोपनीय रमणीय रहस्य भरे पड़े हैं।

यह हरिभक्तिप्रद, दुर्लभ हरिदास्य का दाता, सुखद, ब्रह्म की प्राप्ति करने वाला साररूप और शोक संताप का नाशक है।

जैसे सरिताओं में शुभकारिणी गंगा तत्क्षण ही मुक्ति प्रदान करने वाली हैं,

तीर्थों में पुष्कर और

पुरियों में काशी जैसे शुद्ध है,

सभी वर्षों में जैसे भारत वर्ष शुभ और तत्काल मुक्तिप्रद है,

जैसे पर्वतों में सुमेरु,

पुष्पों में प

ारिजात-पुष्प,

पत्रों में तुलसी पत्र,

व्रतों में एकादशीव्रत,

वृक्षों में कल्पवृक्ष,

देवताओं में श्रीकृष्ण,

ज्ञानि शिरोमणियों में महादेव,

योगीन्द्रों में गणेश्वर,

सिद्धेन्द्रों में एकमात्र कपिल,

तेजस्वियों में सूर्य,

वैष्णवों में अग्रगण्य भगवान सनत्कुमार,

राजाओं में श्रीराम,

धनुर्धारियों में लक्ष्मण,

देवियों में महापुण्यवती सती दुर्गा,

श्रीकृष्ण की प्रेयसियों में प्राणाधिका राधा,

ईश्वरियों में लक्ष्मी तथा

पण्डितों में सरस्वती सर्वश्रेष्ठ हैं;

उसी प्रकार सभी पुराणों में ब्रह्मवैवर्त श्रेष्ठ है।

इससे विशिष्ट, सुखद, मधुर, उत्तम पुण्य का दाता और संदेहनाशक दूसरा कोई पुराण नहीं है।

यह इस लोक में सुखद, संपूर्ण संपत्तियों का उत्तम दाता, शुभद, पुण्यद, विग्नविनाशक और उत्तम हरि-दास्य प्रदान करने वाला है तथा परलोक में प्रभूत आनन्द देने वाला है।

संपूर्ण यज्ञों, तीर्थों, व्रतों और तपस्याओं का तथा समूची पृथ्वी की प्रदक्षिणा का भी फल इसके फल की समता में नगण्य है।

चारों वेदों के पाठ से भी इसका फल श्रेष्ठ है।

जो संयत चित्त होकर इस पुराण को श्रवण करता है; उसे गुणवान विद्वान वैष्णव पुत्र प्राप्त होता है।यदि कोई दुर्भगा नारी इसे सुनती है तो उसे पति के सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

इस पुराण के श्रवण से मृतवत्सा, काकवन्ध्या आदि पापिनी स्त्रियों को भी चिरजीवी पुत्र सुलभ हो जाता है।

अपुत्र को पुत्र, भार्यारहित को पत्नी और कीर्तिहीन को उत्तम यश मिल जाता है।

मूर्ख पण्डित हो जाता है।

रोगी रोग से बँधा हुआ बन्धन से, भयभीत भय से और आपत्तिग्रस्त आपत्ति से मुक्त हो जाता है।

अरण्य में, निर्जन मार्ग में अथवा दावाग्नि में फँसकर भयभीत हुआ मनुष्य इसके श्रवण से निश्चय ही उस भय से छूट जाता है।

इसके श्रवण से पुण्यवान पुरुष पर कुष्ठरोग, दरिद्रता, व्याधि और दारुण शोक का प्रभाव नहीं पड़ता। ये सभी पुण्यहीनों पर ही प्रभाव डालते हैं।

जो मनुष्य अत्यंत दत्तचित्त हो इसका आधा श्लोक अथवा चौधाई श्लोक सुनता है, उसे बहुसंख्यक गोदान का पुण्य प्राप्त होता है- इसमें संशय नहीं है।

जो मनुष्य शुद्ध समय में जितेंद्रिय होकर संकल्प पूर्वक वक्ता को दक्षिणा देकर भक्ति-भावसहित इस चार खण्डों वाले पुराण को सुनता है, वह अपने असंख्य जन्मों के बचपन, कौमार, युवा और वृद्धावस्था के संचित पाप से निःसंदेह मुक्त हो जाता है तथा श्रीकृष्ण का रूप धारण करके रत्ननिर्मित विमान द्वारा अविनाशी गोलोक में जा पहुँचता है। वहाँ उसे श्रीकृष्ण की दासता प्राप्त हो जाती है, यह ध्रुव है। असंख्य ब्रह्माओं का विनाश होने पर भी उसका पतन नहीं होता। वह श्रीकृष्ण के समीप पार्षद होकर चिरकाल तक उनकी सेवा करता है।

जो श्रीकृष्ण की भक्ति से युक्त हो इस पुराण को सुनता है, वह श्रीहरि की भक्ति और पुण्य का भागी होता है तथा उसके पूर्वजन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं।

इसमें सम्पूर्ण धर्मों का निरूपण है। यह पुराण सब लोगों को अत्यन्त प्रिय है तथा सबकी समस्त आशाओं को पूर्ण करने वाला है।
यह सम्पूर्ण अभीष्ट पदों को देने वाला है। पुराणों में सारभूत है। इसकी तुलना वेद से की गयी है।

ब्रह्म वैवर्त पुराण ब्रह्मखण्ड : अध्याय 12ब्रह्मा जी की अपूज्यता का कारण, गन्धर्वराज की तपस्या से संतुष्ट हुए भगवान शंकर...
11/02/2026

ब्रह्म वैवर्त पुराण ब्रह्मखण्ड : अध्याय 12
ब्रह्मा जी की अपूज्यता का कारण, गन्धर्वराज की तपस्या से संतुष्ट हुए भगवान शंकर का उन्हें अभीष्ट वर देना तथा नारद जी का उनके पुत्र रूप से उत्पन्न हो उपबर्हण नाम से प्रसिद्ध होना

#नारद
#ब्रह्मा

तदनन्तर शौनक जी के पूछने पर सौति ने कहा– ब्रह्मन! हंस, यति, अरणि, वोढु, पंचशिख, अपान्तरतमा तथा सनक आदि– इन सबको छोड़कर अन्य सभी ब्रह्मकुमार, जिनकी संख्या बहुत अधिक थी, सदा सांसारिक कार्यों में संलग्न हो प्रजा की सृष्टि करके गुरुजनों (पिता आदि) की आज्ञा का पालन करने लगे। स्वयं प्रजापति ब्रह्मा अपने पुत्र नारद के शाप से अपूज्य हो गये। इसीलिये विद्वान पुरुष ब्रह्मा जी के मन्त्र की उपासना नहीं करते। नारद जी अपने पिता की शाप से उपबर्हण नामक गन्धर्व हो गये। उनके वृत्तान्त का विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ; सुनिये।

इन दिनों जो गन्धर्वराज थे, वे सब गन्धर्वों में श्रेष्ठ और महान थे, उच्चकोटि के ऐश्वर्य से सम्पन्न थे, परंतु किसी कर्मवश पुत्र-सुख से वंचित थे। एक समय गुरु की आज्ञा लेकर वे पुष्कर तीर्थ में गये और वहाँ उत्तम समाधि लगाकर (अथवा अत्यन्त एकाग्रतापूर्वक) भगवान शिव की प्रसन्नता के लिये तप करने लगे। उस समय उनके मन में बड़ी दीनता थी, वे दयनीय हो रहे थे। कृपानिधान वसिष्ठ मुनि ने गन्धर्वराज को शिव के कवच, स्तोत्र तथा द्वादशाक्षर-मन्त्र का उपदेश दिया। दीर्घकाल तक निराहार रहकर उपासना एवं जप-तप करने पर भगवान शिव ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिये। नित्य तेजःस्वरूप सनातन भगवान शिव ब्रह्मतेज से जाज्वल्यमान हो दसों दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे। उनके प्रसन्न मुख पर मन्द हास्य की छटा छा रही थी।

भक्तों पर अनुग्रह करने वाले वे भगवान तपोरूप हैं, तपस्या के बीज हैं, तप का फल देने वाले हैं और स्वयं ही तपस्या के फल हैं। शरण में आये हुए भक्त को वे समस्त सम्पत्तियाँ प्रदान करते हैं। उस समय वे दिगम्बर-वेष में वृषभ पर आरूढ थे, उन्होंने हाथों में त्रिशूल और पट्टिश ले रखे थे। उनकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिक के समान निर्मल थी। उनके तीन नेत्र थे और उन्होंने मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट धारण कर रखा था। उनका जटाजूट तपाये हुए सुवर्ण की प्रभा को छीने लेता था। कण्ठ में नील चिह्न और कंधे पर नाग का यज्ञोपवीत शोभा दे रहा था। सर्वज्ञ शिव सबके संहारक हैं। वे ही काल और मृत्युंजय हैं। वे परमेश्वर ग्रीष्म-ऋतु की दोपहरी के करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी थे। शान्तस्वरूप शिव तत्त्व ज्ञान, मोक्ष तथा हरिभक्ति प्रदान करने वाले हैं।

उन्हें देखते ही गन्धर्व ने सहसा दण्ड की भाँति पृथ्वी पर पड़कर प्रणाम किया और वसिष्ठ जी के दिये हुए स्तोत्र से उन परमेश्वर का स्तवन किया। तब कृपानिधान शिव उससे बोले– ‘गन्धर्वराज! तुम कोई वर माँगो।’ तब गन्धर्व ने उनसे भगवान श्रीहरि की भक्ति तथा परम वैष्णव पुत्र की प्राप्ति का वर माँगा। गन्धर्व की बात सुनकर दीनों के स्वामी दीनबन्धु सनातन भगवान चन्द्रशेखर हँसे और उस दीन सेवक से बोले।

श्री महादेव जी ने कहा – गन्धर्वराज! तुमने जो एक वर (हरिभक्ति) को माँगा है, उसी से तुम कृतार्थ होओगे। दूसरा वर तो चबाये हुए को चबाना मात्र है। वत्स! जिसकी श्रीहरि में सुदृढ़ एवं सर्वमंगलमयी भक्ति है, वह खेल-खेल में ही सब कुछ करने में समर्थ है। भगवद्भक्त पुरुष अपने कुल की और नाना के कुल की असंख्य पीढ़ियों का उद्धार करके निश्चय ही गोलोक में जाता है। करोड़ों जन्मों में उपार्जित त्रिविध पापों का नाश करके वह अवश्य ही पुण्यभोग तथा श्रीहरि की सेवा का सौभाग्य पाता है। मनुष्यों को तभी तक पत्नी की इच्छा होती है, तभी तक पुत्र प्यारा लगता है, तभी तक ऐश्वर्य की प्राप्ति अभीष्ट होती है और तभी तक सुख-दुःख होते हैं, जब तक कि उनका मन श्रीकृष्ण में नहीं लगता।

श्रीकृष्ण में मन लगते ही भक्तिरूपी दुर्लङ्घ्य खड्ग मानवों के कर्ममय वक्षों का मूलोच्छेद कर डालता है। जिन पुण्यात्माओं के पुत्र परम वैष्णव होते हैं, उनके वे पुत्र लीलापूर्वक कुल की बहुसंख्यक पीढ़ियों का उद्धार कर देते हैं। अहो! एक वर से ही कृतार्थ हुआ पुरुष यदि दूसरा वर चाहता है तो मुझे आश्चर्य होता है। दूसरे वर की क्या आवश्यकता है? लोगों को मंगल की प्राप्ति से तृप्ति नहीं होती है। हमारे पास वैष्णवों के लिये परम दुर्लभ धन संचित है। श्रीकृष्ण की भक्ति एवं दास्य-सुख हम लोग दूसरों को देने के लिये उत्सुक नहीं होते। वत्स! जो तुम्हारे मन में अभीष्ट हो, ऐसा कोई दूसरा वर माँगो अथवा इन्द्रत्व, अमरत्व या दुर्लभ ब्रह्मपद प्राप्त करो। मैं तुम्हें सम्पूर्ण सिद्धियाँ, महान योग और मृत्युंजय आदि ज्ञान यह सब कुछ सुखपूर्वक दे दूँगा, किंतु यहाँ श्रीहरि का दासत्त्व माँगने का आग्रह छोड़ दो, क्षमा करो।

भगवान शंकर की यह बात सुनकर गन्धर्व के कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये। वह अत्यन्त दीनभाव से सम्पूर्ण सम्पत्तियों के दाता दीनेश्वर शिव से बोला।

गन्धर्व ने कहा– प्रभो! जिसका ब्रह्मा जी की दृष्टि पड़ते ही पतन हो जाता है, वह ब्रह्मपद स्वप्न के समान मिथ्या एवं क्षणभंगुर है। श्रीकृष्ण भक्त उसे नहीं पाना चाहता। शिव! इन्द्रत्व, अमरत्व, सिद्धियोग आदि अथवा मृत्युंजय आदि ज्ञान की प्राप्ति भी श्रीकृष्ण भक्त को अभीष्ट नहीं है। श्रीहरि के सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य और सायुज्य को तथा निर्वाण मोक्ष को भी वैष्णवजन नहीं लेना चाहते।[1] भगवान की अविचल भक्ति तथा उनका परम दुर्लभ दास्य प्राप्त हो– यही सोते, जागते हर समय भक्तों की इच्छा रहती है। अतः यही हमारे लिये श्रेष्ठ वर है।

प्रभो! आप याचकों के लिये कल्पवृक्ष हैं; अतः मुझे वर के रूप में श्रीहरि का दास्य-सुख तथा वैष्णव पुत्र प्रदान कीजिये। आपको संतुष्ट पाकर जो दूसरा कोई वर माँगता है, वह बर्बर है। शम्भो! यदि आप मुझे दुष्कर्मी मानकर यह उपर्युक्त वर नहीं देंगे तो मैं अपना मस्तक काटकर अग्नि में होम दूँगा।

गन्धर्व की यह बात सुनकर भक्तों के स्वामी तथा भक्त पर अनुग्रह करने वाले कृपानिधान भगवान शंकर उस दीन भक्त से इस प्रकार बोले।

भगवान शंकर ने कहा– गन्धर्वराज! भगवान विष्णु की भक्ति, उनके दास्य-सुख तथा परम वैष्णव पुत्र की प्राप्ति– इस श्रेष्ठ वर को उपलब्ध करो, खिन्न न होओ। तुम्हारा पुत्र वैष्णव होने के साथ दीर्घायु, सद्गुणशाली, नित्य सुस्थिर यौवन से सम्पन्न, ज्ञानी, परम सुन्दर, गुरुभक्त तथा जितेन्द्रिय होगा।

मुने! ऐसा कहकर भगवान शंकर वहाँ से अपने धाम को चले गये और गन्धर्वराज संतुष्ट होकर अपने घर को लौटे। अपने कर्म से सफलता प्राप्त होने पर सभी मानवों के मानस-पंकज खिल उठते हैं। उस गन्धर्वराज की पत्नी के गर्भ से भारतवर्ष में नारद जी ने ही जन्म लिया। उस वृद्धा गन्धर्व पत्नी ने गन्धमादन पर्वत पर अपने पुत्र का प्रसव किया था। उस समय गुरुदेव भगवान वसिष्ठ ने यथोचित रीति से बालक का नामकरण संस्कार किया। उस बालक का वह मंगलमय संस्कार मंगल के दिन सम्पन्न हुआ। ‘उप’ शब्द अधिक अर्थ का बोधक है और पुल्लिंग ‘बर्हण’ शब्द पूज्य-अर्थ में प्रयुक्त होता है। यह बालक पूज्य पुरुषों में सबसे अधिक है; इसलिये इसका नाम ‘उपबर्हण’ होगा– ऐसा वसिष्ठ जी ने कहा।

31/01/2026

सदा possess PURE बुद्धि, God will ALWAYS रक्षा them | कवच | Amulet | Shield | भय | Fear | श्रीकृष्ण


#कवच


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श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण
श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी
श्रीकृष्ण शरणं मम
श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे

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इस कवच के प्रभाव से कभी मन में भय नहीं होता है। जो इस उत्तम कवच को सोने के यन्त्र में मढ़ाकर कण्ठ या दाहिनी बाँह में बाँधता है, उसकी बुद्धि सदा शुद्ध रहती है तथा उसे विष, अग्नि, सर्प और शत्रुओं से कभी भय नहीं होता। जल, थल और अन्तरिक्ष में तथा निद्रावस्था में भगवान् सदा उसकी रक्षा करते हैं । ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखण्ड-अध्याय 12 श्रीकृष्ण-कवच का प्रयोग एवं माहात्म्य

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Brahma Vaivarta Purana, Shri Krishna Janma Khanda, Chapter 12, The Use and Glory of the Shri Krishna AMULET, Kavach

ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखण्ड-अध्याय 14यशोदा के यमुनास्नान के लिये जाने पर श्रीकृष्ण द्वारा दही-दूध-माखन आदि का भक...
31/01/2026

ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखण्ड-अध्याय 14
यशोदा के यमुनास्नान के लिये जाने पर श्रीकृष्ण द्वारा दही-दूध-माखन आदि का भक्षण तथा बर्तनों को फोड़ना, यशोदा का उन्हें पकड़कर वृक्ष से बाँधना, वृक्ष का गिरना, गोप-गोपियों तथा नन्दजी का यशोदा को उपालम्भ देना, नल- कूबर और रम्भा को शाप प्राप्त होने तथा उससे मुक्त होने की कथा

#श्रीकृष्ण
#यशोदा

भगवान् नारायण कहते हैं — नारद! एक दिन नन्दरानी यशोदा स्नान करने के लिये यमुनातट पर गयीं। इधर मधुसूदन श्रीकृष्ण दही-माखन आदि से भरे-पूरे घर को देखकर बड़े प्रसन्न हुए । घर में जो दही, दूध, घी, तक्र और मनोहर मक्खन रखा हुआ था, वह सब आप भोग लगा गये । छकड़े पर जो मधु, मक्खन और स्वस्तिक ( मिष्टान्नविशेष) लदा था, उसे भी खा-पीकर आप कपड़ों से मुँह पोंछने की तैयारी कर रहे थे। इतने में ही गोपी यशोदा नहाकर अपने घर लौट आयीं । उन्होंने बालकृष्ण को देखा ।

घर में दही, दूध आदिके जितने मटके थे, वे सब फूटे और खाली दिखायी दिये । मधु आदि के जो बर्तन थे, वे भी एकदम खाली हो गये थे । यह सब देखकर यशोदा मैया ने बालकों से पूछा – ‘अरे! यह तो बड़ा अद्भुत कर्म है। बच्चो ! तुम सच सच बताओ, किसने यह अत्यन्त दारुण कर्म किया है ?’ यशोदा की बात सुनकर सब बालक एक साथ बोल उठे – ‘मैया ! हम सच कहते हैं, तुम्हारा लाला ही सब खा गया, हम लोगों को तनिक भी नहीं दिया है।’

बालकों का यह वचन सुनकर नन्दरानी कुपित हो उठीं और लाल-लाल आँखें किये बेंत लेकर दौड़ीं। इधर गोविन्द भाग निकले। मैया उन्हें पकड़ न सकीं। भला, जो शिव आदि के ध्यान में भी नहीं आते, योगियों के लिये भी जिन्हें पकड़ पाना अत्यन्त कठिन है; उन्हें यशोदाजी कैसे पकड़ पातीं ? यशोदाजी पीछा करके थक गयीं। शरीर पसीने से लथपथ हो गया। वे मन में ही क्रोध भरकर खड़ी हो गयीं । उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे । माता को यों थकी हुई देख कृपालु पुरुषोत्तम जगदीश्वर श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए उनके सामने खड़े हो गये। नन्दरानी उनका हाथ पकड़कर अपने घर ले आयीं। उन्होंने मधुसूदन को वस्त्र से वृक्ष में बाँध दिया। श्रीकृष्ण को बाँधकर यशोदा अपने घर में चली गयीं तथा जगत्पति परमेश्वर श्रीहरि वृक्ष की जड़ के पास खड़े रहे ।

नारद! श्रीकृष्ण के स्पर्शमात्र से वह पर्वताकार वृक्ष सहसा भयानक शब्द करके वहाँ गिर पड़ा। उस वृक्ष से सुन्दर वेषधारी एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। वह रत्नमय अलंकारों से विभूषित, गौरवर्ण तथा किशोर अवस्था का था। सुवर्णमय शृङ्गार से विभूषित जगदीश्वर श्रीकृष्ण को प्रणाम करके वह दिव्य पुरुष मुस्कराता हुआ दिव्य रथ पर आरूढ़ हुआ और अपने घर को चला गया । वृक्ष को गिरते देख व्रजेश्वरी यशोदा भय से त्रस्त हो उठीं । उन्होंने रोते हुए बालक श्यामसुन्दर को उठाकर छाती से लगा लिया। इतने में ही गोकुल के गोप और गोपियाँ उनके घर में आ पहुँचीं । वे सब-की-सब यशोदा को फटकारने लगीं। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक शिशु की रक्षा के लिये शान्तिकर्म किया ।

सब गोपियाँ यशोदा से कहने लगी — नन्दरानी ! अत्यन्त वृद्धावस्था में तुम्हें यह पुत्र प्राप्त हुआ है। संसार में जो भी धन, धान्य तथा रत्न है, वह सब पुत्र के लिये ही है । आज हमने सचमुच यह जान लिया कि तुम्हारे भीतर सुबुद्धि नहीं है । जो खाद्यपदार्थ पुत्र ने नहीं खाया, वह सब इस भूतल पर निष्फल ही है। ओ निष्ठुरे ! तुमने दही-दूध के लिये अपने लाला को वृक्ष की जड़ में बाँध दिया और स्वयं घर के काम-काज में लग गयीं । दैववश वृक्ष गिर पड़ा; किंतु हम गोपियों के सौभाग्य से वृक्ष के गिरने पर भी बालक जीवित बच गया । अरी मूढ़े ! यदि बालक नष्ट हो जाता तो इन वस्तुओं का क्या प्रयोजन था ?

श्रीनन्दजी ने भी यशोदाको उलाहना दिया । ब्राह्मणों और बन्दीजनों ने बालक को शुभ आशीर्वाद दिये । सबने मिलकर ब्राह्मणों से श्रीहरि का नाम-कीर्तन करवाया ।

नारदजी ने पूछा — भगवन् ! वह सुन्दर वेषधारी पुरुष कौन था, जो गोकुल में वृक्ष होकर रहता था? किस कारण से उसे वृक्ष होना पड़ा था ?

भगवान् नारायण बोले — एक बार कुबेरपुत्र नलकूबर अप्सरा रम्भा के साथ नन्दनवन में चला गया। वहाँ उसने भाँति-भाँति विहार किये। इसी समय महर्षि देवल उधर से निकले। उनकी दृष्टि नलकूबर और रम्भा पर पड़ गयी। इधर मुनि को देखकर भी नलकूबर – रम्भा ने उठकर उनका सम्मान नहीं किया। मुनिवर देवल उन दोनों की ऐसी दुर्वृत्ति देखकर कुपित हो गये और उन्हें शाप देते हुए बोले- ‘ नलकूबर ! तुम गोकुल में जाकर वृक्षरूप धारण करो। फिर श्रीकृष्ण का स्पर्श पाने पर अपने भवन में लौट आओगे और रम्भा ! तुम भी मनुष्ययोनि में जन्म लेकर राजा जनमेजय की सौभाग्यशालिनी पत्नी बनो । अश्वमेधयज्ञ में इन्द्र का स्पर्श पाकर तुम पुनः स्वर्ग में चली जाओगी।’

वह नलकूबर ही यह वृक्ष बना और रम्भा ने भारत में राजा सुचन्द्र की कन्यारूप से जन्म लेकर जनमेजय की महारानी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया। जनमेजय के अश्वमेधयज्ञ में इन्द्र ने महारानी को स्पर्श कर लिया। इससे उसने योगावलम्बन करके देह को त्याग दिया और वह स्वर्गधाम को चली गयी ।

महामुने! इस प्रकार मैंने अर्जुन-वृक्ष के भङ्ग होने तथा नलकूबर एवं रम्भा के शापमुक्त होने का सारा वृत्तान्त कह सुनाया। श्रीकृष्ण का पुण्यदायक चरित्र जन्म, मृत्यु एवं जरा का नाश करनेवाला है। उसका इस रूप में वर्णन किया गया। अब उनकी दूसरी लीलाओं का वर्णन करता हूँ। (अध्याय १४)

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे नारायणनारदसंवादे वृक्षार्जुनभञ्जनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

28/01/2026

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ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखण्ड-अध्याय 13मुनि गर्गजी का आगमन, यशोदा द्वारा उनका सत्कार और परिचय-प्रश्न, गर्गजी का उत...
16/01/2026

ब्रह्मवैवर्तपुराण-श्रीकृष्णजन्मखण्ड-अध्याय 13
मुनि गर्गजी का आगमन, यशोदा द्वारा उनका सत्कार और परिचय-प्रश्न, गर्गजी का उत्तर, नन्द का आगमन, नन्द-यशोदा को एकान्त में ले जाकर गर्गजी का श्रीराधा-कृष्ण के नाम – माहात्म्य का परिचय देना और उनकी भावी लीलाओं का क्रमशः वर्णन करना, श्रीकृष्ण के नामकरण एवं अन्नप्राशन-संस्कार का बृहद् आयोजन, ब्राह्मणों को दान-मान, गर्ग द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति तथा गर्ग आदि की विदाई

#गर्ग
#नन्द

भगवान् नारायण कहते हैं — महामुने ! अब श्रीकृष्ण का कुछ और माहात्म्य सुनो, जो विघ्नविनाशक, पापहारी, महान् पुण्य प्रदान करने वाला तथा परम उत्तम है । एक दिन की बात है। सोने के सिंहासन पर बैठी हुई नन्दपत्नी यशोदा भूखे हुए श्रीकृष्ण को गोद में लेकर उन्हें स्तन पिला रही थीं। उसी समय एक श्रेष्ठ ब्राह्मण शिष्यसमूह से घिरे हुए वहाँ आये ।

वे ब्रह्मतेज से प्रकाशित हो रहे थे और शुद्ध स्फटिक की माला पर परब्रह्म का जप कर रहे थे । दण्ड और छत्र धारण किये श्वेत वस्त्र पहने वे महर्षि अपनी धवल दन्तपंक्ति योंके कारण बड़ी शोभा पा रहे थे । वेद और वेदाङ्गों के पारंगत तो वे थे ही, ज्योतिर्विद्या के मूर्तिमान् स्वरूप थे। उन्होंने अपने मस्तक पर तपाये हुए सुवर्णके समान पिङ्गल जटाभार धारण कर रखा था। उनका मुख शरत्पूर्णिमा के चन्द्रदेव की कान्ति को लज्जित कर रहा था । गोरे-गोरे अङ्ग और कमल – जैसे नेत्र वाले वे योगिराज भगवान् शंकर के शिष्य थे तथा गदाधारी श्रीविष्णु के प्रति विशुद्ध भक्ति रखते थे ।

वे श्रीमान् महर्षि प्रसन्नतापूर्वक शिष्यों को पढ़ाते थे। उनके एक हाथ में व्याख्या की मुद्रा सुस्पष्ट दिखायी देती थी। वे वेदों की अनेक प्रकार की व्याख्या लीलापूर्वक करते थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो चारों वेदों का तेज मूर्तिमान् हो गया हो । उनके कण्ठ में साक्षात् सरस्वती का वास था । वे शास्त्रीय सिद्धान्त के एकमात्र विशेषज्ञ थे और दिन-रात श्रीकृष्णचरणारविन्दों के ध्यानमें तत्पर रहते थे। उन्हें जीवन्मुक्त अवस्था प्राप्त थी । वे सिद्धों के स्वामी, सर्वज्ञ और सर्वदर्शी थे ।

उन्हें देखकर यशोदाजी खड़ी हो गयीं । उन्होंने मस्तक झुकाकर मुनि के चरणों में प्रणाम किया और उन्हें बैठने के लिये सोने का सिंहासन देकर आतिथ्य के लिये पाद्य, अर्घ्य, गौ तथा मधुपर्क निवेदन किया। मुस्कराती हुई नन्दरानी ने अपने बालक से मुनीन्द्र की वन्दना करवायी । मुनि ने भी मन-ही-मन श्रीहरि को सौ-सौ प्रणाम किये और प्रसन्नतापूर्वक वेदमन्त्रों के अनुकूल आशीर्वाद दिया । यशोदाजी ने मुनि के शिष्यों को भी प्रणाम किया तथा भक्तिभाव से उन सबके लिये पृथक्-पृथक् पाद्य आदि अर्पित किये। उन शिष्यों ने यशोदाजी को आशीर्वाद दिया । मुनि अपने शिष्यों के साथ पैर धोकर जब सिंहासन पर बैठे, तब सती-साध्वी यशोदा बालक को गोद में ले भक्ति-भाव से मस्तक झुकाकर दोनों हाथ जोड़ मुनि के आगमन का कारण पूछने को उद्यत हुईं।

वे बोलीं — ‘मुने ! आप स्वात्माराम महर्षि हैं, आपसे कुशल-मङ्गल पूछना यद्यपि उचित नहीं है, तथापि इस समय मैं आपका कुशल-समाचार पूछ रही हूँ। अबला बुद्धिहीना होती है। अतः आप मेरे इस दोष को क्षमा कर देंगे । साधु-पुरुष सदा ही मूढ़ मनुष्यों के दोषों को क्षमा करते रहते हैं । ‘

तदनन्तर अङ्गिरा, अत्रि, मरीचि और गौतम आदि बहुत-से ऋषि-मुनियों के नाम लेकर यशोदा ने पूछा — ‘प्रभो! इन पुण्यश्लोक महात्माओं में से आप कौन हैं। कृपया मुझे बताइये । यद्यपि आपसे उत्तर पाने के योग्य मैं नहीं हूँ, तथापि आप मुझे मेरी पूछी हुई बात बताइये । आप जैसे महात्मा पुरुष प्रसन्नमन से शिशु को आशीर्वाद देने योग्य हैं । निश्चय ही ब्राह्मणों का आशीर्वाद तत्काल पूर्ण मङ्गलकारी होता है ।’

ऐसा कहकर नन्दरानी भक्तिभाव से मुनि के सामने खड़ी हो गयीं । उस सती ने नन्दरायजी को बुलाने के लिये चर भेजा। यशोदाजी की पूर्वोक्त बातें सुनकर मुनिवर गर्ग हँसने लगे। उनके शिष्य-समूह भी हास्य की छटा से दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए जोर-जोर से हँस पड़े। तब उन शुद्धबुद्धि महामुनि गर्ग ने यथार्थ हितकर, नीतियुक्त एवं अत्यन्त आनन्ददायक बात कही ।

श्रीगर्गजी बोले — देवि! तुम्हारा यह समयोचित वचन अमृत के समान मधुर है। जिसका जिस कुल में जन्म होता है, उसका स्वभाव भी वैसा ही होता है । समस्त गोपरूपी कमलवनों के विकास के लिये गोपराज गिरिभानु सूर्य के समान हैं। उनकी पत्नी का नाम सती पद्मावती है, जो साक्षात् पद्मा (लक्ष्मी) – के समान हैं। उन्हीं की कन्या तुम यशोदा हो, जो अपने यश की वृद्धि करने वाली हो । भद्रे ! नन्द और तुम जो कुछ भी हो, वह मुझे ज्ञात है । यह बालक जिस प्रयोजन से भूतल पर अवतीर्ण हुआ है, वह सब मैं जानता हूँ । निर्जन स्थान में नन्द के समीप मैं सब बातें बताऊँगा । मेरा नाम गर्ग है। मैं चिरकाल से यदुकुल का पुरोहित हूँ। वसुदेवजी ने मुझे यहाँ ऐसे कार्य के लिये भेजा है, जिसे दूसरा कोई नहीं कर सकता ।

इसी बीच में गर्गजी का आगमन सुनते ही नन्दजी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने दण्ड की भाँति पृथ्वी पर माथा टेक उन मुनीश्वर को प्रणाम किया । साथ ही उनके शिष्यों को भी मस्तक झुकाया । उन सबने उन्हें आशीर्वाद दिये। इसके बाद गर्गजी आसन से उठे और नन्द-यशोदा को साथ ले सुरम्य अन्तः पुर में गये । उस निर्जन स्थान में गर्ग, नन्द और पुत्रसहित यशोदा इतने ही लोग रह गये थे। उस समय गर्गजी ने यह गूढ़ बात कही।

श्रीगर्गजी बोले — नन्द ! मैं तुम्हें मङ्गलकारी वचन सुनाता हूँ। वसुदेवजी ने जिस प्रयोजन से मुझे यहाँ भेजा है, उसे सुनो। वसुदेव ने सूतिकागार में आकर अपना पुत्र तुम्हारे यहाँ रख दिया है और तुम्हारी कन्या वे मथुरा ले गये हैं। ऐसा उन्होंने कंस के भय से किया है। यह पुत्र वसुदेव का है और जो इससे ज्येष्ठ है, वह भी उन्हीं का है। यह निश्चित बात है । इस बालक का अन्नप्राशन और नामकरण – संस्कार करने के लिये वसुदेव ने गुप्तरूप से मुझे यहाँ भेजा है । अतः तुम व्रज में इन बालकों के संस्कार की तैयारी करो। तुम्हारा यह शिशु पूर्ण ब्रह्मस्वरूप है और माया से इस भूतल पर अवतीर्ण हो पृथ्वी का भार उतारने के लिये उद्यमशील है । ब्रह्माजी ने इसकी आराधना की थी । अतः उनकी प्रार्थना से यह भूतल का भार हरण करेगा। इस शिशु के रूप में साक्षात् राधिकावल्लभ गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्ण पधारे हैं । वैकुण्ठ में जो कमलाकान्त नारायण हैं तथा श्वेतद्वीप में जो जगत्पालक विष्णु निवास करते हैं, वे भी इन्हीं में अन्तर्भूत हैं। महर्षि कपिल तथा इनके अन्यान्य अंश ऋषि नर-नारायण भी इनसे भिन्न नहीं हैं। ये सबके तेजों की राशि हैं । वह तेजोराशि ही मूर्तिमान् होकर उनके यहाँ अवतीर्ण हुई है। भगवान् श्रीकृष्ण वसुदेव को अपना रूप दिखाकर शिशुरूप हो गये और सूतिकागार से इस समय तुम्हारे घर में आ गये हैं। ये किसी योनि से प्रकट नहीं हुए हैं; अयोनिज रूप में ही भूतल पर प्रकट हुए हैं। इन श्रीहरि ने माया से अपनी माता के गर्भ को वायु से पूर्ण कर रखा था । फिर स्वयं प्रकट हो अपने उस दिव्य रूप का वसुदेवजी को दर्शन कराया और फिर शिशुरूप हो वे यहाँ आ गये ।

गोपराज ! युग-युग में इनका भिन्न-भिन्न वर्ण और नाम है; ये पहले श्वेत, रक्त और पीतवर्ण के थे। इस समय कृष्णवर्ण होकर प्रकट हुए हैं। सत्ययुग में इनका वर्ण श्वेत था । ये तेजःपुञ्ज से आवृत होने के कारण अत्यन्त प्रसन्न जान पड़ते थे । त्रेता में इनका वर्ण लाल हुआ और द्वापर में ये भगवान् पीतवर्ण के हो गये । कलियुग के आरम्भ में इनका वर्ण कृष्ण हो गया। ये श्रीमान् तेज की राशि हैं, परिपूर्णतम ब्रह्म हैं; इसलिये ‘कृष्ण’ कहे गये हैं । ‘कृष्णः ‘ पद में जो ‘ककार’ है, वह ब्रह्मा का वाचक है। ‘ऋकार’ अनन्त (शेषनाग ) – का वाचक है। मूर्धन्य ‘षकार’ शिव का और ‘णकार’ धर्म का बोधक है । अन्त में जो ‘अकार’ है, वह श्वेतद्वीपनिवासी विष्णु का वाचक है तथा विसर्ग नर-नारायण- अर्थ का बोधक माना गया है। ये श्रीहरि उपर्युक्त सब देवताओं के तेज की राशि हैं। सर्वस्वरूप, सर्वाधार तथा सर्वबीज हैं; इसलिये ‘कृष्ण’ कहे गये हैं । ‘कृष्’ शब्द निर्वाण का वाचक है, ‘णकार’ मोक्ष का बोधक है और ‘अकार’ का अर्थ दाता है । ये श्रीहरिनिर्वाण मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं; इसलिये ‘कृष्ण’ कहे गये हैं । ‘कृष्’ का अर्थ है निश्चेष्ट, ‘ण’ का अर्थ है भक्ति और ‘अकार’ का अर्थ है दाता । भगवान् निष्कर्म भक्ति के दाता हैं; इसलिये उनका नाम ‘कृष्ण’ है। ‘कृष्’ का अर्थ है कर्मों का निर्मूलन, ‘ण’ का अर्थ है दास्यभाव और ‘अकार’ प्राप्ति का बोधक है । वे कर्मों का समूल नाश करके भक्ति की प्राप्ति कराते हैं; इसलिये ‘कृष्ण’ कहे गये हैं ।

नाम्नां भगवतो नंद कोटीनां स्मरणेन यत् । तत्फलं लभते नूनं कृष्णेति स्मरणे नरः ॥ ६३ ॥
यद्विधं स्मरणात्पुण्यं वचनाच्छ्रवणात्तथा । कोटिजन्मांहसो नाशो भवेद्यत्स्मरणादिकात् ॥ ६४ ॥
विष्णोर्नाम्नां च सर्वेषां सारात्सारं परात्परम् । कृष्णेति सुंदरं नाम मंगलं भक्तिदायकम् ॥ ६५ ॥

नन्द ! भगवान् के अन्य करोड़ों नामों का स्मरण करने पर जिस फल की प्राप्ति होती है, वह सब केवल ‘कृष्ण’ नाम का स्मरण करने से मनुष्य अवश्य प्राप्त कर लेता है। ‘कृष्ण’ नाम के स्मरण का जैसा पुण्य है, उसके कीर्तन और श्रवण से भी वैसा ही पुण्य होता है । श्रीकृष्ण के कीर्तन, श्रवण और स्मरण आदि से मनुष्य के करोड़ों जन्मों के पाप का नाश हो जाता है। भगवान् विष्णु के सब नामों में ‘कृष्ण’ नाम ही सबकी अपेक्षा सारतम वस्तु और सुन्दर तथा भक्तिदायक है ।

परात्पर तत्त्व है । ‘कृष्ण’ नाम अत्यन्त मङ्गलमय, ‘ककार’ के उच्चारण से भक्त पुरुष जन्म-मृत्यु का नाश करने वाले कैवल्य मोक्ष को प्राप्त कर लेता है । ‘ऋकार’ के उच्चारण से भगवान् का अनुपम दास्यभाव प्राप्त होता है। ‘ षकार’ के उच्चारण से उनकी मनोवाञ्छित भक्ति सुलभ होती है । ‘णकार’ के उच्चारण से तत्काल ही उनके साथ निवास का सौभाग्य प्राप्त होता है और विसर्ग के उच्चारण से उनके सारूप्य की उपलब्धि होती है, इसमें संशय नहीं है। ‘ककार’ का उच्चारण होते ही यमदूत काँपने लगते हैं । ‘ऋकार’ का उच्चारण होने पर वे ठहर जाते हैं, आगे नहीं बढ़ते । ‘षकार’ के उच्चारण से पातक, ‘णकार’ के उच्चारण से रोग तथा ‘अकार’ के उच्चारण से मृत्यु— ये सब निश्चय ही भाग खड़े होते हैं; क्योंकि वे नामोच्चारण से डरते हैं।

व्रजेश्वर ! श्रीकृष्ण-नाम के स्मरण, कीर्तन और श्रवण के लिये उद्योग करते ही श्रीकृष्ण के किंकर गोलोक से विमान लेकर दौड़ पड़ते हैं । विद्वान् लोग शायद भूतल के धूलिकणों की गणना कर सकें; परंतु नाम के प्रभाव की गणना करने में संतपुरुष भी समर्थ नहीं हैं । पूर्वकाल में भगवान् शंकर के मुख से मैंने इस ‘कृष्ण’ नाम की महिमा सुनी थी। मेरे गुरु भगवान् शंकर ही श्रीकृष्ण के गुणों और नामों का प्रभाव कुछ-कुछ जानते हैं । ब्रह्मा, अनन्त, धर्म, देवता, ऋषि, मनु, मानव, वेद और संतपुरुष श्रीकृष्ण-नाम-महिमा की सोलहवीं कला को भी नहीं जानते हैं। नन्द ! इस प्रकार मैंने तुम्हारे पुत्र की महिमा का अपनी बुद्धि और ज्ञान के अनुसार वर्णन किया है । इसे मैंने गुरुजी के मुख से सुना था ।

कृष्णः पीतांबरः कंसध्वंसी च विष्टरश्रवाः । देवकीनंदनः श्रीशो यशोदानंदनो हरिः ॥ ७५ ॥
सनातनोऽच्युतोऽनंतः सर्वेशः सर्वरूपधृक् । सर्वाधारः सर्वगतिः सर्वकारणकारणम् ॥ ७६ ॥
राधाबंधू राधिकात्मा राधिकाजीवनं स्वयम् । राधाप्राणो राधिकेशो राधिकारमणः स्वयम् ॥ ७७ ॥
राधिकासहचारी च राधामानसपूरणः । राधाधनो राधिकांगो राधिकासक्तमानसः ॥ ७८ ॥
राधिकाचित्तचोरश्च राधाप्राणाधिकः प्रभुः । परिपूर्णतमं ब्रह्म गोविंदो गरुडध्वजः ॥ ७९ ॥
नामान्येतानि कृष्णस्य श्रुतानि मन्मुखाद्धृदि । जन्ममृत्युहराण्येव रक्ष नंद शुभेक्षण ॥ ८० ॥

कृष्ण, पीताम्बर, कंसध्वंसी, विष्टरश्रवा, देवकीनन्दन, श्रीश, यशोदानन्दन, हरि, सनातन, अच्युत, विष्णु, सर्वेश, सर्वरूपधृक्, सर्वाधार, सर्वगति, सर्वकारणकारण, राधाबन्धु, राधिकात्मा, राधिकाजीवन, राधिकासहचारी, राधामानसपूरक, राधाधन, राधिकाङ्ग, राधिकासक्त- राधाप्राण, राधिकेश, राधिकारमण, राधिकाचित्तचोर, राधाप्राणाधिक, प्रभु, परिपूर्णतम, मानस, ब्रह्म, गोविन्द और गरुडध्वज — नन्द ! ये श्रीकृष्ण के नाम जो तुमने मेरे मुख से सुने हैं, हृदय में धारण करो । शुभेक्षण ! ये नाम जन्म तथा मृत्यु के कष्ट को हर लेने वाले हैं ।

तुम्हारे कनिष्ठ पुत्र के नामों का महत्त्व जैसा मैंने सुना था, वैसा यहाँ बताया है। अब ज्येष्ठ पुत्र हलधर के नाम का संकेत मेरे मुँह से सुनो। ये जब गर्भ में थे, उस समय उस गर्भ का संकर्षण किया गया था; इसलिये इनका नाम ‘संकर्षण’ हुआ । वेदों में यह कहा गया है कि इनका कभी अन्त नहीं होता; इसलिये ये ‘अनन्त’ कहे गये हैं । इनमें बल की अधिकता है; इसलिये इनको ‘बलदेव’ कहते हैं । हल धारण करने से इनका नाम ‘हली’ हुआ है। नील रंग का वस्त्र धारण करने से इन्हें ‘शितिवासा’ (नीलाम्बर) कहा गया है। ये मूसल को आयुध बनाकर रखते हैं; इसलिये ‘मुसली’ कहे गये हैं। रेवती के साथ इनका विवाह होगा; इसलिये ये साक्षात् ‘रेवतीरमण’ हैं। रोहिणी के गर्भ में वास करने से इन महाबुद्धिमान् संकर्षण को ‘रौहिणेय’ कहा गया है। इस प्रकार ज्येष्ठ पुत्र का नाम जैसा मैंने सुना था, वैसा बताया है। नन्द ! अब मैं अपने घर को जाऊँगा। तुम अपने भवन में सुखपूर्वक रहो ।

ब्राह्मण की यह बात सुनकर नन्दजी स्तब्ध रह गये । नन्द-पत्नी भी निश्चेष्ट हो गयीं और वह बालक स्वयं हँसने लगा । तब नन्द ने गर्गजी को प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ लिये और भक्तिभाव से मस्तक झुकाकर विनयपूर्वक कहा ।

नन्द बोले — ब्रह्मन् ! यदि आप चले गये तो कौन महात्मा इस कर्म को करायेंगे; अतः आप स्वयं ही शुभ दृष्टि करके इन बालकों का नामकरण एवं अन्नप्राशन संस्कार कराइये। राधा-बन्धु से लेकर राधाप्राणाधिक तक जो नाम-समूह बताये गये हैं, उनमें जो राधा नाम आया है, वह राधा कौन है और किसकी पुत्री है ?

नन्द की यह बात सुनकर मुनिवर गर्ग हँसने लगे और बोले — ‘ यह परम निगूढ़ तत्त्व एवं रहस्य की बात है, जिसे तुम्हें बताऊँगा ।’

श्रीगर्गजी बोले – नन्द ! सुनो। मैं पुरातन इतिहास बता रहा हूँ। यह वृत्तान्त पहले गोलोक में घटित हुआ था। उसे मैंने भगवान् शंकर के मुख से सुना है। किसी समय गोलोक में श्रीदामा का राधा के साथ लीलाप्रेरित कलह हो गया। उस कलह के कारण श्रीदामा के शाप से लीलावश गोपी राधा को गोकुल में आना पड़ा है। इस समय वे वृषभानु गोप की बेटी हैं और कलावती उनकी माता हैं। राधा श्रीकृष्ण के अर्धाङ्ग से प्रकट हुई हैं और वे अपने स्वामी के अनुरूप ही परम सुन्दरी सती हैं। ये राधा गोलोकवासिनी हैं; परंतु इस समय श्रीकृष्ण की आज्ञा से यहाँ अयोनिसम्भवा होकर प्रकट हुई हैं। ये ही देवी मूल प्रकृति ईश्वरी हैं। इन सती-साध्वी राधा ने माया से माता के गर्भ को वायुपूर्ण करके वायु के निकलने के समय स्वयं शिशु-विग्रह धारण कर लिया। ये साक्षात् कृष्ण-माया हैं और श्रीकृष्ण के आदेश से पृथ्वी पर प्रकट हुई हैं।

जैसे शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की कला बढ़ती है, उसी प्रकार व्रज में राधा बढ़ रही हैं। श्रीकृष्ण के तेज के आधे भाग से वे मूर्तिमती हुई हैं। एक ही मूर्ति दो रूपों में विभक्त हो गयी है । इस भेद का निरूपण वेद में किया गया है। ये स्त्री हैं, वे पुरुष हैं, किंवा वे ही स्त्री हैं और ये पुरुष हैं। इसका स्पष्टीकरण नहीं हो पाता। दो रूप हैं और दोनों ही स्वरूप, गुण एवं तेज की दृष्टि से समान हैं। पराक्रम, बुद्धि, ज्ञान और सम्पत्ति की दृष्टि से भी उनमें न्यूनता अथवा अधिकता नहीं है। किंतु वे गोलोक से यहाँ पहले आयी हैं; इसलिये अवस्था में श्रीकृष्ण से कुछ अधिक हैं । श्रीकृष्ण सदा राधा का ध्यान करते हैं और राधा भी अपने प्रियतम का निरन्तर स्मरण करती हैं। राधा श्रीकृष्ण के प्राणों से निर्मित हुई हैं और ये श्रीकृष्ण राधा के प्राणों से मूर्तिमान् हुए हैं । श्रीराधा का अनुसरण करने के लिये ही इनका गोकुल में आगमन हुआ है । पूर्वकाल में गोलोक में श्रीहरि ने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे सार्थक बनाने के लिये कंस के भय का बहाना लेकर इनका गोकुल में आगमन हुआ है। केवल प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये ही ये व्रज में आये हैं । भय तो छलना-मात्र है । जो भय के भी स्वामी हैं, उन्हें किससे भय हो सकता है ?

सामवेद में ‘राधा’ शब्द की व्युत्पत्ति बतायी गयी है । पहले नारायणदेव ने अपने नाभि-कमल पर बैठे हुए ब्रह्माजी को वह व्युत्पत्ति बतायी थी । फिर ब्रह्माजी ने ब्रह्मलोक में भगवान् शंकर को उसका उपदेश दिया। नन्द! तत्पश्चात् पूर्वकाल में कैलास-शिखर पर विराजमान महेश्वर ने मुझको वह व्युत्पत्ति बतायी, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है । मैं उसका वर्णन करता हूँ ।

रेफो हि कोटिजन्माघं कर्मभोगं शुभाशुभम् ॥ १०६ ॥
आकारो गर्भवासं च मृत्युं च रोगमुत्सृजेत् । धकार आयुषो हानिमाकारो भवबंधनम् ॥ १०७ ॥
श्रवणस्मरणोक्तिभ्यः प्रणश्यति न संशयः । रेफो हि निश्चलां भक्तिं दास्यं कृष्णपदांबुजे ॥ १०८ ॥
सर्वेप्सितं सदानंदं सर्वसिद्धौघमीश्वरम् । धकारः सहवासं च तत्तुल्यकालमेव च ॥ १०९ ॥
ददाति सार्ष्टिसारूप्यं तत्त्वज्ञानं हरेः समम् । आकारस्तेजसां राशिं दानशक्तिं हरौ यथा ॥ ११० ॥
योगशक्तिं योगमतिं सर्वकालं हरिस्मृतिम् । श्रुत्युक्तिस्मरणाद्योगान्मोहजालं च किल्बिषम् । रोगशोकमृत्युयमा वेपंते नात्र संशयः ॥ १११ ॥

‘राधा’ शब्द की व्युत्पत्ति देवताओं, असुरों और मुनीन्द्रों को भी अभीष्ट है तथा वह सबसे उत्कृष्ट एवं मोक्षदायिनी है। राधा का ‘रेफ’ करोड़ों जन्मों के पाप तथा शुभाशुभ कर्मभोग से छुटकारा दिलाता है।‘आकार’ गर्भवास, मृत्यु तथा रोग को दूर करता है । ‘धकार’ आयु की हानि का और ‘आकार’ भवबन्धन का निवारण करता है । राधा नाम के श्रवण, स्मरण और कीर्तन से उक्त सारे दोषों का नाश हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। राधा नाम का ‘रेफ’ श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों में निश्चल भक्ति तथा दास्य प्रदान करता है। ‘आकार’ सर्ववाञ्छित, सदानन्दस्वरूप, सम्पूर्ण सिद्धसमुदायरूप एवं ईश्वर की प्राप्ति कराता है ‘धकार’ श्रीहरि के साथ उन्हीं की भाँति अनन्त काल तक सहवास का सुख, समान ऐश्वर्य, सारूप्य तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करता है। ‘आकार’ श्रीहरि की भाँति तेजोराशि, दानशक्ति, योगशक्ति, योगमति तथा सर्वदा श्रीहरि की स्मृति का अवसर देता है । श्रीराधा नाम के श्रवण, स्मरण और कीर्तन का सुयोग मिलने से मोहजाल, पाप, रोग, शोक, मृत्यु और यमराज सभी काँप उठते हैं; इसमें संशय नहीं है ।

श्रीराधा-माधव के नाम की यत्किञ्चित् व्याख्या जो गुरु-मुख से सुनी थी, वह मैंने यथाज्ञान यहाँ बतायी है। इन नामों की सम्पूर्णरूप से व्याख्या करने में मैं असमर्थ हूँ। नन्द ! यहाँ पास ही वृन्दावन में श्रीराधा और माधव का विवाह होगा । साक्षात् जगत्स्रष्टा ब्रह्मा पुरोहित हो अग्निदेव को साक्षी बनाकर प्रसन्नतापूर्वक यह वैवाहिक कार्य सम्पन्न करेंगे। श्रीकृष्ण के द्वारा जो बाललीलाएँ होने वाली हैं, उसमें से मुख्यतः ये हैं- कुबेरपुत्र का उद्धार, गोपियों के घरों से माखन चुराकर उसका भक्षण, तालवन में तालफल का भोजन और धेनुकासुर का वध, बकासुर, केशी और प्रलम्बासुर का खेल-खेल में ही विनाश, द्विजपत्नियों का उद्धार, उनके दिये हुए मिष्टान्न और पान का भोजन, इन्द्रयाग की परम्परा का भंजन, इन्द्र के कोप से गोकुल की रक्षा, गोपियों के वस्त्रों का अपहरण, उनके व्रत का सम्पादन, पुनः उन्हें वस्त्र अर्पण तथा मनोवाञ्छित वरदान देने का कार्य करके ये श्यामसुन्दर अपनी लीलाओं से उनके चित्त को चुरा लेंगे और उन्हें सर्वथा अपने अधीन कर लेंगे। तदनन्तर इनके द्वारा अत्यन्त रमणीय रासोत्सव का आयोजन होगा, जो सबका आनन्दवर्धन करेगा । शरद् और वसन्त ऋतु में रात के समय पूर्ण चन्द्रमा का उदय होने पर रासमण्डल में गोपियों को नूतन प्रेम-मिलन का सुख प्रदान करके ये श्यामसुन्दर उनका मनोरथ पूर्ण करेंगे। फिर कौतूहलवश उनके साथ जल-विहार भी करेंगे।

तत्पश्चात् श्रीदामा के शाप के कारण इनका गोप-गोपियों तथा श्रीराधा के साथ (पार्थिव) सौ वर्षों के लिये वियोग हो जायगा । उस समय ये मथुरा चले जायँगे और वहाँ इनका जाना गोपियों के लिये शोकवर्द्धक होगा । उस समय पुनः ये उनके पास आकर उन्हें समझा-बुझाकर धैर्य बँधायेंगे और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करेंगे। उस प्रबोधन और आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा ये रथ तथा सारथि अक्रूर की रक्षा करेंगे। फिर रथ पर आरूढ़ हो पिता, भाई एवं व्रजवासियों के साथ यमुनाजी को लाँघकर व्रज से मथुरा को पधारेंगे। मार्ग में यमुनाजी के जल के भीतर अक्रूर को अपने स्वरूप का दर्शन कराकर उन्हें ज्ञान देंगे। फिर सायंकाल मथुरा में पहुँचकर कौतूहलवश नगर में घूम-घूमकर सबको दर्शन देंगे। माली, दर्जी और कुब्जा को भवबन्धन से मुक्त करेंगे। शंकरजी धनुष को तोड़कर यज्ञभूमि का दर्शन करेंगे। फिर कुवलयापीड़ हाथी और मल्लों का वध करने के पश्चात् अपने सामने राजा कंस को देखेंगे और तत्काल उसका विध्वंस करके माता-पिता को बन्धन से छुड़ायेंगे।

तदनन्तर तुम सब गोपों को समझा-बुझाकर लौटायेंगे । कंस के राज्य पर उग्रसेन का अभिषेक करेंगे। कंस के बन्धु-बान्धवों को ज्ञानोपदेश देकर उनका शोक दूर करेंगे। इसके बाद अपने भाई का और अपना उपनयन-संस्कार कराकर गुरु के मुख से विद्या ग्रहण करेंगे। गुरुजी को उनका मरा हुआ पुत्र लाकर देंगे और फिर घर लौट आयेंगे। इसके बाद राजा जरासंध के सैनिकों को चकमा देकर दुरात्मा कालयवन का वध, द्वारकापुरी का निर्माण, मुचुकुन्द का उद्धार तथा यादवों सहित द्वारकापुरी को प्रस्थान करेंगे। वहाँ कौतूहलवश स्त्रीसमूहों के साथ विवाह करके उनके साथ क्रीडा-विहार करेंगे। उनका तथा उनके पुत्र-पौत्रादि का सौभाग्यवर्धन करेंगे। मणिसम्बन्धी मिथ्या कलङ्क का मार्जन, पाण्डवों की सहायता, भूभार- हरण, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर के राजसूययज्ञ का लीलापूर्वक सम्पादन, पारिजात का अपहरण, इन्द्र के गर्व का गंजन, सत्यभामा के व्रत की पूर्ति, बाणासुर की भुजाओं का खण्डन, शिव के सैनिकों का मर्दन, महादेवजी को जृम्भणास्त्र से बाँधना, बाणपुत्री उषा का अपहरण, अनिरुद्ध को बाणासुर के बन्धन से छुटकारा दिलाना, वाराणसीपुरी का दहन, ब्राह्मण की दरिद्रता का दूरीकरण, एक ब्राह्मण के मरे हुए पुत्रों को लाकर उसे देना, दुष्टों का दमन आदि करना तथा तीर्थयात्रा के प्रसङ्ग से तुम व्रजवासियों के साथ पुनः मिलना इत्यादि कार्य करके ये श्रीकृष्ण श्रीराधा के साथ फिर व्रज में आयेंगे ।

तदनन्तर अपने नारायण-अंश को द्वारकापुरी में भेजकर ये जगदीश्वर गोलोकनाथ यहाँ राधा के साथ समस्त आवश्यक कार्य पूर्ण करेंगे तथा व्रजवासियों एवं राधा को साथ लेकर शीघ्र ही गोलोकधाम में पधारेंगे। नारायणदेव तुम्हें साथ लेकर वैकुण्ठ पधारेंगे। नर-नारायण नामक जो दोनों ऋषि हैं, वे धर्म के घर को चले जायँगे तथा श्वेतद्वीपनिवासी विष्णु क्षीरसागर को पधारेंगे। नन्द ! इस प्रकार भविष्य में होनेवाली लीलाओं का वर्णन मैंने किया है। यह वेद का निश्चित मत है। अब इस समय जिस उद्देश्य से मेरा आना हुआ है, उसे बताता हूँ; सुनो।

माघ शुक्ल चतुर्दशी की शुभ बेला में इन बालकों का संस्कार करो। उस दिन गुरुवार है । रेवती नक्षत्र है । चन्द्र और तारा शुद्ध हैं। मीन के चन्द्रमा हैं। उस पर लग्नेश की पूर्ण दृष्टि है । उत्तम वणिज नामक करण है और मनोहर शुभ योग है। वह दिन परम दुर्लभ है। उसमें सभी उत्कृष्ट एवं उपयोगी योगों का उदय हुआ है । अतः पण्डितों के साथ विचार करके उसी दिन प्रसन्नतापूर्वक संस्कार- कर्म का सम्पादन करो।

ऐसा कह मुनीश्वर गर्ग बाहर आकर बैठ गये । नन्द और यशोदा को बड़ा हर्ष हुआ और वे संस्कार-कर्म के लिये तैयारी करने लगे। इसी समय गर्गजी को देखने के लिये गोप-गोपियाँ और बालक-बालिकाएँ नन्दभवन में आयीं। उन्होंने देखा — मुनिश्रेष्ठ गर्ग मध्याह्नकाल के सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं । शिष्यसमूहों से घिरकर ब्रह्मतेज से उद्भासित हो रहे हैं और प्रश्न पूछनेवाले किसी सिद्धपुरुषको वे प्रसन्नतापूर्वक गूढ़योग का रहस्य समझा रहे हैं । नन्दभवन की एक-एक सामग्री को मुस्कराते हुए देख रहे हैं और योगमुद्रा धारण किये स्वर्णसिंहासन पर बैठे हैं। ज्ञानमयी दृष्टि से भूत, वर्तमान और भविष्य को भी देख रहे हैं। वे मन्त्र के प्रभाव से अपने हृदय में परमात्मा के जिस सिद्ध स्वरूप को देखते हैं, उसी को मुस्कराते हुए शिशु के रूप में बाहर यशोदा की गोद में देख रहे हैं। महेश्वर के बताये हुए ध्यान के अनुसार जिस रूप का उन्हें साक्षात्कार हुआ था, उसी पूर्णकाम परमात्म-स्वरूप का अत्यन्त प्रीतिपूर्वक दर्शन करके नेत्रों से आँसू बहाते हुए वे पुलकित शरीर से भक्ति के सागर में निमग्न दिखायी देते थे। योगचर्या के अनुसार मन-ही-मन भगवान की पूजा और प्रणाम करते थे। गोप-गोपियों ने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और गर्गजी ने भी उन सबको आशीर्वाद दिया ।

तदनन्तर मुनि अपने आसन पर विराजमान हुए और वे समागत स्त्री-पुरुष अपने-अपने घर को गये। नन्द ने आनन्दित होकर निकटवर्ती तथा दूरवर्ती बन्धुजनों के पास शीघ्र ही मङ्गलपत्रिका पठायी। इसके बाद उन्होंने दूध, दही, घी, गुड़, तेल, मधु, माखन, तक्र और चीनी के शर्बत से भरी हुई बहुत-सी नहरें लीलापूर्वक तैयार करायीं । इसके बाद उन्होंने अगहनी के चावलों के सौ ऊँचे-ऊँचे पर्वताकार ढेर लगवाये । चिउरों के सौ पर्वत, नमक के सात, शर्करा के भी सात, लड्डुओं के सात तथा पके फलों के सोलह पर्वत खड़े कराये। जौ, गेहूँ के आटे के पके हुए लड्डुक, पिण्ड, मोदक तथा स्वस्तिक (मिष्टान्न- विशेष ) – के अनेक पर्वत खड़े किये गये थे । कपर्दकों के बहुत ही ऊँचे-ऊँचे सात पर्वत खड़े दिखायी देते थे । कर्पूर आदि से युक्त ताम्बूल के बीड़ों से घर भरा हुआ था । सुवासित जल के चौड़े-चौड़े कुण्ड भरे गये थे, जिनमें चन्दन, अगुरु और केसर मिलाये गये थे ।

नन्दजी ने कौतूहलवश नाना प्रकार के रत्न, भाँति-भाँति के सुवर्ण, रमणीय मोती-मूँगे, अनेक प्रकार के मनोहर वस्त्र और आभूषण भी पुत्र के अन्न-प्राशन-संस्कार के लिये संचित किये थे । आँगन को झाड़-बुहारकर सुन्दर बनाया गया। उसमें चन्दनमिश्रित जल का छिड़काव किया गया। केले के खंभों, आम के नये पल्लवों की बन्दनवारों और महीन वस्त्रों से उस आँगन को कौतुकपूर्वक सब ओर से घेर दिया गया । यथास्थान मङ्गल कलश स्थापित किये गये। उन्हें फलों और पल्लवों से सजाया गया तथा चन्दन, अगुरु, कस्तूरी एवं फूलों के गजरों से सुशोभित किया गया। सुन्दर पुष्पहारों और मनोहर वस्त्रों की राशियों से नन्द-भवन के आँगन को सजाया गया था। उसमें गौओं, मधुपर्कों, आसनों, फलों और सजल कलशों के समूह यथास्थान रखे गये थे । वहाँ नाना प्रकार के अत्यन्त दुर्लभ और मनोहर वाद्य बज रहे थे । ढक्का, दुन्दुभि, पटह, मृदङ्ग, मुरज, आनकसमूह, वंशी, ढोल और झाँझ आदि के शब्द हो रहे थे। विद्याधरियों के नृत्य, भाव-भंगी तथा भ्रमण से नन्द-प्राङ्गण की अपूर्व शोभा हो रही थी। उसके साथ ही गन्धर्वराजों के मूर्छनायुक्त संगीत तथा स्वर्ण-सिंहासनों एवं रथों के सम्मिलित शब्द वहाँ गूँज रहे थे।

इसी समय संदेशवाहक ने प्रसन्नतापूर्वक आकर नन्दरायजी से कहा – ‘प्रभो! आपके भाई- बन्धु गोपराज एवं गोपगण पधारे हैं । उनमें से कुछ लोग घोड़ों पर चढ़कर आये हैं, कुछ हाथियों पर सवार हैं और कितने ही रथों पर आरूढ़ हो शीघ्रतापूर्वक पधारे हैं। रत्नमय अलंकारों से विभूषित कितने ही राजपुत्रों का भी यहाँ शुभागमन हुआ है । पत्नी और सेवकोंसहित गिरिभानुजी पधारे हैं। उनके साथ चार-चार लाख रथ और हाथी हैं। घोड़े और शिविकाओं की संख्या एक-एक करोड़ है । ऋषीन्द्र, मुनीन्द्र, विद्वान्, ब्राह्मण, बन्दीजन और भिक्षुकों के समूह भी निकट आ गये हैं । गोप और गोपियों की गणना करने में कौन समर्थ हो सकता है ? आप स्वयं बाहर चलकर देखें ।’

इस प्रकार स्तुति करके गर्गजी नेत्रों से आँसू बहाते हुए श्रीहरि के चरणों में गिर पड़े और जोर-जोर से रोने लगे। उस समय भक्ति के उद्रेक से उनके शरीर में रोमाञ्च हो आया था। गर्गजी की बात सुनकर भक्तवत्सल श्रीकृष्ण हँस पड़े और बोले — ‘मुझमें तुम्हारी अविचल भक्ति हो ।’

इदं गर्गकृतं स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । दृढां भक्तिं हरेर्दास्यं स्मृतिं च लभते ध्रुवम् ॥ २१७ ॥
जन्ममृत्युजरारोगशोकमोहादिसंकटात् । तीर्णो भवति श्रीकृष्णदाससेवनतत्परः ॥ २१८ ॥
कृष्णस्य सहकालं च कृष्णसार्द्धं च मोदते । कदाचिन्न भवेत्तस्य विच्छेदो हरिणा सह ॥ २१९ ॥

जो मनुष्य गर्गजी द्वारा किये गये इस स्तोत्र का तीनों संध्याओं के समय पाठ करता है, वह श्रीहरि की सृदृढ़ भक्ति, दास्यभाव और उनकी स्मृति का सौभाग्य अवश्य प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं, वह श्रीकृष्णभक्तों की सेवामें तत्पर हो जन्म, मृत्यु, जरा, रोग, शोक और मोह आदि के संकट से पार हो जाता है । श्रीकृष्ण के साथ रहकर सदा आनन्द भोगता है और श्रीहरि से कभी उसका वियोग नहीं होता ।

श्रीकृष्ण का यह चरित्र – उनके नामकरण और अन्नप्राशन आदि का वृत्तान्त कहा गया । यह जन्म, मृत्यु और जरा का नाश करने वाला है। अब उनकी अन्य लीलाएँ बता रहा हूँ, सुनो। (अध्याय १३)

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे नारायणनारदसंवादे कृष्णान्नप्राशन वर्णननामकरणप्रस्तावो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

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